ऊंच-नीच की पाठशाला
प्रयोग-दर प्रयोग, नीति और अनीति, मिड-डे-मील और राजनीति के चलते उत्तर प्रदेश की प्राथमिक शिक्षा सड़ चुकी है और अब उसकी सड़ांध से होकर बह रही है जातिवाद, छुआछूत की बयार । समता, समानता और बंधुत्व को बढ़ावा देने वाले भारतीय संविधान को आत्मसात किए साठ साल बीत चुके हैं । यद्यपि कि विगत साठ सालों में जाति आधारित जनगणना नही हुई है फिर भी जातिवादी घृणा और अमानवीयता में कोई बदलाव नही आया है । जाति जनगणना से जातिवादी मानसिकता बढ़ने का मर्सिया पढ़ने वाले, उत्तर प्रदेश के प्राथमिक पाठशालाओं में मिड-डे-मील में दलित महिलाओं द्वारा तैयार भोजन को खाने से इनकार करने वाले समाज के कुलीन तबके के जेहादी आचरण पर मौन हैं । जहां बंधुत्व, राष्ट्रप्रेम और इंसानियत का पाठ पढ़ाया जाना चाहिए था वहां ऊंच-नीच का पाठ पढ़ाया जा रहा है । अध्यापकों का यह आचरण चिन्ता का विषय है । प्रधानाध्यापक से लेकर गांव के अन्य सवर्णों द्वारा दलितों के खिलाफ जो आचरण अपनाया जा रहा है, उसके खिलाफ समाज और प्रशासन की चुप्पी, जातिवादी मानसिकता के दोगले चरित्र को उजागर करती है । न केवल सवर्ण अपितु कुछ पिछड़े और दलित भी जातिवादी मानसिकता से बुरी तरह ग्रस्त हैं । यही है जातिवादी हिन्दू समाज की बुनियादी जड़ । यह जड़ जनगणना से न तो गहरी होने वाली है और न जनगणना न होने से उखड़ने वाली । ब्राह्मणवाद ने अपनी सर्वोच्चता बनाये रखने के लिए इसकी जड़े, इतनी पुख्ता कर दी हैं कि बिना उनकी मर्जी से इसे हिलाया नहीं जा सकता । तभी तो दलित चेतना के उभार के बावजूद तमाम दलित और पिछड़े उनके भुलावे में आकर जातिवाद को सींच रहे हैं ।
बाबा साहेब भीम राव अम्बेडकर की धर्मपत्नी रमाबाई के नाम पर कानपुर देहात जिले का नामकरण `रमाबाई नगर´ भले हो गया हो, दलितों की अस्मिता की रक्षा अभी दूर की कौड़ी बनी हुई है । यहां के प्राथमिक पाठशाला भवानीदीन पुरवा की दलित रसोइया रेखा बाल्मीकि द्वारा तैयार खाना न तो प्रधानाध्यापक सुन्दर लाल त्रिपाठी द्वारा खाया गया और न किसी बच्चों को खाने दिया गया । उल्टे गांव वालों को बटोर कर स्कूल में पत्थरबाजी कराई गई । प्रधानाध्यापक कहता रहा कि वह नब्बे दिन का व्रत रख लेगा पर दलित महिला द्वारा बनाया खाना न चखेगा । रेखा को चेतावनी मिली कि जुबान खोला तो गांव से निकाल दिया जायेगा । तनख्वाह लेना है, लो, पर खाना न बनाओ । बेसिक शिक्षा अधिकारी का कहना है कि शासन की नीति के अनुसार ही दलित महिला द्वारा खाना बनवाया गया पर लोगों को यह स्वीकार्य नहीं तो वह दलित रसोइये से कोई दूसरा कार्य करा लेंगे । ऐसी निरीहता, ऐसी बेचारगी पर भला क्या कहना ? कहां गई संविधान प्रदत्त समानता का अधिकार ? और यह चौधराहट तब है जब प्रदेश की सत्ता सवर्णों के हाथ में नही है ।
क्या यह सही नही है कि ब्राह्मणवाद द्वारा रोपी गई जातिवादी मानसिकता से मुकाबला करने की ताकत न तो शासन में है, न दलित समाज इस कुचक्र को ठीक से समझ पाया है । दलित समाज में भी ऊंच-नीच के तमाम स्तर ज़िन्दा हैं । अन्यथा उन्नाव जनपद के रानीपुर में पासी जाति के रसोइये के हाथ का बना खाना अन्य दलित संवर्ग के बच्चों ने खाने से इनकार न किया होता । एक दूसरा प्रकरण रमाबाई नगर के ब्लाक डेरापुर के गांव कपासी खुर्द का है । वहां गांव के अनुसूचित जाति के अध्यापक ने अपनी सास को रसोइया बनाना चाहा । प्रधान ने तुरुप का पत्ता चलते हुए वाल्मीकि महिला को रसोइया नियुक्त कर दिया । बस क्या था, बाल्मीकि महिला के हाथ का खाना कुंवरलाल संखवार के लड़के के अलावा अन्य दलित और सवर्ण बच्चों ने नहीं खाया । महोबा जनपद के लुहेड़ी गांव के पूर्व माध्यमिक विद्यालय के छात्रों ने भी दलित रसोइये के हाथ का बना खाना खाने से साफ इनकार कर दिया है । लखनऊ के करीब स्थित मोहनलालगंज में भी ऐसा ही मामला प्रकाश में आया है । कन्नौज, शाहजहांपुर, बरेली आदि जिलों से भी ऐसे ही समाचार मिल रहे हैं ।
छूआछूत की इन पाठशालाओं में ऊंच-नीच की ऐसी लकीरें अपने आप नहीं खिंची हैं । इन्हें ब्राह्मणवादी मानसिकता के अध्यापकों ने अबोध मस्तिष्क रुपी श्यामपट पर अपने हाथों से गहरी की हैं । अध्यापकों ने अभिभावकों में अस्पृष्यता की ऐसी आग दहकाई जो धीरे-धीरे तमाम विद्यालयों में फैलती जा रही है । हमारे बुद्धिजीवी कहते हैं कि जातिगणना से समाज बिखर जायेगा, जातिवाद बढ़ेगा । गोया समाज अब तक एक है ? अभी तो जाति आधारित जनगणना हुई ही नहीं, फिर मिड-डे-मील बनाने वाली दलित रसोइये के विरूद्ध जहर किसने घोला ? क्या यह दलित और पिछड़ों की राजनीति का परिणाम है या ब्राह्मणवाद द्वारा रोपे गए जातिवादी नफरत का ? यह ब्राह्मणवाद ही है जो मनुष्य को इतना घृणित मान लेता है कि उसका छुआ स्वीकार्य नहीं करता और पशुओं को माता/पिता की तरह पूजता है । फिर ऐसे धर्म में मनुष्यता के बीज ढ़ूंढना ढ़ोंग नहीं तो क्या है ? अजीब बिडंबना है कि लगभग बर्बाद हो चुके प्रदेश के प्राथमिक विद्यालयों में पढ़ाई, खाने की गुणवत्ता या साफ-सफाई की बात नहीं उठाई जा रही है । व्रत करने वाले ढ़ोंगी प्रधानाध्यापक द्वारा आए दिन गैरहाजिर रहने, अपने खेतों, दुकानों में काम करने पर भी सवाल नहीं उठाया जा रहा है । बात महज यह उठाई जा रही है कि इन शिक्षा केन्द्रों में तैनात एक कर्मचारी को इतना घृणित मान लिया जा रहा है कि उसके द्वारा तैयार खाना, खाने योग्य नहीं ? कहां हैं शबरी के मीठे फल या विदुर का साग खाने का दृष्टान्त देने वाले ? कहां हैं दलित वोटों के लिए दलित सम्मान की रक्षा की बात करने वाले ?
हिन्दू समाज की सम्पूर्ण सामाजिकता, आर्थिक और प्रबंधकीय व्यवस्था ऐसे ही जातिवादी मानसिकता पर आधारित रही है । यहां कभी भी योग्यता या कर्म के आधार पर समाज को सम्मान नहीं मिला है । यहां आर्थिक से ज्यादा कुलीनतावाद या वर्चस्ववाद का सिद्धान्त प्रभावी रहा है । यहां चुनाव और वर्चस्ववाद एक दूसरे के पर्याय रहे हैं । लिहाजा हिन्दी प्रदेशों में ज्यादातर पार्टियां चुनावों में जातिवादी समीकरणों के सहारे वर्चस्ववाद को स्थापित करती हैं । यह कोई आश्चर्य का विषय भी नहीं है । जिस समाज का सम्पूर्ण ढ़ांचा जातिवादी हो, वहां की राजनीति जातिवाद विहिन कैसे हो सकती है ? हिन्दी प्रदेशों में जातिवाद के विरूद्ध कभी भी कोई जन आन्दोलन नहीं छेड़ा गया जैसा कि 19वीं सदी में पश्चिम बंगाल में `ब्रह्म समाज´ के माध्यम से किया गया था । जाति आधारित जनगणना पर हाय-तौबा मचाने वाले, मनुष्यता विरोधी जातिवाद के विरूद्ध कोई आन्दोलन नहीं खड़ा करना चाहते । दरअसल उनका जातिवाद विरोध का नाटक, आरक्षण विरोध की मानसिकता से जुड़ा हुआ है । उनका जातिवाद विरोध, दलितों और पिछड़ों को शासन, प्रशासन में मिले स्थान के प्रतिकार के रूप में है । जिस समाज में गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकार्ड में एक से एक बेहूदे आंकड़े हों, वहां जातियों के आंकड़े से भूचाल आया हुआ है । तमाम लेखक भी इसकी निन्दा में जुटे हैं । गोया जाति गणना हुई तो सब कुछ खत्म । पर नब्बे दिन तक व्रतधारण करने की धमकी देने वालों के खिलाफ कोई आन्दोलन नहीं उठ खड़ा हो रहा ।
भारतीय जातिव्यस्था के केन्द्र में सबसे ज्यादा उपेक्षित, प्रताड़ित और घृणित दलितवर्ग रहा है । पिछड़ी जातियों को हासिल कुछ रियायतों के बावजूद, वर्णवादियों द्वारा उन्हें भी उसी प्रकार उपेक्षित और प्रताड़ित किया जाता रहा है जिस प्रकार दलितों को । इस प्रताड़ना को झेलने के बावजूद, जातिवाद की पीड़ा भोगने वाली पिछड़ी जातियों की स्थिति बड़ी ढुलमुल रही है । एक ओर तो वे जातिवाद की प्रताड़ना से आहत दिखती हैं, तो दूसरी ओर दलितों को प्रताड़ित या अपमानित करने के अवसर से चूकती नहीं । जीवन-मरण, शादी-व्याह के अवसर पर दलितों को खिलानें, या मृतक पशुओं को फेंकवाने में जो नज़रिया सवर्ण रखते हैं, वही नज़रिया पिछड़ी जातियां भी रखती हैं । शायद इसलिए जातिवाद के खिलाफ दलितों और पिछड़ों की व्यापक गोलबन्दी अभी तक नहीं बन पाई है और दलित रसोइये द्वारा पकाये मिड-डे-मील को खाने से नकारने में सवर्णों के साथ पिछड़े भी आ जाते हैं ।
जातिवादी मानसिकता ने समाज की समरसता तोड़ी है । ऊंची जातियों द्वारा आज भी दलितों की बस्तियों में आग लगाई जाती है तथा उनकी बहू-बेटियों की इज्जत लूटी जाती है । जाहिर है ऐसे अपमान झेलने वाले दलित, अपना भविष्य दलितवादी पार्टियों में सुरक्षित समझने लगते हैं भले ही दृष्टिहीन दलितवादी पार्टियों से उनका भला न होता हो और जातिवादी दंश पीढ़ी-दर-पीढ़ी उन्हें अभिशप्त किए रहता है । ब्राह्मणवाद ऐसी दलितवादी राजनीति को एक हद तक स्वीकार भी कर लेता है । कभी-कभी ऊंच-नीच की दीवार पर परदा भी लगाता दिखता है और बाद में दलितों के तेवर को तोड़ते हुए पुन: अपनी अधीनता में ले लेता है । ब्राह्मणवाद कभी भी जातिवाद को समाप्त नहीं करना चाहता । जातिवाद समाप्त होते ही ब्राह्मणवाद समाप्त हो जायेगा । जातिवादी हथियार के बल पर ही उसने हिन्दू समाज पर लम्बे समय तक राज किया है । लम्बे समय से शिक्षा, ज्ञान और समृद्धि पर एकाधिकार बनाए रखा है और सदियों से वंचित वर्ग को आरक्षण द्वारा कुछ लाभ मिला है तो वह खुली प्रतियोगिता में उतरने की चुनौती दे रहा है या जातिवाद का मर्सिया पढ़ रहा है ।
वर्णवादियों द्वारा आरोप लगाया जाता है कि देश में जातिवाद का फैलाव 1990 के पहले नहीं था । सच्चाई यह है कि नब्बे के पूर्व का जातिवाद छद्म और एकतरफा था । तब प्रतिरोध के स्वर नहीं थे । सवर्ण जातियों के जुल्म को दलित जातियां चुपचाप सह लेती थीं । उनके अन्दर संचित आक्रोश को भुनाने के लिए नब्बे के बाद दलितों और पिछड़ों के नाम पर कुछ पार्टियां सक्रिय हुईं । यद्यपि कि उनके दृष्टिकोण बहुत हद तक साफ और वैज्ञानिक नहीं थे तथापि उन्होंने पूर्व के पिछलग्गूपन से मुक्ति की बात उठाकर नए समीकरणों को जन्म दिया । उन्हें सत्ता हासिल हुई । जिसके प्रतिक्रिया स्वरूप यह प्रचारित किया जाता है कि नब्बे के बाद जातिवाद का फैलाव अधिक हुआ ।
दलित रसोइये द्वारा पकाये भोजन को लेकर बखेड़ा करने के पीछे एक दूसरा घृणित अर्थशास्त्र भी है । जिन पाठशालाओं में मिड-डे-मील खिलाया जाता है वहां मात्र गरीबों के बच्चे खाने और छात्रवृत्ति प्राप्त करने जाते हैं । इन पाठशालाओं में जितने बच्चों के नाम दर्ज हैं, उसके पांचवें भाग के बराबर ही बच्चे मिड-डे-मील खाने आते हैं । अधिक से अधिक बच्चों के नाम इसलिए दर्ज करा दिए जाते हैं जिससे ज्यादा राशन, ज्यादा सरकारी धन मिल सके और उसका सदुपयोग इस तन्त्र के तमाम पायदानों से लेकर प्रधान और प्रधानाध्यापक तक कर सकें । बच्चों की अधिक संख्या दिखाकर ही तो मिड-डे-मील योजना की सफलता के डंके पीटे जाते हैं । जबकि हकीकत यह है कि एक बच्चे का नाम दो-दो सरकारी पाठशालाओं में दर्ज हैं और वह पढ़ने जाता है गांव के निजी पाठशाला में । प्रधान और प्रधानाध्यापक को इन बच्चों के अभिभावक सहयोग इसलिए करते हैं जिससे उनके बच्चे को मुफ्त में प्रत्येक पाठशाला से तीन सौ रुपए वार्षिक छात्रवृत्ति मिलती रहे । यानी कि एक बच्चे का नाम दो प्राथमिक पाठशालाओं में दर्ज होगा तो दोनों जगहों से कुल छ: सौ रुपए वार्षिक छात्रवृत्ति मिल जायेगी । दलित रसोइये द्वारा पके खाने को अपवित्र बता कर बच्चों को न खाने की प्रेरणा देने वाले गुरूजी, मिड-डे-मील का राशन बचा कर बाजारों में बेच लेंगे । दलित के हाथ का बना मिड-डे-मील से परहेज के कारण न तो बच्चे पढ़ने आयेंगे न गुरुजी को पढ़ाने आना पड़ेगा । वेतन मुफ्त में मिलेगा ही । ऊपर से विद्यालय भवन निर्माण की ठेकेदारी से लाभ ही लाभ है । गुरुजी के घर पैसा बरसेगा तो ऊपर वालों को साधने में कठिनाई न होगी । कुल मिलाकर समाज में जातिवादी एड्स ऐसे ही वर्णवादी गुरूओं द्वारा बांटा और बढ़ाया गया है जो शुरू से ही बच्चों के मस्तिष्क में ऊंच-नीच की भावना भर देते हैं । जिन बच्चों को क, ख, ग... नहीं आता उन्हें जातिवादी घृणा का पाठ पढ़ा दिया जाता है । तभी तो औरैया के प्राथमिक पाठशाला भाऊपुर फंफूद की कक्षा तीन की छात्रा मनोरमा कहती है -` पापा ने कहा है कि नीची जाति के हाथ का बना खाना नहीं खाना ।´ ऐसा है सवर्णवाद का अमानवीय और क्रूर चेहरा । सवर्णवाद के आगे नतमस्तक दिखते प्रशासन ने आखिर कार दलित रसोइया तैनात करने की अनिवार्यता समाप्त कर दी है ।
आज दलित के हाथ का बना खाना न खाने के लिए एक सवर्ण प्रधानाध्यापक नब्बे दिन तक व्रत लेने की बात कहता है तो हमें जातिवादी मिजाज में रत्ती भर न हुए बदलाव को आसानी से समझा लेना चाहिए । मिड-डे-मील जैसी योजनाएं दरअसल दलितों का भला करने के बजाय शैक्षिक और सामाजिक रूप से बर्बाद कर रही हैं । उनके आगे बढ़ने के रास्तों पर अवरोध खड़ा कर, कुंठित और अपमानित कर रही हैं तथा गांव की चहारदीवारी से बाहर जाने से रोक रही हैं । इक्वीसवीं सदी की दहलीज पर खड़ा भारत का पढ़ा-लिखा तबका जातिवादी मानसिकता से उबरने के बजाय, इसमें धंसता जा रहा है । पंजाब, हरियाणा जैसे समृद्ध राज्यों में दलित महिलाओं के साथ सामूहिक बलात्कार हो रहे हैं और पानी मांगने पर पेशाब पिलाया जा रहा है । तब हैवानियत की हद तक पहुंच चुके इस इंटरनेटयुक्त समाज में जाति विहिन राजनीति की फिलहाल कल्पना नहीं की जा सकती । मनुष्यता धर्म से ऊपर है, यह स्वीकार किये बिना ऐसी मानसिकता से मुक्ति सम्भव नहीं है । राजनीति तो जातिवाद को संरक्षित और फलने-फूलने का अवसर देती ही रहेगी क्योंकि उसने भारतीय समाज को विखण्डित कर सत्ता हासिल करने की संस्कृति इतिहास से सीखी है ।
सुभाष चन्द्र कुशवाहा
`सृजन´
बी-4/140 विशाल खंड़
गोमतीनगर, लखनऊ -226010
Subhash Chandra Kushwaha's literary works including stories and articles in Hindi which is focussed around social awareness and other issues regarding India.
रविवार, 1 अगस्त 2010
शनिवार, 17 जुलाई 2010
बरसाती पानी के संरक्षण की जरूरत
आशंका बलवती होती जा रही है कि धरती से पानी खत्म हो रहा है । नदियां, नाले, झीलें सूख रही हैं । ग्लैशियर पिघल रहे हैं । जमीनी पानी दिनों-दिन नीचे खिसकता जा रहा है । पीने के पानी की विकराल होती समस्या के कारण मार-पीट, धरना-प्रदर्शन, तोड़-फोड़ की नौबत आने लगी है । पानी के कुप्रबंध के कारण प्रकृति की पूरी संरचना बिगड़ चुकी जान पड़ने लगी है । हमने आज के विकास की कीमत पर कल के विनाश की इबारत अपने हाथों लिख दी है । हम अपनी गलतियों को सुधारने के बजाए,गाल बजा रहे हैं । नतीजा यह है कि हमारी नादानियों की वजह से इक्वीसवीं सदी के अन्त तक गंगा को पानी देने वाला ग्लैशियर हमेशा के लिए पिघल जायेगा । हिमालय से निकलने वाली सभी नदियां सूख जायेंगी । केवल गंगा पर 50 करोड़ लोगों का जीवन निर्भर हैं । नदियों के सूखते ही धरती पर रक्तरंजित मार-काट मचेगी और फिर मानव सभ्यता का दुखद अन्त हो जायेगा । यह कोई भविष्यवाणी नहीं है । कल का यथार्थ है ।
संयुक्त राष्ट्र संघ की रिपोर्ट के अनुसार सन् 2050 तक चार अरब लोग पानी की कमी से प्रभावित होंगे । आज भी एक अरब लोगों को शुद्ध पानी नसीब नहीं है । मुम्बई महानगर को पानी देने वाली चार महत्वपूर्ण झीलें सूख रही हैं । दूसरी ओर बारिश में मुम्बई की सड़कों पर जलभराव का मंजर हर साल देखने को मिलता है । ऐसे में बरसाती पानी से झीलों को भरने की कार्ययोजना क्यों नहीं बनाई जाती ।
हमारे नीति नियन्ताओं की कार्ययोजना में गम्भीरता का मतलब महज यही है कि बारिश न होने पर वे जगह-जगह हवन, पूजा, यज्ञ कराकर, टी0वी0 पर दिखा देते हैं और समस्या को भगवान की ओर खिसका कर चैन से सांस लेते हैं । बरसात के लिए महिलाओं द्वारा नंगी होकर हल चलाने, बच्चों के कीचड़ में लोटने या मेढ़क-मेढ़की की शादी कराकर इन्द्र देवता को रिझाने जैसे टोटकों को प्रसारित कराते हैं और अपने द्वारा पैदा की गई समस्याओं को कभी ग्लोवल वार्मिंग का कारण बताकर तो कभी भगवान की मर्जी बताकर ढंक देते हैं ।
नदियों से नहरों का संजाल फैलाते समय जो गुलाबी तस्वीर पेश की गई थी वह महज दो-तीन दशकों में मटमैली हो गई है । अधिकांश नहरों के अन्तिम सिरे(टेल) तक पानी नहीं पहुंचता । नहरें गाद से भर गई हैं । नदियों का पानी खेतों तक पहुंचने के बजाय, वाष्प बनकर उड़ रहा है और नदियों को सुखता जा रहा है । आजादी के बाद देश में जलसंरक्षण के जितने भी साधन थे, धीरे-धीरे हमने सबको भूमाफियाओं के हवाले कर दिया, जहां उन्होंने अपने लाभ के लिए कंकरीट के जंगल उगाए । विकास के आधुनिक तौर-तरीकों के नाम पर हमने खेती, सिंचाई की पूरी संरचना बदल दी । जहां पहले जमीनी पानी का इस्तेमाल न कर, परंपरागत जलस्त्रोतों से सिंचाई होती थी वहीं परंपरागत जलस्त्रोतों यथा-तालाब, कुएं और झीलों की हमने उपेक्षा कर जगह-जगह ट्यूबवेल लगा कर जमीनी पानी का दोहन किया । ट्यूबवेलों के प्रचलन ने न केवल कुओं और तालाबों को पाटा अपितु जमीनी पानी को निचोड़ कर पूरे ऋतु चक्र को प्रभावित किया । कुओं और तालाबों के माध्यम से बरसाती पानी, जमीनी पानी के तल को बनाए रखता था। गांवों में जगह-जगह खुदे कुएं `रेन वाटर हार्वेस्टिंग का काम करते थे । आज गांवों में कुएं दिखाई नहीं देते । यही हाल तालाबों का है । जमीनों को पट्टों पर देने की राजनीति ने तमाम भूमाफियाओं को तालाबों की जमीन पर कब्जा दिला दिया । मिट्टी के बरतनों, घरों का निर्माण रूकने से बचे-खुचे तालाब भरते गए । उनके पाट सिमटते गए । आज इक्का-दुक्का ही ऐसे तालाब बचे हैं जो पूरे साल बरसाती पानी को बचाये रखने की क्षमता रखते हैं । सामन्त, राजे-महाराजे अपनी शौक के लिए ही सही, मगर तालाबों और झीलों के संरक्षण पर विशेष ध्यान देते थे । हमारी लोकतन्त्रात्मक दृष्टि उनसे भी गई गुजरी है । या यों कहें ,हमारे पास ऐसी कोई दृष्टि है ही नहीं ।
अब हमें बरसाती पानी को बचाने के बारे में गम्भीरता से सोचने की जरूरत है । बरसाती पानी बचा कर जमीनी पानी बढाने के लाभदायक परिणाम के सम्बंध में केरल का एक उदाहरण हमारे सामने है । सन् 2005 में केरल पब्लिक स्कूल ने अपने 250 वर्ग मीटर छत से 2,40,000 लीटर बरसाती पानी को संरक्षित कर अपने जमीनी पानी को इतना बढ़ा लिया कि अब गर्मियों में भी वहां कुएं और ट्यूबवेल नहीं सूखते ।
जमीनी पानी के स्तर को नीचे खिसकने से बचाने के लिए रेन वाटर हार्वेस्टिंग ही एक मात्र विकल्प है । विश्व बैंक की रिपोर्ट के अनुसार यदि हमने बरसाती पानी को संरक्षित कर जमीनी पानी के स्तर को बचाने की कोशिश नहीं की तो पानी की वर्तमान उपलब्धता 500 घन किलोमीटर से घट कर स्न 2050 तक मात्र 80 घन किलोमीटर रह जायेगी । विश्व बैंक की रिपोर्ट के अनुसार आज जहां भारत का 15 प्रतिशत भू-भाग पानी के गम्भीर संकट से घिरा हुआ है वहीं सन् 2030 तक 60 प्रतिशत भू-भाग इसकी चपेट में आ जायेगा । सबसे पहले वही क्षेत्र संकटग्रस्त होंगे जहां जमीनी पानी का ज्यादा दोहन हो रहा है जैसे राजस्थान, पंजाब, हरियाण, तमिलनाडु और कर्नाटक ।
रेन वाटर हार्वेस्टिंग के बारे में हकीकत में कुछ नहीं किया जा रहा । शहरों में सड़कों के किनारे, बरसाती पानी को जमीन में संरक्षित करने के लिए अभी तक कोई योजना अमल में नहीं लाई जा रही है । छतों के बरसाती पानी को जमीन में पहुंचाने की बाध्यकारी योजनाएं कार्यरूप में नहीं हैं । कागजी कार्यवाहियां, पानी के संकट से हमें उबार नहीं पायेंगी । दिनों-दिन पक्की होती जा रही जमीनों से पानी जमीन के अन्दर नहीं जा पाता और यूं ही वाष्प बनकर उड़ जाता है ।
हमें बरसाती पानी के हर बून्द के संरक्षण के बारे में गंमीरता से सोचना चाहिए । हालात चिन्ताजनक हैं और टोटकों से हल नहीं होने वाला है । वोट बैंक के लहलहाने के लिए आबादी नियन्त्रित करने की कोई योजना बनती दिखाई नहीं देती । ऐसे में ज्यादा आबादी के लिए पानी की जरूरतें बढ़ती जायेंगी । दिनोन्दिन कम होते पानी की पूर्ति के लिए जरूरत है तालाबों, झीलों को गहरा और विस्तार दिया जाए । शहरी बस्तियों में पार्कों और सार्वजनिक स्थलों पर गहरे तालाबों का निर्माण कर बरसाती पानी को जमा किया जाए । घरों के प्रयुक्त पानी को नालियों में बहाने के बजाए पुन: जमीन में डाल कर संरक्षित किया जाए । बरसाती पानी को संरक्षित कर हम कुओं, तालाबों, झीलों के माध्यम से जमीनी पानी के स्तर को बढ़ा सकते हैं ।
सुभाष चन्द्र कुशवाहा
बी 4/140 विशालखण्ड
गोमतीनगर, लखनऊ 226010
संयुक्त राष्ट्र संघ की रिपोर्ट के अनुसार सन् 2050 तक चार अरब लोग पानी की कमी से प्रभावित होंगे । आज भी एक अरब लोगों को शुद्ध पानी नसीब नहीं है । मुम्बई महानगर को पानी देने वाली चार महत्वपूर्ण झीलें सूख रही हैं । दूसरी ओर बारिश में मुम्बई की सड़कों पर जलभराव का मंजर हर साल देखने को मिलता है । ऐसे में बरसाती पानी से झीलों को भरने की कार्ययोजना क्यों नहीं बनाई जाती ।
हमारे नीति नियन्ताओं की कार्ययोजना में गम्भीरता का मतलब महज यही है कि बारिश न होने पर वे जगह-जगह हवन, पूजा, यज्ञ कराकर, टी0वी0 पर दिखा देते हैं और समस्या को भगवान की ओर खिसका कर चैन से सांस लेते हैं । बरसात के लिए महिलाओं द्वारा नंगी होकर हल चलाने, बच्चों के कीचड़ में लोटने या मेढ़क-मेढ़की की शादी कराकर इन्द्र देवता को रिझाने जैसे टोटकों को प्रसारित कराते हैं और अपने द्वारा पैदा की गई समस्याओं को कभी ग्लोवल वार्मिंग का कारण बताकर तो कभी भगवान की मर्जी बताकर ढंक देते हैं ।
नदियों से नहरों का संजाल फैलाते समय जो गुलाबी तस्वीर पेश की गई थी वह महज दो-तीन दशकों में मटमैली हो गई है । अधिकांश नहरों के अन्तिम सिरे(टेल) तक पानी नहीं पहुंचता । नहरें गाद से भर गई हैं । नदियों का पानी खेतों तक पहुंचने के बजाय, वाष्प बनकर उड़ रहा है और नदियों को सुखता जा रहा है । आजादी के बाद देश में जलसंरक्षण के जितने भी साधन थे, धीरे-धीरे हमने सबको भूमाफियाओं के हवाले कर दिया, जहां उन्होंने अपने लाभ के लिए कंकरीट के जंगल उगाए । विकास के आधुनिक तौर-तरीकों के नाम पर हमने खेती, सिंचाई की पूरी संरचना बदल दी । जहां पहले जमीनी पानी का इस्तेमाल न कर, परंपरागत जलस्त्रोतों से सिंचाई होती थी वहीं परंपरागत जलस्त्रोतों यथा-तालाब, कुएं और झीलों की हमने उपेक्षा कर जगह-जगह ट्यूबवेल लगा कर जमीनी पानी का दोहन किया । ट्यूबवेलों के प्रचलन ने न केवल कुओं और तालाबों को पाटा अपितु जमीनी पानी को निचोड़ कर पूरे ऋतु चक्र को प्रभावित किया । कुओं और तालाबों के माध्यम से बरसाती पानी, जमीनी पानी के तल को बनाए रखता था। गांवों में जगह-जगह खुदे कुएं `रेन वाटर हार्वेस्टिंग का काम करते थे । आज गांवों में कुएं दिखाई नहीं देते । यही हाल तालाबों का है । जमीनों को पट्टों पर देने की राजनीति ने तमाम भूमाफियाओं को तालाबों की जमीन पर कब्जा दिला दिया । मिट्टी के बरतनों, घरों का निर्माण रूकने से बचे-खुचे तालाब भरते गए । उनके पाट सिमटते गए । आज इक्का-दुक्का ही ऐसे तालाब बचे हैं जो पूरे साल बरसाती पानी को बचाये रखने की क्षमता रखते हैं । सामन्त, राजे-महाराजे अपनी शौक के लिए ही सही, मगर तालाबों और झीलों के संरक्षण पर विशेष ध्यान देते थे । हमारी लोकतन्त्रात्मक दृष्टि उनसे भी गई गुजरी है । या यों कहें ,हमारे पास ऐसी कोई दृष्टि है ही नहीं ।
अब हमें बरसाती पानी को बचाने के बारे में गम्भीरता से सोचने की जरूरत है । बरसाती पानी बचा कर जमीनी पानी बढाने के लाभदायक परिणाम के सम्बंध में केरल का एक उदाहरण हमारे सामने है । सन् 2005 में केरल पब्लिक स्कूल ने अपने 250 वर्ग मीटर छत से 2,40,000 लीटर बरसाती पानी को संरक्षित कर अपने जमीनी पानी को इतना बढ़ा लिया कि अब गर्मियों में भी वहां कुएं और ट्यूबवेल नहीं सूखते ।
जमीनी पानी के स्तर को नीचे खिसकने से बचाने के लिए रेन वाटर हार्वेस्टिंग ही एक मात्र विकल्प है । विश्व बैंक की रिपोर्ट के अनुसार यदि हमने बरसाती पानी को संरक्षित कर जमीनी पानी के स्तर को बचाने की कोशिश नहीं की तो पानी की वर्तमान उपलब्धता 500 घन किलोमीटर से घट कर स्न 2050 तक मात्र 80 घन किलोमीटर रह जायेगी । विश्व बैंक की रिपोर्ट के अनुसार आज जहां भारत का 15 प्रतिशत भू-भाग पानी के गम्भीर संकट से घिरा हुआ है वहीं सन् 2030 तक 60 प्रतिशत भू-भाग इसकी चपेट में आ जायेगा । सबसे पहले वही क्षेत्र संकटग्रस्त होंगे जहां जमीनी पानी का ज्यादा दोहन हो रहा है जैसे राजस्थान, पंजाब, हरियाण, तमिलनाडु और कर्नाटक ।
रेन वाटर हार्वेस्टिंग के बारे में हकीकत में कुछ नहीं किया जा रहा । शहरों में सड़कों के किनारे, बरसाती पानी को जमीन में संरक्षित करने के लिए अभी तक कोई योजना अमल में नहीं लाई जा रही है । छतों के बरसाती पानी को जमीन में पहुंचाने की बाध्यकारी योजनाएं कार्यरूप में नहीं हैं । कागजी कार्यवाहियां, पानी के संकट से हमें उबार नहीं पायेंगी । दिनों-दिन पक्की होती जा रही जमीनों से पानी जमीन के अन्दर नहीं जा पाता और यूं ही वाष्प बनकर उड़ जाता है ।
हमें बरसाती पानी के हर बून्द के संरक्षण के बारे में गंमीरता से सोचना चाहिए । हालात चिन्ताजनक हैं और टोटकों से हल नहीं होने वाला है । वोट बैंक के लहलहाने के लिए आबादी नियन्त्रित करने की कोई योजना बनती दिखाई नहीं देती । ऐसे में ज्यादा आबादी के लिए पानी की जरूरतें बढ़ती जायेंगी । दिनोन्दिन कम होते पानी की पूर्ति के लिए जरूरत है तालाबों, झीलों को गहरा और विस्तार दिया जाए । शहरी बस्तियों में पार्कों और सार्वजनिक स्थलों पर गहरे तालाबों का निर्माण कर बरसाती पानी को जमा किया जाए । घरों के प्रयुक्त पानी को नालियों में बहाने के बजाए पुन: जमीन में डाल कर संरक्षित किया जाए । बरसाती पानी को संरक्षित कर हम कुओं, तालाबों, झीलों के माध्यम से जमीनी पानी के स्तर को बढ़ा सकते हैं ।
सुभाष चन्द्र कुशवाहा
बी 4/140 विशालखण्ड
गोमतीनगर, लखनऊ 226010
सोमवार, 21 जून 2010
हमारी जान की कीमत कितनी है ?
राष्ट्र प्रभुसत्ता, राष्ट्रभक्ति, जनपक्षधरता को गिरवी रख, महाशक्तियों के आगे दुम हिलाने की संस्कृति हमारे खून में घुली-मिली है । आजादी पर सत्ता के दलालों का कब्जा ब्रिटिश हुकूमत से विरासत में मिली है । ऐसे में पन्द्रह हजार जानों को निगलने वाले एण्डरसन को सरकारी विमान से भगा देने, हजारों लाशों और लाखों अपाहिजों की आवाज को अनसुना करने वाले एक बार फिर राहत, मुआवजा और पुनर्वास का खेल खेलने की तैयार में हैं । यह खेल जितनी जल्दी शुरू होगा, लोगों का ध्यान उतनी जल्दी एण्डरसन और परमाणु दायित्व विधेयक से हटेगा । वाशिंगटन और दिल्ली में बैठे नियन्ताओं की रणनीति इन्हीं बातों को ध्यान में रख कर बनाई जा रही है ।
देश में घटित इतनी बड़ी त्रासदी की लड़ाई भोपाल गैस पीड़ितों ने अपने दम पर लड़ी है । आज अपना दामन पाक-साफ दिखाने वाली किसी भी पार्टी ने इन वर्षों में भोपाल गैस पीड़ितों के आन्दोलन को अपना एजेण्डा नहीं बनाया । महज कुछ कोरे बयानों से काम चला लेने की प्रवृत्ति से वे आगे न बढ़ पाईं । यह है हमारी चुनावबाज पार्टियों का वर्ग चरित्र और जनपक्षधरता जो अपनों से गद्दारी करती है और अमेरिका से यारी । दरअसल हमारे कर्णधारों की नज़रों में गरीबों की जान की कीमत महज कुछ हजार की सहायता मात्र है । वे सदा पूंजीपतियों की हिफाजत में रहते हैं और अमेरिका जैसे हत्यारे देश के तलवे चाटते हैं । उसके राष्ट्रपति से हाथ मिलाने के लिए अपनों से धक्कामुक्की करते हैं । अब छब्बीस साल बाद जब गैस पीड़ितों की दूसरी पीढ़ी बर्बादी की ओर बढ़ चुकी है, मुआवजा और पुनर्वास के नए शगूफे के द्वारा एण्डरसन मामले में फंसे अपने दामन को ढंकने का प्रयास तेज किया जा रहा है । सम्भव है एक कदम आगे बढ़ाकर, एण्डरसन की वापसी की मांग कर जनता को यह दिखाने का प्रयास भी किया जाये कि हम आप के हितैषी हैं । जबकि हकीकत सभी जानते हैं कि हमने अब तक एण्डरसन के बचाव में अमेरिका को इतने लिखित दस्तावेज मुहैया करा दिये हैं, जिनके बल पर वह हमारे प्रत्यर्पण की मांग को आसानी से ठुकरा देगा । बेशक सब जानते हुए ही हमारे रहनुमा यह मांग करेंगे क्योंकि वे जानते हैं कि मांग करना कोई अपराध नहीं है । बदले में जनता से कहने-सुनाने के लिए बहाना मिल जायेगा कि हम प्रत्यर्पण के लिए प्रयत्नशील हैं । ले देकर कुछ और सालों में वृद्ध एण्डरसन चल बसेंगे और हम अपनी राष्ट्रभक्ति पर पड़े़ दाग को छिपा ले जायेंगे ।
इस देश के गरीबों की जान जितनी सस्ती है उतनी अमेरिका के मवेशियों की भी नहीं है । वे अपने कुत्ते, बिल्लियों पर खतरनाक रसायनों का परीक्षण करने के बजाय, भारत जैसे गरीब मुल्कों के आदमियों पर कर लेते हैं । उनके लिए हम गिनी पिग हैं । आज भोपाल गैस काण्ड और यूनियन कार्बाइड की चर्चा मात्र इसलिए हो रही है कि वहां गैस रिसाव से एक ही समय हजारों की मौत प्रत्यक्ष रूप में हुई । अपने देश में अमेरिका जैसों की हरकतों से अप्रत्यक्ष मौतों का आंकड़ा इससे कहीं ज्यादा है और वह दिखाई नहीं देता । अमेरिका की ऐसी तमाम कंपनियां अपने लाभ के लिए वर्षों से हमारे लोगों में जहर घोल कर कैंसर, दमा, तपेदिक जैसी बीमारियां बांट कर मार रही हैं । जिन रसायनों को अमेरिका अपने देश में प्रतिबंधित करता है उन्हीं रसायनों को उसकी कोई कंपनी भारत में बेचती है । डी0डी0टी0 1972 से और डेलड्रीन 1970 से अमेरिका में प्रतिबंधित हैं पर अपने देश में वह बेची जाती है । अमेरिकी बहुराष्ट्रीय कंपनियां बी0टी0 बैगन जैसे हानिकारक बीजों को लेकर हमारे यहां आती हैं जबकि उन्हीं का देश उनको उगाने की इजाजत नहीं देता। वे जानती हैं कि इस देश के गरीबों को अपने लाभ के लिए जब चाहो, जैसे चाहो मार दो, कुछ होता नहीं । भारतीय खाद्य पदार्थों को विषैला बता कर अपने यहां निर्यात रोकने वाला अमेरिका इस तथ्य को अनदेखा कर जाता है कि विषाक्त रसायनों को बनाने वाली ज्यादातर कंपनियां उसी के देश की हैं ।
एक अमेरिकी सैनिक की मौत पर अमेरिका दहल उठता है जबकि उसके दबाव में दुनिया के तमाम मुल्कों में तीसरी दुनिया की सेनायें मरने-खपने के लिए भेज दी जाती हैं । अमेरिका इराक से तेल निचोड़ने का काम खुद करता है पर अफगानिस्तान जैसे अशान्त मुल्क में जहां हर वक्त जीवन खतरे में है, सड़क निर्माण जैसे कामों में भारत को लगाता है । परमाणु सुरक्षा के जिन कड़े मापदंड़ों को उसने अपने देश में लागू कर रखा है, उनसे इतर दूसरे देश में लचर कानून बनवा कर वह अपना लाभ सुरक्षित रखना चाहता है । जैसे कि परमाणु ऊर्जा संयन्त्र के संचालकों के लिए दुर्घटना पर महज 500 करोड़ की सहायता राशि देने का प्राविधान किया गया है जबकि अमेरिका में यह राशि 500 अरब से भी ज्यादा हो सकती है । यानी कि एक अमेरिकी की कीमत के मायने और हैं और भारतीय के और । अपने लोगों की हिफाजत के लिए वह जब चाहे, जहां चाहे बमबारी कर सकता है। वह एक आतंकी को मारने के लिए मानव रहित विमानों से या कलस्टर बमों से सैकड़ों निर्दोषों को मार सकता है । पर उसकी ओर कोई सवाल उठाये तो वह गुर्राने लगता है । ऐसे मानव विरोधी महाशक्ति से दूरी बनाने के बजाय, हमारे कर्णधार परमाणु प्रसार से लेकर कृषि सब्सीडी घटाने, पेटेंटीकरण, डंकल बीजों और कारपोरेट खेती के माध्यम से भारतीय किसानों को तबाह करने पर उतारू है । आखिर इन्हीं अमेरिका परस्त नीतियों के कारण तो अपने देश में भोपाल गैस त्रासदी से कई गुना ज्यादा किसानों ने आत्महत्या की है । भारत में नाभिकीय दुर्घटनाओं से रिएक्टर आपूर्ति कर्ता अमेरिकी कंपनियों को बचाने के लिए अमेरिका भारतीय कर्णधारों पर दबाव बना कर ऐसा कानून बनवा देना चाहता है जिससे भोपाल गैस त्रासदी जैसे फैसलों की गुंजाइश भी न बचे । धारा 35 के अनुसार वह ऐसे हादसों की सुनवाई का अधिकार भी दीवानी अदालतों के बजाय `दावा आयुक्त´ को देना चाहता है । जबकि हमारी जनपक्षधर सरकार बेचैन है परमाणु दायित्व विधेयक को जल्द से जल्द पास कर देने के लिए । यह है हमारी सरकार के लिए इस देश की जनता की कीमत ? फिर आप एण्डरसन के पीछे क्यों पड़े हैं भाई ? हमारे देश में तो तमाम एण्डरसन भरे पड़े हैं । जिस एण्डरसन के खिलाफ एफ0आई0आर दर्ज था, उसे बिना कोर्ट की मर्जी के हमारे कर्णधार जमानत दिलाकर भगा देते हैं और तब भी वे सत्ता सुख भोगते रहते हैं । आज भी तमाम बहुराष्ट्रीय कंपनियां अपने आर्थिक हितों के लिए हमारे जंगल, पर्यावरण को निगल रही हैं, लोगों के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ कर रही हैं और उन्हें माओवादियों की ओर जाने के लिए बाध्य कर रही हैं परन्तु हमारे कर्णधारों को उनका अपराध दिखाई नहीं देता । वे अपनी जनता को पूजींपतियों और हत्यारों के हवाले कर राहत, पुनर्वास और मुआवजों का खेल खेल रहे हैं ।
सुभाष चन्द्र कुशवाहा
बी 4/140 विशालखण्ड, गोमतीनगर, लखनऊ ।
राष्ट्र प्रभुसत्ता, राष्ट्रभक्ति, जनपक्षधरता को गिरवी रख, महाशक्तियों के आगे दुम हिलाने की संस्कृति हमारे खून में घुली-मिली है । आजादी पर सत्ता के दलालों का कब्जा ब्रिटिश हुकूमत से विरासत में मिली है । ऐसे में पन्द्रह हजार जानों को निगलने वाले एण्डरसन को सरकारी विमान से भगा देने, हजारों लाशों और लाखों अपाहिजों की आवाज को अनसुना करने वाले एक बार फिर राहत, मुआवजा और पुनर्वास का खेल खेलने की तैयार में हैं । यह खेल जितनी जल्दी शुरू होगा, लोगों का ध्यान उतनी जल्दी एण्डरसन और परमाणु दायित्व विधेयक से हटेगा । वाशिंगटन और दिल्ली में बैठे नियन्ताओं की रणनीति इन्हीं बातों को ध्यान में रख कर बनाई जा रही है ।
देश में घटित इतनी बड़ी त्रासदी की लड़ाई भोपाल गैस पीड़ितों ने अपने दम पर लड़ी है । आज अपना दामन पाक-साफ दिखाने वाली किसी भी पार्टी ने इन वर्षों में भोपाल गैस पीड़ितों के आन्दोलन को अपना एजेण्डा नहीं बनाया । महज कुछ कोरे बयानों से काम चला लेने की प्रवृत्ति से वे आगे न बढ़ पाईं । यह है हमारी चुनावबाज पार्टियों का वर्ग चरित्र और जनपक्षधरता जो अपनों से गद्दारी करती है और अमेरिका से यारी । दरअसल हमारे कर्णधारों की नज़रों में गरीबों की जान की कीमत महज कुछ हजार की सहायता मात्र है । वे सदा पूंजीपतियों की हिफाजत में रहते हैं और अमेरिका जैसे हत्यारे देश के तलवे चाटते हैं । उसके राष्ट्रपति से हाथ मिलाने के लिए अपनों से धक्कामुक्की करते हैं । अब छब्बीस साल बाद जब गैस पीड़ितों की दूसरी पीढ़ी बर्बादी की ओर बढ़ चुकी है, मुआवजा और पुनर्वास के नए शगूफे के द्वारा एण्डरसन मामले में फंसे अपने दामन को ढंकने का प्रयास तेज किया जा रहा है । सम्भव है एक कदम आगे बढ़ाकर, एण्डरसन की वापसी की मांग कर जनता को यह दिखाने का प्रयास भी किया जाये कि हम आप के हितैषी हैं । जबकि हकीकत सभी जानते हैं कि हमने अब तक एण्डरसन के बचाव में अमेरिका को इतने लिखित दस्तावेज मुहैया करा दिये हैं, जिनके बल पर वह हमारे प्रत्यर्पण की मांग को आसानी से ठुकरा देगा । बेशक सब जानते हुए ही हमारे रहनुमा यह मांग करेंगे क्योंकि वे जानते हैं कि मांग करना कोई अपराध नहीं है । बदले में जनता से कहने-सुनाने के लिए बहाना मिल जायेगा कि हम प्रत्यर्पण के लिए प्रयत्नशील हैं । ले देकर कुछ और सालों में वृद्ध एण्डरसन चल बसेंगे और हम अपनी राष्ट्रभक्ति पर पड़े़ दाग को छिपा ले जायेंगे ।
इस देश के गरीबों की जान जितनी सस्ती है उतनी अमेरिका के मवेशियों की भी नहीं है । वे अपने कुत्ते, बिल्लियों पर खतरनाक रसायनों का परीक्षण करने के बजाय, भारत जैसे गरीब मुल्कों के आदमियों पर कर लेते हैं । उनके लिए हम गिनी पिग हैं । आज भोपाल गैस काण्ड और यूनियन कार्बाइड की चर्चा मात्र इसलिए हो रही है कि वहां गैस रिसाव से एक ही समय हजारों की मौत प्रत्यक्ष रूप में हुई । अपने देश में अमेरिका जैसों की हरकतों से अप्रत्यक्ष मौतों का आंकड़ा इससे कहीं ज्यादा है और वह दिखाई नहीं देता । अमेरिका की ऐसी तमाम कंपनियां अपने लाभ के लिए वर्षों से हमारे लोगों में जहर घोल कर कैंसर, दमा, तपेदिक जैसी बीमारियां बांट कर मार रही हैं । जिन रसायनों को अमेरिका अपने देश में प्रतिबंधित करता है उन्हीं रसायनों को उसकी कोई कंपनी भारत में बेचती है । डी0डी0टी0 1972 से और डेलड्रीन 1970 से अमेरिका में प्रतिबंधित हैं पर अपने देश में वह बेची जाती है । अमेरिकी बहुराष्ट्रीय कंपनियां बी0टी0 बैगन जैसे हानिकारक बीजों को लेकर हमारे यहां आती हैं जबकि उन्हीं का देश उनको उगाने की इजाजत नहीं देता। वे जानती हैं कि इस देश के गरीबों को अपने लाभ के लिए जब चाहो, जैसे चाहो मार दो, कुछ होता नहीं । भारतीय खाद्य पदार्थों को विषैला बता कर अपने यहां निर्यात रोकने वाला अमेरिका इस तथ्य को अनदेखा कर जाता है कि विषाक्त रसायनों को बनाने वाली ज्यादातर कंपनियां उसी के देश की हैं ।
एक अमेरिकी सैनिक की मौत पर अमेरिका दहल उठता है जबकि उसके दबाव में दुनिया के तमाम मुल्कों में तीसरी दुनिया की सेनायें मरने-खपने के लिए भेज दी जाती हैं । अमेरिका इराक से तेल निचोड़ने का काम खुद करता है पर अफगानिस्तान जैसे अशान्त मुल्क में जहां हर वक्त जीवन खतरे में है, सड़क निर्माण जैसे कामों में भारत को लगाता है । परमाणु सुरक्षा के जिन कड़े मापदंड़ों को उसने अपने देश में लागू कर रखा है, उनसे इतर दूसरे देश में लचर कानून बनवा कर वह अपना लाभ सुरक्षित रखना चाहता है । जैसे कि परमाणु ऊर्जा संयन्त्र के संचालकों के लिए दुर्घटना पर महज 500 करोड़ की सहायता राशि देने का प्राविधान किया गया है जबकि अमेरिका में यह राशि 500 अरब से भी ज्यादा हो सकती है । यानी कि एक अमेरिकी की कीमत के मायने और हैं और भारतीय के और । अपने लोगों की हिफाजत के लिए वह जब चाहे, जहां चाहे बमबारी कर सकता है। वह एक आतंकी को मारने के लिए मानव रहित विमानों से या कलस्टर बमों से सैकड़ों निर्दोषों को मार सकता है । पर उसकी ओर कोई सवाल उठाये तो वह गुर्राने लगता है । ऐसे मानव विरोधी महाशक्ति से दूरी बनाने के बजाय, हमारे कर्णधार परमाणु प्रसार से लेकर कृषि सब्सीडी घटाने, पेटेंटीकरण, डंकल बीजों और कारपोरेट खेती के माध्यम से भारतीय किसानों को तबाह करने पर उतारू है । आखिर इन्हीं अमेरिका परस्त नीतियों के कारण तो अपने देश में भोपाल गैस त्रासदी से कई गुना ज्यादा किसानों ने आत्महत्या की है । भारत में नाभिकीय दुर्घटनाओं से रिएक्टर आपूर्ति कर्ता अमेरिकी कंपनियों को बचाने के लिए अमेरिका भारतीय कर्णधारों पर दबाव बना कर ऐसा कानून बनवा देना चाहता है जिससे भोपाल गैस त्रासदी जैसे फैसलों की गुंजाइश भी न बचे । धारा 35 के अनुसार वह ऐसे हादसों की सुनवाई का अधिकार भी दीवानी अदालतों के बजाय `दावा आयुक्त´ को देना चाहता है । जबकि हमारी जनपक्षधर सरकार बेचैन है परमाणु दायित्व विधेयक को जल्द से जल्द पास कर देने के लिए । यह है हमारी सरकार के लिए इस देश की जनता की कीमत ? फिर आप एण्डरसन के पीछे क्यों पड़े हैं भाई ? हमारे देश में तो तमाम एण्डरसन भरे पड़े हैं । जिस एण्डरसन के खिलाफ एफ0आई0आर दर्ज था, उसे बिना कोर्ट की मर्जी के हमारे कर्णधार जमानत दिलाकर भगा देते हैं और तब भी वे सत्ता सुख भोगते रहते हैं । आज भी तमाम बहुराष्ट्रीय कंपनियां अपने आर्थिक हितों के लिए हमारे जंगल, पर्यावरण को निगल रही हैं, लोगों के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ कर रही हैं और उन्हें माओवादियों की ओर जाने के लिए बाध्य कर रही हैं परन्तु हमारे कर्णधारों को उनका अपराध दिखाई नहीं देता । वे अपनी जनता को पूजींपतियों और हत्यारों के हवाले कर राहत, पुनर्वास और मुआवजों का खेल खेल रहे हैं ।
सुभाष चन्द्र कुशवाहा
बी 4/140 विशालखण्ड, गोमतीनगर, लखनऊ ।
शुक्रवार, 21 मई 2010




लोकरंग 2010
लोकरंग- 2010 : पधारो म्हारो जोगिया रे
कुशीनगर जिले के जोगिया गांव में लोकरंग के तीसरे संस्करण में आठ और नौ मई को लोक कलाकारों, साहित्यकारों, रंगकर्मियों की एक बार फिर जुटान हुई। लोक कलाकारों और साहित्यकारों के लिए जोगिया एक बार फिर सजा धजा था। रंग-बिरंगे झण्डों, पतंगों, गुब्बारों और कविता-गीत के पोस्टरों के साथ। नाट्य मंचन में असुविधा को देखते हुए इस पर गांव के लोगों ने पक्का चबूतरा बना दिया था। इस चबूतरें पर 20 गुणे 12 फीट का भव्य बैकड्राप कार्यक्रम में चार चान्द लगा रहा था । कार्यक्रम में भाग लेने बुन्देलखण्ड से डॉ0 रामभजन सिंह, पटना से तनवीर अख्तर की इप्टा टीम और छत्तीसगढ, रायगढ़ से डॉ0 योगेन्द्र चौबे की गुड़ी टीम तो पहुंची ही थीं साथ ही देश के तमाम लेखक,कवि, कथाकार, रंगकर्मी भी पधारे थे । सभी का कथाकार सुभाष चन्द्र कुशवाहा की अगुवाई में गांव के युवाओं और ग्रामीणों ने टिका लगाकर तुरही की तुरर-तुरर के बीच स्वागत किया। रात्रि में कार्यक्रम स्थल पर पिछले दो कार्यक्रमों के मुकाबले ज्यादा भीड़ जुटी थी । लोग कार्यक्रम शुरू होने का बेसब्री से इन्तजार कर रहे थे।
महाश्वेता देवी जी के सन्देश से हुआ उद्घाटन
लोकरंग-2010 का उद्घाटन सुप्रसिद्ध लेखिका महाश्वेता देवी के सन्देश से हुआ । वह कार्यक्रम की मुख्य अतिथि थीं और उन्हें ही उद्घाटन करना था लेकिन स्वास्थ्य खराब होने के कारण नहीं आ पाई थीं । उन्होंने लोकरंग कार्यक्रम के लिए भेजे लिखित सन्देश में कहा है कि वह लोकरंग में न आ पाने के कारण हृदय से दुखी है । स्वास्थ्य ठीक नहीं हैं और पश्चिम बंगाल में जारी संकट के कारण उन्हें बहुत काम करना पड़ रहा है। इस स्थिति में क्या करूं ? मै लोकरंग कार्यक्रम से बहुत नजदीक से जुड़ाव महसूस करती हूं । उन्होंने पत्र में लोकरंग सांस्कृतिक समिति के अध्यक्ष सुभाष चन्द्र कुशवाहा को इस आयोजन के लिए बधाई देते हुए आयोजन की रिपोर्ट भेजने को कहा है । महाश्वेता देवी का सन्देश आलोचक एवं पत्रकार अनिल सिन्हा ने पढ़ा ।
लोकरंग स्मारिका का लोकार्पण
लोकरंग के उद्घाटन अवसर पर वरिष्ठ कथाकार शिवमूर्ति, आलोचक वीरेन्द्र यादव और नाटककार हृषिकेश सुलभ ने स्मारिका लोकरंग-2010 का लोकार्पण किया । स्मारिका में सोहनी-रोपनी के गीत, मोहर्रम गीत, झारी गीत, होरी गीत, जन्तसार गीत सहित कई गीत संकलित किए गए है । इसके अलावा कई महत्वपूर्ण लेख हैं।
अंजन जी और रामपति रसिया का सम्मान
स्मारिका के लोकार्पण के बाद भोजपुरी क्षेत्र के दो महत्वपूर्ण लोक गीतकारों, राधा मोहन चौबे उर्फ अंजन जी और नथुनी प्रसाद कुशवाहा उर्फ रामपति रसिया को सम्मानित किया गया। अंजन जी बिहार के गोपालगंज जिले के शाहपुर डिघवा गांव के रहने वाले हैं और उन्होंने सैकड़ों लोकगीत लिखे हैं जो उनकी कजरौटा, फुहार, संझवत, पनका, सनेश आदि किताबों में संकलित हैं। रामपति रसिया कुशीनगर जिले के मोरवन गांव के रहने वाले हैं। उन्हें 50 से अधिक निर्गुण लिखे हैं जो उनकी पुस्तक अंजोरिया में बदरी में संकलित हैं।
और बजा नक्कारा
उद्घाटन सत्र के बाद सांस्कृतिक कार्यक्रम शुरू हुए। कार्यक्रम की शुरूआत जोगिया गांव की किशोरियों द्वारा छठ गीत व रोपनी गीत से हुआ। इसके बाद दिल्ली से आए कवि रमाशंकर विद्रोही ने काव्य पाठ किया। खास तेवर की कविताओं और उनके पाठ करने के अन्दाज पर साहित्यकारों के साथ-साथ ग्रामीणों ने भी ताली बजाई। गोपालगंज बिहार से आए मोहन गौड़ और उनके साथियों ने फरी नृत्य प्रस्तुत किया। इसमें पहले कलाकारों ने नक्कारे की आवाज पर नृत्य प्रस्तुत किया। इसके बाद उन्होंने बिरहा पर नृत्य किया। अन्तिम भाग में नक्कारे की आवाज के साथ ताल मिलाकर पलटी मारने, गोता लगाने जैसे करतब प्रस्तुत किए गए। बुन्देलखण्ड से आए लोक कलाकारों ने अचरी, बृजवासी और ईसुरी फाग गायन प्रस्तुत किया। अचरी नवरात्रि में रात्रि जागरण में गाया जाने वाला गीत है तो बृजवासी खेतों की कटाई के समय स्त्री और पुरूष मजदूरों द्वारा मिल कर गाने वाला गायन है। फाल्गुनी बयार के शुरू होते ही बुन्देलखण्ड में होली गीत शुरू होते हैं और फाग गायन के पितामह ईशुरी के फाग गाए जाने लगते हैं। बुन्देलखण्डी लोक कलाकारों ने अपनी प्रस्तुतियों से बुन्देलखण्डी लोक संस्कृति की झलक दिखाई। छत्तीसगढ़ से आए गुडी संस्था के कलाकारों ने छत्तीसगढ़ी लोक गीत गाए।
नौ मई के रात के कार्यक्रम की शुरूआत उपेन्द्र चतुर्वेदी और उनकी टीम के भोजपुरी गीतों की प्रस्तुति से हुई। इसके बाद जितई प्रसाद और उनकी टीम ने हुड़का नृत्य प्रस्तुत किया। हुड़का नृत्य प्रस्तुत करने वाली यह टीम महराजगंज जिले के परसौनी बुजुर्ग गांव से आई थी। हुड़का नृत्य के बाद पूर्वी उत्तर प्रदेश के एक और मशहूर लोकनृत्य पखावज को चिखुरी, सुखराज, शोभी प्रसाद और उनके साथियों ने प्रस्तुत किया। दोनों ही नृत्य अब बहुत कम देखने को मिलते हैं। कार्यक्रम में फाजिलनगर के संगीत अध्यापक मंगल मास्टर ने दो भोजपुरी गीतों को प्रस्तुत किया। जब उन्होंने अंजन जी का गीत चिन्ता की अगनी तोहके लेस लेस खा जइहें ए मैना तू असरा छोड़ तोता अब ना अइहें और ऐतना से काम न चली न कटी विपतिया, रोई-रोई पतिया लिखवाए रजमतिया सुनाई। कुशीनगर जिले के कप्तानंगज से आए कौव्वाल असगर अली और उनके साथियों ने अमीर खुसरो की रचना छाप तिलक सब छीनी रे मोसे नैना मिलाय के, अनवर फर्रूखाबादी की रचना बस तुम्हारे करीब आने से, दुश्मनी हो गई जमाने से और दानिश जौनपुरी की रचना पत्थर की इबादत से तुझे कुछ नहीं मिलेगा, दिल में मेरी तस्वीर सजा क्यूं नहीं लेते सुनाकर लोगों की वाहवाही पाई।
बाबा पाखण्डी और गबरघिचोरन के माई
लोकरंग में दो नाटकों का मंचन हुआ। आठ मई की रात छत्तीसगढ़ की गुडी संस्था के कलाकारों ने बाबा पाखण्डी नाटक का मंचन किया। छत्तीसगढ़ी लोक कथा पर आधारित यह नाटक एक ऐसे चरित्र के ईद-गिर्द घूमता है जो भविष्यवाणियां करता है और खुद को बाबा के रूप में प्रस्तुत कर लोगों को मूर्ख बनाता है। नाटक में वैश्वीकरण के बाजार में पाखण्ड और अन्धविश्वासों के सहारे पाखण्डियों की पनप रही जमात पर करारा प्रहार किया गया है। नाटक का निर्देशन डॉ0 योगेन्द्र ने किया।
पटना से आई इप्टा की टीम ने भिखारी ठाकुर के दो नाटकों को मिलाकर बनाए गए नाटक गबरघिचोरन के माई की जानदार प्रस्तुति से लोगों का दिल जीत लिया। इस नाटक में स्त्री पीड़ा की मार्मिक अभिव्यक्ति हुई है। वरिष्ठ रंगकर्मी तनवीर अख्तर के निर्देशन में मंचित इस नाटक में युवक गलीच अपनी ब्याहता को छोड़ कलकत्ता चला जाता है और 15 वर्ष तक कोई खोज-खबर नहीं लेता है। इस बीच उसकी पत्नी बच्चे को जन्म देती है। जब गलीज लौटकर आता है तो किशोर हो चुके अपने बेटे को कलकत्ता ले जाने की कोशिश करता है लेकिन उसकी पत्नी उसका विरोध करती है। गबरघिचोर भी मां को छोड़कर परदेश जाने से मना करता है। तभी गांव का एक दूसरा व्यक्ति गड़बड़ी गबरघिचोर को अपना बेटा बताता है। इसको लेकर पंचायत होती है और पंच बने भिखारी ठाकुर गबरघिचोर पर मां का हक बताते हुए उसके पक्ष में फैसला देते हैं।
लोकगीतों को नई धार, विचार से लैस करने की जरूरत
लोकरंग के दूसरे दिन लोकगीतों की प्रासंगिकता पर संगोष्ठी आयोजित की गई । संगोष्ठी में साहित्यकारों ने लोकगीतों और लोकसंस्कृति पर बाजार, अपसंस्कृति और सत्ता के हमले पर चिन्ता जाहिर करते हुए इसको बचाने और नई धार, विचार से लैस करने के लिए आन्दोलन की जरूरत पर बल दिया।
गोष्ठी में शिरकत करते हुए वरिष्ठ आलोचक वीरेन्द्र यादव ने कहा कि लोक का तन्त्र में अधिग्रहण हो गया है। लोकगीत जिन परिस्थितियों में रचे जाते हैं उन स्थितियों का अभी लोप नहीं हुआ है। स्त्रियों, दलितों की पीड़ा अभी भी है। लोकसंस्कृति जिस जमीन पर पनपते थे वह अभी कायम हैं लेकिन उसके कार्य में परिवर्तन जरूर हुआ है। आज गांव बदले हैं, जीवन शैली बदली है लेकिन मूल संवेदना बरकरार है। इस मूल संवेदना को आन्दोलनात्मक तेवर देने की जरूरत है। कवि दिनेश कुशवाह ने कहा कि शुद्र और स्त्रियों ने 75 प्रतिशत लोकगीतों की रचना की है। उन्होंने कई लोकगीतों को लय में गाते हुए लोकमानस से निकले स्रोत को भदेस कह कर खारिज करने वाले अभिजात्य वर्ग की कड़ी आलोचना की। उन्होंने कहा कि भाषाएं और बोली क्षतिग्रस्त हो रही हैं जिसे बचाने की लिए काम करने की जरूरत है। साहित्यकार अरूणेश नीरन ने कहा कि लोकगीत अध्ययन करने की चीज नहीं बल्कि इसे जिया जाता है। उन्होंने लोक को पाश्चात्य फोक से अलग कर विवेचन करने की जरूरत पर बल दिया। कथाकार शिवमूर्ति ने कहा कि लोकगीतों की प्रासंगिकता पर प्रश्न नहीं हैं बल्कि उस पर आ रहे खतरों को पहचानने और उसका मुकाबला करने की जरूरत है। रंगकर्मी राजेश कुमार ने लोकगीतों और लोकनाट्य रूपों की घार के कुन्द होते जाने पर चिन्ता व्यक्त करते हुए इसे सत्ता तन्त्र की गहरी साजिश बताया। पटना से आए लेखक तैयब हुसैन ने कहा कि वैश्वीकरण भाषाई नस्लवाद ला रहा है जो लोकगीतों की उपेक्षा का कारण है। नाटककार हृषिकेश सुलभ ने कहा कि जीवन का यथार्थ बदल रहा है जो लोक संवेदना को भी प्रभावित कर रहा है। उन्होंने कहा कि हमें गांव में रहने वाले लोगों की सांस्कृतिक भूख की चिन्ता करनी होगी। कथाकार देवेन्द्र ने बहस में हस्तक्षेप करते हुए कहा कि जिस तरह आर्थिक संरचना बदल रही है, उसमें सामुदायिक जीवन का ह्रास हो रहा है उसमें सामुदायिकता से उपजे गीत शायद ही बचें।
गोष्ठी की अध्यक्षता कर रहे आलोचक एवं पत्रकार अनिल सिन्हा ने कहा कि लोक गीत हमारे जीवन का मूल रहा है। लोकगीत यथार्थ से उपजी अभिव्यक्ति हैं इसलिए वे नष्ट नहीं होंगे लेकिन उनके उपर बाजारवाद, फूहड़ता, सांस्कृतिक दरिद्रता का खतरा है। गोष्ठी में डॉ0 योगेन्द्र चौबे, रामभजन सिंह, सत्यदेव त्रिपाठी ने भी हिस्सा लिया। संचालन सुधीर सुमन व धन्यवाद ज्ञापन `लोकरंग सांस्कृतिक समिति´ के अध्यक्ष सुभाष चन्द्र कुशवाहा ने किया।
लोकरंग में भाग लेने वाले कलाकारों और आयोजन को सफल बनाने वाले श्री मंजूर अली, विष्णुदेव राय, भुवनेश्वर राय, संजय कुशवाहा, इसरायल अंसारी, मुंशरीम, हदीश अंसारी, सुरेन्द्र शर्मा को लोकरंग सांस्कृतिक समिति की ओर से स्मृति चिन्ह प्रदान करने के साथ ही कार्यक्रम का समापन हुआ। लोकरंग के पहले और दूसरे सत्र का संचालन सुधीर सुमन ने और तीसरे सत्र का संचालन दिनेश कुशवाह ने किया।
मनोज कुमार सिंह
एम0आइ0जी0-71,राप्तीनगर,फेज-1,गोरखपुर 273003
गुरुवार, 15 अप्रैल 2010
श्रमशील समाज में ही लोकगीत जनमते हैं
लोकगीतों का सृजन, सदियों पूर्व बालकंठों और स्त्रियों के अन्तस्थल से हुआ होगा । पुरूषों ने इस क्षेत्र में बाद में प्रवेश किया होगा । ऐसा अनुमान करने के पीछे तमाम कारण हैं । पहला तो यही कि जंगली जानवरों से भय-व्याप्ति के कारण बच्चों ने स्वर दिया होगा:-उटवा-घुटवा, मनारी बाबा पूइ, आज खाबे खिचड़ी, बिहान खाबे घीउ ।´ भूख से बिलबिलाते बच्चों ने आकाश में बगुलों को देख गाया होगा-बगुला, बगुला कहां जात बाड़, हेने आव चाउर द, खुदी द, तहरा बियाह में पानी भरेब । बाद में बच्चों के माध्यम से महिलाओं ने स्वर दिया होगा:-
काच-कुच कौआ खाला ।
दूध-भात बाबू खाला ।
पत्ता उधिआइल जाला ।
कौआ लजाइल जाला ।
बाबू के मुंहवा बिटोरले जाला ।1
लोकगीतों की प्रारंभिक अवस्था में लयप्रधान निरर्थक गीतों की ही रचना हुई होगी। जैसे कि -ओक्का, बोक्का तीन तलोक्का । बाद की अवस्था में अन्त्यानुप्रास रहित लयप्रधान गीतों का सृजन हुआ होगा ।2 इस स्थिति में स्त्रियों ने लोकगीतों को अभिव्यक्ति के मुख्य माध्यम के रूप में सोहर, जन्तसर, निरवाही गीतों को गाया होगा ।
समूह की अवधारणा पर आधारित लोकगीत, स्त्रियों की रुचि, कल्पना और संघर्ष की अभिव्यक्ति के सबसे पुराने माध्यम रहे हैं । या यों कहें कि लोकगीत श्रम करने वाली महिलाओं के ज्यादा करीब रहे हैं । कहरवा, बनज़रवा, पंवारा, बिरहा गीतों के माध्यम से बाद में पुरूषों ने अपने मन विनोद के लिए प्रवेश किया होगा । तब तक स्त्रियां, लोकगीतों में मंज चुकी होंगी और उन्होंने कजरी, लाचारी आदि तुकान्त गीतों का सृजन किया होगा । यहां यह स्पष्ट कर देना उचित होगा कि अधिकांश लोकगीतों के सर्जक और संरक्षक स्त्रियां ही हैं । समाज द्वारा उपेक्षित स्त्री समाज ने लोकगीतों में अपना नाम देने का साहस न किया होगा, जिससे लोकगीतों के रचइता अनाम रह गए ।
गंवई समाज में केवल जन ही नहीं होते, अपितु जीव-जन्तु, पशु-पक्षी, वनस्पतियां, मौसम, पेड़-पौधे सब कुछ शामिल होते हैं । तभी तो बेटी अपने बाबा से कहती है:-
बाबा निमिया के डाल जनि काट, निमिया चिरईया बसेर ।
लोकगीतों में गंवई समाज है । श्रम और संस्कार है । श्रम से जुड़े होने के कारण लोकगीतों का दायरा बरसात की फुहार से लेकर बंसत की मधुरता और चैत की निश्चिन्तता से जुड़ती है । ये सुबह और शाम से भी जुड़ते हैं और भोर के उल्लास और रात की आराम तलबी से भी । लोक की संवेदना हर्ष, वियोग और श्रृंगार से अभिव्यक्ति पाती रही है । कुछ हद तक मांसलता को भी स्थान मिला है पर कुछ वर्जनाओं के साथ । चंचलता, चुहलता, और थिरकन का सम्बंध श्रम, दुख, भूख को भुलाने और जिजीविषा की ऊर्जा बटोरने के लिए हुआ है ।
पुत्रविहिन स्त्री को तिरस्कार के जो दंश झेलने पड़ते हैं, स्त्रियां गीतों में उसे व्यक्त करती हैं:- सासु कहेली बांझिन, ननद बिनदाबासी हे, आरे बिधि जेकर बारी बिआही, से ही घर से निकालेेले हे ।3 बेमेल विवाह का दर्द लोकगीतों में इस प्रकार व्यक्त करती हैं:- सबके तू देहल भोला, अन धन सोनवा, बनवारी हो हमरा के लरिका भतार । या हाय, हाय प्यारी गोरी, अबहीं सइयां तोरे लरिका ।4 लोक की जिजीविषा को बनाए रखने में लोकगीतों का बड़ा हाथ रहा है । तभी तो हरिनी कहती है: -मचिया बइठल कोसिला रानी, हरिनी अरज करे हो । रानी मास रउरा सीझेला रसोइया, खलड़ी बकसि देहु हो ।5 यहां स्व के बजाए आम का ख्याल रखने की परम्परा है:- बहिनी जवनि जिनिसिया दिहे रहलिउ हो ना । बहिनी तवनि जिनिसिया लेइ लेतू हो ना ।6 लोकगीतों ने कई बार संघर्ष की बुनियाद तैयार की है:- काले कांकर क बिसेनवा चान्दे गाड़े बा निसनवा ।´7 कई बार इन्होंने अन्याय के विरूद्ध आम जनता को जगाया है, उन्हें गोलबन्द किया है । जाहिर है लोकगीतों का यह चरित्र, शोषकों के विरूद्ध रहा है इसलिए उन्होंने लोकगीतों की धार कुन्द करने के लिए इसे फूहड़पन की चासनी में डुबो कर, इनके मूल चरित्र को बदलने की कोशिश की है । आज भोजपुरी फिल्मी गानों में यही सब देखने-सुनने को मिल रहा है ।
लोकगीत, श्रम के आधार पर, मौसमों के आधार पर, जाति-वर्ग के आधार पर या जीवन-मरण के अवसर, कुअवसर पर गाए जाते रहे । गाते-गाते ये गीत लोकगाथा बने । पूर्वांचल के पंवरियों द्वारा गाए जाने वाले पंवारे लोकगाथा ही हैं । अनावश्यक विस्तार के कारण ही लोकोक्तियों में कहा गया है कि- `पंवारा मत सुनाइए ।´ लोक गीतों में छोटे-छोटे पदों से लेकर लोकगाथा में पुस्तकाकार रचना देखने-सुनने को मिलती है । कजरी, लचारी जैसे टेकयुक्त गीत, दस से बारह पंक्तियों तक होते हैं जबकि बिरहा, छिटका कहरवा जैसे टेक रहित मुक्तक गीत, चार और ढाई चरण के तथा सोहर सामान्यतया पन्द्रह-बीस पंक्तियों का होता है । जन्तसर गीत (जान्त पर आटा पीसते समय गाया जाने वाला गीत) और निरवाही गीत(सोहनी के समय गाया जाने वाला गीत ) के आख्यानक प्राय: पचास पंक्तियों तक होते हैं । लोकगाथाएं बहुत लम्बी होती हैं और सप्ताह भर से कम में समाप्त नहीं होतीं । विषय की दृष्टि से लोकगाथा का क्षेत्र महाकाव्य के समान विस्तृत होता है ।
लोक गाथाएं वैसे तो एकल गायक द्वारा ही गाई जाती हैं लेकिन डेवढ़ भरने के लिए एक-दो सहगायक भी होते हैं । इन सहगायकों के लिए लोकगाथा का याद होना अनिवार्य है तभी मुख्य गायक लोकगाथा को निभा सकता है । आल्हा का सहगायक उतराई का चरण लोक लेता है और मुख्य गायक उसके गा चुकने तक दमभर कर आगे की तैयार करता है । लोकगाथा में गद्य के अंश भी होते हैं । बनज़रवा अथवा पंवारा का गायक जब दम खींचकर-`रे ना ´ कहे तो समझना चाहिए कि यहां विराम है । अलग-अलग लोकगाथाओं में अलग-अलग वाद्य यन्त्र प्रयुक्त होते हैं । जोगियों द्वारा गाये जाने वाले `राजा भरथरी´ और `गोपीचन्द´ जैसी लोकगाथाएं सारंगी पर गायी जाती हैं । `लोरकी´ और `चनैनी´ का साज करताल है । `पंवारा´ सूप बजाकर गाया जाता है । लोकगाथा के गायन में नृत्य प्राय: नहीं होते । सिर्फ पूर्वांचल के लुप्तप्राय हो चले पंवरिये, कदमताल बदल कर कुछ नाच लेते हैं ।
लोकगीत, नृत्य और सहगान की अवधारणा पर आधारित हैं । समूह में बीस से पच्चीस स्त्रियां तक गाती हैं । झूमर गीत का नाम झूम-झूम कर गाने के कारण ही पड़ा है । लोकगीतों में छन्द से अधिक भाव का महत्व होता है । लोगों की चेतना को झकझोरने में भाव ही ज्यादा उपयोगिता होता है । यहां शास्त्रीय संगीत जैसा आलाप-तान, आरोह-अवरोह, ताल-लय प्राय: नहीं होते । लोकगीतों के अपने आरोह-अवरोह हैं । उनकी अपनी लय-गति है । लोकगीतों में संगीत की सात ध्वनियों के बजाय आरम्भिक पांच ध्वनियों- सा, रे, ग, म, प का प्रयोग होता है । लोकगीतों में ध्वनि और अर्थ दोनों महत्वपूर्ण हैं । जबकि ध्रुपद, धमार, और खयाल जैसे शास्त्रीय संगीत में घ्वनि का महत्व अधिक है । लोकसंगीत से प्रभावित ठुमरी, दादरा और टप्पा में अर्थ का अपना विशिष्ट महत्व है । शायद यही कारण है कि लोकगीत आम जनता में प्रिय हैं जबकि शास्त्रीय संगीत सामन्ती घरानों में । लोकगीतों में राजा दशरथ, नन्द भी औसत किसान हैं । यहां कैकेयी और धगरिन दोनों एक जैसे हैं । नि:सन्तान राजा का मुंह डोमिन भी देखना पसन्द नहीं करती:-सूतल डोमिन उठि बइठेली, डोम के जगावेली हो । ए डोम, देखली निरबंसिया केरा मुंह, कूसल नाहि परेला हो । राजा डोमिन की बात सुन घर जाता है और भोजन नहीं करता है । रानी के पूछने पर कारण बताता है:-ए रानी, जुठवा के पतरी डोमिनिया, निरबंसिया नउआ धरेले हो ।8
लोकगीतों में प्राय:त्रिताल(16 मात्रा) और चौताल(12 मात्रा) चलता है । पुत्र प्राप्ति की कामना, प्रेम, नफरत आदि का चित्रण सोहर के माध्यम से होता रहा है । जन्तसर और निरवाही गीत, सोहर के बाद लिखे गए जान पड़ते हैं क्योंकि निरवाही और जन्तसर का रूप-विधान सोहर जैसा अनियन्त्रित और लचीला नहीं है । सम्भवत: तब तक लयों की जानकारी हो चुकी थी । कहांरों का कहरवा भी सोहर की तरह लय पर आधारित है । लेकिन इसकी बन्दिश अत्यन्त ठस और नियन्त्रित होती है ।
पहली सदी के लोकगीतों की एक झलक हमें `गाहा´ छन्द में दिख जाती है । अहीरों का जातीय गीत बिरहा, इसी युग की उपज जान पड़ता है ।9 कहा जाता है अहीर कितना भी चतुर क्यों न हो, बिरहा छोड़कर और कुछ नहीं गायेगा: -कतनो अहिरा होवे सयान, बिरहा छोड़ि ना गावे आन । बिरहा, विरह का गीत है:-पिया पिया कहत पियरी भइली देहिया, लोगवा कहेला पिण्ड रोग । गंऊवां के लोगवा मरमियो ना जानेला, भइलबा गवनवा ना मोर । छोटा बिरहा चारकड़िया कहा जाता है । इसमें चार चरण होते हैं । बड़ा बिरहा लोकगाथा जैसा होता है । वैसे वास्तविक बिरहा चारकड़िया ही होता है । बिरहा में केवल डेवढ़ भरी जाती है । इसका प्रादुर्भाव अपभ्रंश के गाहा छन्द से हुआ है ।
बारहमासे और ऋतु सम्बंधी गीत-कजली, फगुआ, चैता भी बिरहा युग की देन जान पड़ते हैं । कजरी, स्त्रियों द्वारा वर्ष ऋतु में गाया जाने वाला गीत है । तुकान्त गीतों में कजरी सबसे लचीला छन्द है । इस गीत की उत्पत्ति का श्रेय मिर्जापुर(उ0प्र0) को जाता है । भाद्रपद मास के शुक्लपक्ष की तृतीया, कजली तीज के नाम से प्रसिद्ध है । इस अवसर पर कजली के दंगल हुआ करते हैं । गवैये दो पार्टियों में विभक्त होकर रात-रात भर कजली गाते हैं । सम्भवत: काले बादलों के बीच गाये जाने के कारण इसका नाम कजली पड़ा होगा:- कइसे खेले जाइबि सावन में कजरिया, बदरिया घेरि आइल ननदी ।
भविष्य पुराण, जयद्रथतन्त्र, मार्कण्डेय पुराण और आल्ह खण्ड में कजरी का उल्लेख मिलता है । भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने कजरी गीत का सम्बंध कन्तित (मिर्जापुर) के परोपकारी राजा दादूराय की मृत्यु से जोड़ा है । जॉर्ज िग्रयर्सन ने भी इस मत का समर्थन किया है । भारतेन्दु के मतानुसार वहां की स्त्रियों ने दादूराय की मृत्यु से उत्पन्न दुख को प्रकट करने के लिए कजरी नामक नए तर्ज का अविष्कार किया । कजरी के एक विशिष्ट धुन का लिखित प्रमाण अकबर के शासन काल में मिलता है । कजरी का एक ही गीत प्राय: तीन विभिन्न धुनों में गाया जाता है । 1-कजरी:-समूह में बैठ कर अथवा चलते हुए ग्रामीण स्त्रियां चलती लय में गाती हैं । 2-ढुनमुनियां:- कमर तक झुक कर चुटकी बजाते हुए मण्डलाकार घूम कर गायी जाती है । 3- उजली:- गौनिहारिनों अथवा नागर स्त्रियों का ढोल-मंजीरे के साज पर गाया जाने वाला गीत है ।10
होरी, बसन्त ऋतु में गाया जाने वाला सहगान है जिसके प्रत्येक चरण का पूर्वार्द्ध विलंबित और उत्तरार्द्ध द्रुत होता है । होरी की टेक और अन्तरा दोनों का तुक प्राय: एक ही होता है: -धनि-धनि हो सिया तोर भाग राम बर पायो । लिखि-लिखि चिठिया बिस्वामित्र भेजे, मुनियन हाथ पठाये । होरी की एक आवृत्ति युक्त लय भी है जो चौताल की अपेक्षा द्रुत किन्तु बेलवरिया से विलंबित होती है । बेलवरिया में जहां अन्तरा के अन्तिम शब्द की तीन बार आवृत्ति होती है वहीं इस वर्ग की होरी में `हाय´ अथवा `सखी री´ शब्द स्तोभ के साथ अन्तरा का चरणांश ही दुहराया जाता है । प्रश्नोत्तर शैली की लचारी की धुन से मिलती-जुलती होरी की एक द्रुत विलंबित धुन भी है :-मोरा नीको ना लागे राम नइहरवा । कवना ही मासे बनकोइलि बोले, कवना मासे बोले मोरवा । सावन मासे बनकोइली बोलै, भादो मासे बोलै मोरवा ।
फाग, फागुन मास में गाया जाने वाला गीत है । यह एक श्रृंगारिक गीत है । कबीर और जोगिड़ा के अलावा होली के सभी गीत सहगान हैं । फाग के गवैयों का दूसरा दल प्राय: आगे का चरण अथवा पहले दल के गाये हुए चरण से मिलता-जुलता कोई दूसरा टुकड़ा गाता है । चौताल बसन्त ऋतु में गाया जाने वाला विलंबित लय का एक सहगान है । चार आघात और दो खाली होने के कारण इस ताल को चौताल कहा जाता है: -
देखन में छैला बाड़ा बांका, बेटा बिगड़ा है नन्द बाबा का,
मोहन मारे डाका ।
घर से निकलल दुर्लभ हो गई दईया, नई-नई नारि देखि रोके कन्हईया,
रोके गलिन के नाका ।
चोरवन में बढ़ल इनके साखा, कुछ दिन में उजरिहें इलाका,
मोहन मारे डाका ।11
चौताल और होरी के छन्द विधान में विशेष अन्तर नही है । होरी के बोल टेक से ही द्रुत होते हैं, किन्तु चौताल से विलंबित । चौताल की विलंबित लय पुनरावृत्ति में क्रमश: द्रुत होती जाती है । अन्तरा की परिसमाप्ति पर चौताल की लय फाग गीतों में सर्वाधिक द्रुत हो जाती है किन्तु दूसरी अन्तरा आरंम्भ करते ही गायक पुन: विलंबित लय पकड़ लेते हैं और क्रमश: द्रुत होते-होते सम पर चरमबिन्दु पर पहुंच जाते हैं । यही क्रम चलता रहता है ।12 यहां यह भी स्पष्ट कर देना उचित होगा कि, फागुन माह में होरी, फगुआ, चौताल, बेलवरिया, कबीर सब साथ-साथ गाए जाते हैं ।
बेलवरिया बसन्त ऋतु में गाया जाने वाला सर्वाधिक द्रुत लय का गीत है । बेलवरिया जैसे टेकयुक्त द्रुत गीतों में अन्य गायक केवल टेक दुहराते हैं किन्तु विलंबित लय के टेकयुक्त अथवा टेकरहित गीतों के प्रत्येक चरण की आवृत्ति होती है । जहां चौताल की लय क्रमश: द्रुत होती है वहीं बेलवरिया की लय आरम्भ से ही द्रुत होती है । गीत को रस और गति देने के कारण ही इसे `राग लहरी´ भी कहा जाता है :-
सेजिया सईंया मोर, सेजिया सईंया मोर,
आवत में डर लागे ।
घनन-घनन करे घुघुर,
पायल करे शोर, पायल करे शोर,
एक त रात अजोरिया, चितवे चहुं ओर, चितवे चहुं ओर,
आवत के डर लागे ।
सासू हमारे दारुन, ननदी बिरही बोल, ननदी बिरही बोल,
गोतिन और पड़ोसिन, रोज-रोज करे खोज, रोज-रोज करे खोज,
आवत के डर लागे ।
सासू जे सुते ओसरवा, ननदो दहलीज, ननदो दहलीज,
सैंया सुते सेज ऊपर, जहां कानों ना कीच, जहां कानों ना कीच,
सासू के आवे अतरिया, ननदो के बुखार, ननदो के बुखार,
सईंया के होला रतौंनी, दिन सूझे ना रात, दिन सूझे ना रात,
आवत के डर लागे ।13 ( मेरे गांव वाले इस गीत को `चहका´ कहते हैं ।)
बेलवरिया पूर्णत: लय आधारित अतुकान्त गीत है किन्त कुछ मामलों में चरणान्त में तुकों का प्रयोग मिलता है ।
कबीर, फागुन में गाया जाने वाला अश्लील एकल लघु मुक्तक गीत है । इसी प्रकार जोगिड़ा होली के अवसर पर गाया जाने वाला एकल गीत है जिसमें `जोगीजी´ संबोधन कर शास्त्रार्थ शैली में गाया जाता है ।
चइता चैत के महीने में गाया जाने वाला श्रृंगार-प्रधान विलंबित लय का लघु एकल गीत है । चइता की लय इतनी विलंबित होती है कि आकार-प्रकार में छोटा होते हुए भी चरणांत तक जाते-जाते सांस टूटकर करुण रस में बदल जाती है:- धावत राम बकईंयां हो रामा, धूरी भरे तन ।
चइता मूलत: मुक्तक लोकगीत है किन्तु कुछ चइते ऐसे भी मिलते हैं जिनकी अन्तराओं में स्थायी भावों का विस्तार कर बड़ा बना लिया गया है:-
एही ठैंयां मोतिया हेरानी हो रामा । ये ही ठैंयां ....
कोठवा में ढूंढूं, अटरिया में ढूंढूं
देवरा से पूछत लजानी हो रामा । ये ही ठैयां ....
सेजा में ढूंढूं, सुपेतिया में ढूंढूं
सईयां से पूछत लजानी हो रामा । ये ही ठैंयां ....
बारहमासा विरहणी के अन्तर्मन की अभिव्यक्ति का माध्यम रहा है । साल के बारह महीनों में विरह का अलग-अलग वर्णन यहां मिल जाता है । प्रारम्भ जून या आषाढ़ की पहली वर्षा से होता है और अन्त जेठ या वैशाख की तपती गर्मी से । बारहमासे का लघु रूप चौमासा भी उपलब्ध है । चौमासा में आषाढ़ से कुवार अथवा सावन से कार्तिक तक, प्रकृति का विरहणी के मन पर पड़ने वाले प्रभाव का चित्रण किया जाता है:-
क्या है तकदीर हमारी तजौ बनवारी । जेठ मास तन तपौ, अंग भावे नहीं सारी । बाढ़ै विरह असाढ, बून्द अदरा झकझारी । सावन सेज भयावन लागत , प्रियतम बिनु बून्द कटारी ।
तजौ बनवारी - - भादो गगन गम्भीर पीर अति हृदय मझारी कियो करार कुआर, सवति संग बसै मुरारी । कातिक रास रचै मनमोहन, कुबजा संग आप सिधारी । तजौ बनवारी - - अगहन अमित अनेक बिकल वृषभान दुलारी । पूष लगै तन आड़ देत कुबजा को गारी । माघ बसन्त हमें नहिं भावत, झूमर, चौताल, धमारी । तजौ बनवारी - -
फागुन उड़त अबीर, अरगजा, कूक मझारी
चैत फूलै बन टेस होत मुद मंगलकारी । द्विज छोटकुन वैशाख मनावत अरे पूजि गइले बारहमास
तजौ बनवारी - - 14
श्रम परिहार के गीतों में जन्तसर, धनकुट्टी, बिनावन, निरवाही, रोपनी, सोहनी, घाट, चरवाही के गीत, श्रम की प्रकृति में होने वाले बदलाव के कारण समाप्त होते जा रहे हैं ।
आटा पीसने का काम जब तक घर के जान्त पर होता था तब तक जन्तसर, भोर में घर-घर से सुनाई पड़ता था। जन्तसर दरअसल समाज और घर से उपेक्षित, प्रताड़ित नारी की पीड़ा व्यक्त करने के माध्यम थे । `रे ना, हे ना, हे राम, हुरे जी,´ ये आदि स्तोभ जन्तसर के अंग थे । चरणान्त के इन स्तोभों पर आकर दम फूल जाता था । इन्हीं स्तोभों पर स्त्रियां सांस भरती और जान्त में झींक डालतीं । जन्तसर लय प्रधान गीत है । यह छोटे आख्यानों के लंबे विवरणों का लोकगीत है:-15
सेर भर गेंहुआ रे बांसे के चंगेरिया
अरे पीसई चलेलीं जन्तसरिया हो राम ।
जान्त ना चलै रामा किलवा ना डोले
अरे जुअवा पकड़ि सखि रोवेली हो राम ।
धनकुट्टी और बिनावन के गीत प्राय: अनियन्त्रित लचारी शैली के होते हैं । बिनावन गीतों की लय, धनकुट्टी गीतों से कुछ विलंबित होती है । जन्तसर, निरवाही और किसी-किसी सोहर में यत्र-तत्र तुकों का प्रयोग हुआ है किन्तु कहरवा विशुद्ध अतुकान्त है । यद्यपि अन्त में पहले चरण के उत्तरार्ध की पुनरावृत्ति इस बात का भान नहीं होने देती ।
कहरवा की विषय वस्तु मुक्तप्रेम पर आधारित है । अपवाद स्वरूप कुछ नीतिपरक कहरवे भी देखने को मिलते हैं । कहरवा की लय द्रुत होती है । सम्भव है यह सोहर से भी पुराना हो परन्तु इसके कालखंड के बारे में ठीक-ठीक कुछ नहीं कहा जा सकता । यह भी सम्भव है कि बिरहों के उद्भव के बाद किन्ही दो शब्दों के मेल से यह ढाई चरण का स्वतन्त्र मुक्तक अंकुरित हुआ हो । बड़ा कहरवा निश्चित रूप से छिटका कहरवा के बाद जन्मा है ।16
मात्र लय पर आधारित लचीले विधान वाला अतुकान्त भावप्रधान गीत-सोहर सम्भवत: सबसे पुराना लोकगीत है । सोहर की सरलतम गायन-पद्धति, गायन में मात्र ताल-वाद्यों का प्रयोग, स्वल्प आरोह-अवरोह युक्त विलंबित लय इसकी पुरातनता के प्रमाण हैं । अनुमानत: जंगम जातियों के अर्ध निरर्थक गीतों के बाद ही सोहर का प्रादुर्भाव हुआ होगा। गीत में प्रयुक्त शब्दावली संस्कृत, प्राकृत, पाली और अपभ्रंश का ही विकसित रूप है । सोहर अपनी पहली अवस्था में मात्र लय आधारित अतुकान्त गीत था । दूसरी अवस्था में पद-स्तोभों का प्रयोग हुआ । तीसरी अवस्था में अनियन्त्रित तुकों का प्रयोग हुआ । तुलसी युग में इसी अवस्था का प्रभाव है ।17 पुत्र प्राप्ति पर खुशी, बंध्या स्त्री की पीड़ा, समाज के ताने, सभी कुछ सोहर में मिलते हैं । सोहर में देशकाल का अतिक्रमण करते हुए तमाम विषय वस्तुओं को समेटा गया है । जीरे के व्यापार और पुराने नगरों का भी सोहर में उल्लेख मिलता है । वैसे तो कहा जाता है कि लोकगीत कालसापेक्ष, जिजीविषा के तमाम संघषों, समाज की आन्तरिक और बाह्य, दैहिक और पारलौकिक संस्कृतियों को समेटते चलते हैं और ज्यादातर समाज के उपेक्षित तबकों यथा श्रमिक महिलाओं की अभिव्यक्ति के माध्यम होते हैं तथापि इन्हीं संघषों, अभिव्यक्तियों के साथ समयसापेक्ष या देशकाल के अतिक्रमण की पृष्ठभूमि भी तैयार होती है । जैसे तमाम अभावों, विपन्नताओं और रूग्णताओं से गुजरता श्रमशील मनुष्य यदि अपने जीवन में सुख नहीं प्राप्त करता तो भी उसके सामने स्वर्ग की परिकल्पना तो होती ही है । इसी स्वर्ग की परिकल्पना के कारण वह कभी काशी तो कभी मथुरा का चक्कर लगाता रहता है । स्वर्ग को हमने नहीं देखा है फिर भी तमाम काल्पनिक गल्पों में बता दिया जाता है कि वहां क्या-क्या है या नरक में किस तरह किसको सजा दी जाती है । एक सुख या भय का वातावरण, कल्पना में ही सही, तैयार कर दिया गया है । ठीक इसी प्रकार भोजपुरी सोहर लोकगीतों में ऐसे तमाम प्रसंग आए हैं जिनसे समयसापेक्ष से बाहर जाकर परिकल्पना की गई है । मसलन की लौंग के पेड़ की बात करें । हम जानते हैं कि पूरे भोजपुरी क्षेत्र में नारियल, लौंग, केसर, गुअवा(कसैली), मंजिष्ठा(एक प्रकार की पहाड़ी लता जिससे रंग तैयार होता है) या पलास के पेड़ नहीं उगते । तथापि तमाम भोजपुरी गीतों में इन पेड़-पौधों का जिक्र हुआ है, इनके होने की परिकल्पना की गई है । ये पौधों या वनस्पतियां धार्मिक महत्व के हैं या रूप, सौन्दर्य, पवित्रता, मोहकता के पर्याय हैं, इसलिए इनसे स्वयं को जोड़कर सुख, सौन्दर्य और मोहकता की परिकल्पना की गई है :-
1- कवना बने चुए नरियलवा, कवना बनवा केवल हो । ललना, कवना बनवा चुएला गुलाब, त चुनरी रंगाइबि हो । (भोजपुरी संस्कार गीत, सोहर सं0 3)
2-कवना बने फूले गुअवा नरियर, कवना बने फूल फुले हो, ए ललना कवना बने फूलेला मजीठिया, त चुनरी रंगाइबि हो । (भोजपुरी संस्कार गीत, सोहर सं0 4)
3-मोर पिछुअरिया लवंगिया, त हहर झहर करे ए, जड़ से कटाइब लवंगिया पलंगा बिनाइब ए । (भोजपुरी संस्कार गीत, सोहर सं0 10)
4-मोर पिछवरवा लवंगिया क बगिया लवंग फुले आधी राति रे, बहि लवंग कै सीतल बयरिया महंकै बड़े भिनुसार । ( कविता-कौमुदी- ग्रामगीत रामनरेश त्रिपाठी, विवाह गीत सं0 33)
5-मोर पिछवारे लौंग का बिरवा लौंग चुए आधी रात, लौंग बिनि-बिनि ढेर लगावों, लादत है बनिजार । ( कविता-कौमुदी- ग्रामगीत रामनरेश त्रिपाठी, विवाह गीत सं0 39)
6-कवना बने फूलेला सुपरिया, त कवना बने नरियर हो, आरे कवना बने फूलेला पलसवा, लोढ़न हम जाइबि हो । (भोजपुरी संस्कार गीत,सोहर सं0 14)
7- माई हे, हमराहिं बाबा के इलायची बारी, डाढ़े पाते सोहरि गइले हे । (भोजपुरी संस्कार गीत, विवाह गीत सं0 284)
लगता है ऐसी दुर्लभ, बहुमूल्य वस्तुएं जो जनसुलभ नहीं थीं, उनका लोकगीतों में सुनी-सुनाई बातों के रूप में वर्णन हुआ है । इसलिए कहीं-कहीं मिथ्या बातों का भी उल्लेख है:-ओहि रे अजोधिया एक पीपर, मोतियन फरल हो । या बलुवर खेत जोतइतुं, धन मोतिया बोअइतुं हो ।
संस्कार गीतों में सोहर के अलावा अन्नप्राशन, मुण्डन, जनेऊ के गीत भी गाये जाते रहे हैं । विवाह के गीत तो आज भी प्रचलित हैं ही । भोजपुरी समाज में हिन्दू और मुस्लिम समाज में लगभग समान शैली में विवाह/संस्कार गीतों का प्रचलन है:-
सुन्नत गीत
चांद हो तू त पश्चिमें उगिह
ओखली पर उगिह, छूरा पर उगिह उगिह दुलहवा के ऊपर, चांद हो तू त पश्चिमें उगिह
लोकगीतों में जातिगत विभाजन के बावजूद सांप्रदायिक विभाजन ढ़ूंढ़ना मुश्किल है । पंवरिया गायक मुस्लिम होते हुए भी सोहर और पंवारे गाते हैं जिनमें हिन्दू देवी-देवताओं की स्तुतियां होती हैं । `लोकरंग-1´ पुस्तक में ऐसे कुछ गीतों को प्रकाशित किया गया है । लोकरंग संस्कृतिक समिति मुस्लिम लोकगीतों पर काम कर रही है और हम शीघ्र ऐसी स्थिति में होंगे कि उन गीतों को प्रकाशन कर सकें ।
लचारी मूलत: अभिजात वर्ग की स्त्रियों का गीत है जो वेश्याओं के कोठे और उस्तादों के सरगम की पतली गली पार कर अभिजात वर्ग की स्त्रियों तक पहुंचा है । लचारी गीतों में विवशता के भाव मिलते हैं । यह गीत दो सदी से ज्यादा पुराना नहीं है । नवाब वाजिद अली शाह के दरबार में लचारी से ही ठुमरी और दादरा का जन्म हुआ है ।18 जातियों पर आधारित भेदभाव वाले भारतीय समाज में कुछ निम्नजातियों के अपने गीत थे । जैसे धोबी, तेली, दलित, नाई, गड़ेरिया कुम्हार, मल्लाह आदि के गीत । जोगी, कोल, सियरमरवा, वेश्या, हिजड़ों अदि के भी अपने गीत थे ।
समाज के विकास के साथ इन तमाम गंवई काम-धंधों में बदलाव आया । जीवनयापन की शैली बदली । लिहाजा इन गीतों को बदलना या लुप्त होना ही था । इन के बावजूद आज भी गांव , श्रम पर आधारित समाज है । वहां सिर्फ सामाजिकता और संवेदना का क्षरण हुआ है । गंवई जीवन में जो झूठ, लूट और फूट प्रवेश कर गई है उसे नियन्त्रित करने के लिए समरसता के विकास की जरूरत है । लोक जीवन में, लोकगीतों के बिना समरसता बनाए रखना सम्भव नही है । गंवई जीवन की समरसता बनाए रखने के लिए ही लोकगीतों का जन्म हुआ था। संवेदना को बचाए रखने में भी लोकगीतों का बहुत बड़ा योगदान था । अन्याय पर आधारित व्यवस्था को लोक की समरसता स्वीकार्य नहीं होती । व्यवस्था और सामन्ती संस्कृति सदा से लोेक संस्कृति के विरूद्ध रही है । लोक संस्कृति आम जनता को जोड़ती है जबकि गैर बराबरी की व्यवस्था समाज को तोड़ती है । लोकगीतों के काट के लिए अभिजात्य वर्ग ने शास्त्रीय संगीत को आगे बढ़ाया । उसकी सामूहिकता तोड़ी, उसकी सहजता तोड़ी । उसकी बन्दिश पर तमाम तरह के प्रतिबंध लगाए ।
आज लोकगीतों के महत्व को हल्का करने के लिए फूहड़पन का पर्याय बनाया जा रहा है । सुविधाभोगी समाज के पास लोकगीतों जैसी संपदा नही होती । श्रमशील समाज में ही लोकगीत जनमते हैं । आज लोकगीतों की प्रगतिशील चेतना को पीछे ढकेलते हुए, उन पर गंवारूपन का मुलम्मा चढ़ाकर, स्त्रीविरोधी और अश्लीलता का पर्याय बना रहा है । अश्लीलता लोकगीतों का मूल चरित्र नहीं है । यह लोकगीतों का बाजारीकरण है । इन्हें बिकाऊ बनाने के लिए अश्लील बनाया जा रहा है । इनकी जनपक्षधरता तोड़ी जा रही है । मीडिया के दूसरे माध्यमों से हमले तेज करा कर लोकगीतों को मात्र संग्रहालयों में रखने योग्य बना दिया गया है । इन सब के बावजूद लोकगीतों का आकर्षण कम नहीं हुआ है । हां उनकी धार कुन्द जरूर हुई है और ग्रामीण संस्कृति विकृत हुई है । लेकिन यह भी सच है कि जनता सदा अपनी संस्कृति की हिफाजत के लिए संघर्ष करती है । वह थोपी संस्कृति को सहजता से स्वीकार नहीं करती । यही कारण है कि आज भी शास्त्रीय संगीत जनमानस तक पहुंच नहीं पाया है जबकि तमाम कोशिशों के बावजूद लोकगीत अभी जिन्दा हैं ।
सुभाष चन्द्र कुशवाहा
सन्दर्भ
1-लोकरंग सांस्कृतिक समिति द्वारा ढ़ूंढ़े गए गीत ।
2-गंगा घाटी के गीत- डॉ0 हीरालाल तिवारी ।
3- भोजपुरी संस्कारगीत (12) ।
4- लोकरंग सांस्कृतिक समिति द्वारा ढ़ूंढ़े गए गीत ।
5-भोजपुरी संस्कारगीत (15) ।
6-गंगा घाटी के गीत- पृष्ठ 337 ।
7 -धीरे बहो गंगा-देवेन्द्र सत्यार्थी ।
8- भोजपुरी संस्कारगीत (29) ।
9,10 - गंगा घाटी के गीत- डॉ0 हीरालाल तिवारी ।
11 - लोकरंग सांस्कृतिक समिति द्वारा ढूंढे गए गीत ।
12- गंगा घाटी के गीत- डॉ0 हीरालाल तिवारी ।
13, 14- लोकरंग सांस्कृतिक समिति द्वारा ढ़ूंढ़े गए गीत ।
15, 16, 17, 18- गंगा घाटी के गीत- डॉ0 हीरालाल तिवारी ।
काच-कुच कौआ खाला ।
दूध-भात बाबू खाला ।
पत्ता उधिआइल जाला ।
कौआ लजाइल जाला ।
बाबू के मुंहवा बिटोरले जाला ।1
लोकगीतों की प्रारंभिक अवस्था में लयप्रधान निरर्थक गीतों की ही रचना हुई होगी। जैसे कि -ओक्का, बोक्का तीन तलोक्का । बाद की अवस्था में अन्त्यानुप्रास रहित लयप्रधान गीतों का सृजन हुआ होगा ।2 इस स्थिति में स्त्रियों ने लोकगीतों को अभिव्यक्ति के मुख्य माध्यम के रूप में सोहर, जन्तसर, निरवाही गीतों को गाया होगा ।
समूह की अवधारणा पर आधारित लोकगीत, स्त्रियों की रुचि, कल्पना और संघर्ष की अभिव्यक्ति के सबसे पुराने माध्यम रहे हैं । या यों कहें कि लोकगीत श्रम करने वाली महिलाओं के ज्यादा करीब रहे हैं । कहरवा, बनज़रवा, पंवारा, बिरहा गीतों के माध्यम से बाद में पुरूषों ने अपने मन विनोद के लिए प्रवेश किया होगा । तब तक स्त्रियां, लोकगीतों में मंज चुकी होंगी और उन्होंने कजरी, लाचारी आदि तुकान्त गीतों का सृजन किया होगा । यहां यह स्पष्ट कर देना उचित होगा कि अधिकांश लोकगीतों के सर्जक और संरक्षक स्त्रियां ही हैं । समाज द्वारा उपेक्षित स्त्री समाज ने लोकगीतों में अपना नाम देने का साहस न किया होगा, जिससे लोकगीतों के रचइता अनाम रह गए ।
गंवई समाज में केवल जन ही नहीं होते, अपितु जीव-जन्तु, पशु-पक्षी, वनस्पतियां, मौसम, पेड़-पौधे सब कुछ शामिल होते हैं । तभी तो बेटी अपने बाबा से कहती है:-
बाबा निमिया के डाल जनि काट, निमिया चिरईया बसेर ।
लोकगीतों में गंवई समाज है । श्रम और संस्कार है । श्रम से जुड़े होने के कारण लोकगीतों का दायरा बरसात की फुहार से लेकर बंसत की मधुरता और चैत की निश्चिन्तता से जुड़ती है । ये सुबह और शाम से भी जुड़ते हैं और भोर के उल्लास और रात की आराम तलबी से भी । लोक की संवेदना हर्ष, वियोग और श्रृंगार से अभिव्यक्ति पाती रही है । कुछ हद तक मांसलता को भी स्थान मिला है पर कुछ वर्जनाओं के साथ । चंचलता, चुहलता, और थिरकन का सम्बंध श्रम, दुख, भूख को भुलाने और जिजीविषा की ऊर्जा बटोरने के लिए हुआ है ।
पुत्रविहिन स्त्री को तिरस्कार के जो दंश झेलने पड़ते हैं, स्त्रियां गीतों में उसे व्यक्त करती हैं:- सासु कहेली बांझिन, ननद बिनदाबासी हे, आरे बिधि जेकर बारी बिआही, से ही घर से निकालेेले हे ।3 बेमेल विवाह का दर्द लोकगीतों में इस प्रकार व्यक्त करती हैं:- सबके तू देहल भोला, अन धन सोनवा, बनवारी हो हमरा के लरिका भतार । या हाय, हाय प्यारी गोरी, अबहीं सइयां तोरे लरिका ।4 लोक की जिजीविषा को बनाए रखने में लोकगीतों का बड़ा हाथ रहा है । तभी तो हरिनी कहती है: -मचिया बइठल कोसिला रानी, हरिनी अरज करे हो । रानी मास रउरा सीझेला रसोइया, खलड़ी बकसि देहु हो ।5 यहां स्व के बजाए आम का ख्याल रखने की परम्परा है:- बहिनी जवनि जिनिसिया दिहे रहलिउ हो ना । बहिनी तवनि जिनिसिया लेइ लेतू हो ना ।6 लोकगीतों ने कई बार संघर्ष की बुनियाद तैयार की है:- काले कांकर क बिसेनवा चान्दे गाड़े बा निसनवा ।´7 कई बार इन्होंने अन्याय के विरूद्ध आम जनता को जगाया है, उन्हें गोलबन्द किया है । जाहिर है लोकगीतों का यह चरित्र, शोषकों के विरूद्ध रहा है इसलिए उन्होंने लोकगीतों की धार कुन्द करने के लिए इसे फूहड़पन की चासनी में डुबो कर, इनके मूल चरित्र को बदलने की कोशिश की है । आज भोजपुरी फिल्मी गानों में यही सब देखने-सुनने को मिल रहा है ।
लोकगीत, श्रम के आधार पर, मौसमों के आधार पर, जाति-वर्ग के आधार पर या जीवन-मरण के अवसर, कुअवसर पर गाए जाते रहे । गाते-गाते ये गीत लोकगाथा बने । पूर्वांचल के पंवरियों द्वारा गाए जाने वाले पंवारे लोकगाथा ही हैं । अनावश्यक विस्तार के कारण ही लोकोक्तियों में कहा गया है कि- `पंवारा मत सुनाइए ।´ लोक गीतों में छोटे-छोटे पदों से लेकर लोकगाथा में पुस्तकाकार रचना देखने-सुनने को मिलती है । कजरी, लचारी जैसे टेकयुक्त गीत, दस से बारह पंक्तियों तक होते हैं जबकि बिरहा, छिटका कहरवा जैसे टेक रहित मुक्तक गीत, चार और ढाई चरण के तथा सोहर सामान्यतया पन्द्रह-बीस पंक्तियों का होता है । जन्तसर गीत (जान्त पर आटा पीसते समय गाया जाने वाला गीत) और निरवाही गीत(सोहनी के समय गाया जाने वाला गीत ) के आख्यानक प्राय: पचास पंक्तियों तक होते हैं । लोकगाथाएं बहुत लम्बी होती हैं और सप्ताह भर से कम में समाप्त नहीं होतीं । विषय की दृष्टि से लोकगाथा का क्षेत्र महाकाव्य के समान विस्तृत होता है ।
लोक गाथाएं वैसे तो एकल गायक द्वारा ही गाई जाती हैं लेकिन डेवढ़ भरने के लिए एक-दो सहगायक भी होते हैं । इन सहगायकों के लिए लोकगाथा का याद होना अनिवार्य है तभी मुख्य गायक लोकगाथा को निभा सकता है । आल्हा का सहगायक उतराई का चरण लोक लेता है और मुख्य गायक उसके गा चुकने तक दमभर कर आगे की तैयार करता है । लोकगाथा में गद्य के अंश भी होते हैं । बनज़रवा अथवा पंवारा का गायक जब दम खींचकर-`रे ना ´ कहे तो समझना चाहिए कि यहां विराम है । अलग-अलग लोकगाथाओं में अलग-अलग वाद्य यन्त्र प्रयुक्त होते हैं । जोगियों द्वारा गाये जाने वाले `राजा भरथरी´ और `गोपीचन्द´ जैसी लोकगाथाएं सारंगी पर गायी जाती हैं । `लोरकी´ और `चनैनी´ का साज करताल है । `पंवारा´ सूप बजाकर गाया जाता है । लोकगाथा के गायन में नृत्य प्राय: नहीं होते । सिर्फ पूर्वांचल के लुप्तप्राय हो चले पंवरिये, कदमताल बदल कर कुछ नाच लेते हैं ।
लोकगीत, नृत्य और सहगान की अवधारणा पर आधारित हैं । समूह में बीस से पच्चीस स्त्रियां तक गाती हैं । झूमर गीत का नाम झूम-झूम कर गाने के कारण ही पड़ा है । लोकगीतों में छन्द से अधिक भाव का महत्व होता है । लोगों की चेतना को झकझोरने में भाव ही ज्यादा उपयोगिता होता है । यहां शास्त्रीय संगीत जैसा आलाप-तान, आरोह-अवरोह, ताल-लय प्राय: नहीं होते । लोकगीतों के अपने आरोह-अवरोह हैं । उनकी अपनी लय-गति है । लोकगीतों में संगीत की सात ध्वनियों के बजाय आरम्भिक पांच ध्वनियों- सा, रे, ग, म, प का प्रयोग होता है । लोकगीतों में ध्वनि और अर्थ दोनों महत्वपूर्ण हैं । जबकि ध्रुपद, धमार, और खयाल जैसे शास्त्रीय संगीत में घ्वनि का महत्व अधिक है । लोकसंगीत से प्रभावित ठुमरी, दादरा और टप्पा में अर्थ का अपना विशिष्ट महत्व है । शायद यही कारण है कि लोकगीत आम जनता में प्रिय हैं जबकि शास्त्रीय संगीत सामन्ती घरानों में । लोकगीतों में राजा दशरथ, नन्द भी औसत किसान हैं । यहां कैकेयी और धगरिन दोनों एक जैसे हैं । नि:सन्तान राजा का मुंह डोमिन भी देखना पसन्द नहीं करती:-सूतल डोमिन उठि बइठेली, डोम के जगावेली हो । ए डोम, देखली निरबंसिया केरा मुंह, कूसल नाहि परेला हो । राजा डोमिन की बात सुन घर जाता है और भोजन नहीं करता है । रानी के पूछने पर कारण बताता है:-ए रानी, जुठवा के पतरी डोमिनिया, निरबंसिया नउआ धरेले हो ।8
लोकगीतों में प्राय:त्रिताल(16 मात्रा) और चौताल(12 मात्रा) चलता है । पुत्र प्राप्ति की कामना, प्रेम, नफरत आदि का चित्रण सोहर के माध्यम से होता रहा है । जन्तसर और निरवाही गीत, सोहर के बाद लिखे गए जान पड़ते हैं क्योंकि निरवाही और जन्तसर का रूप-विधान सोहर जैसा अनियन्त्रित और लचीला नहीं है । सम्भवत: तब तक लयों की जानकारी हो चुकी थी । कहांरों का कहरवा भी सोहर की तरह लय पर आधारित है । लेकिन इसकी बन्दिश अत्यन्त ठस और नियन्त्रित होती है ।
पहली सदी के लोकगीतों की एक झलक हमें `गाहा´ छन्द में दिख जाती है । अहीरों का जातीय गीत बिरहा, इसी युग की उपज जान पड़ता है ।9 कहा जाता है अहीर कितना भी चतुर क्यों न हो, बिरहा छोड़कर और कुछ नहीं गायेगा: -कतनो अहिरा होवे सयान, बिरहा छोड़ि ना गावे आन । बिरहा, विरह का गीत है:-पिया पिया कहत पियरी भइली देहिया, लोगवा कहेला पिण्ड रोग । गंऊवां के लोगवा मरमियो ना जानेला, भइलबा गवनवा ना मोर । छोटा बिरहा चारकड़िया कहा जाता है । इसमें चार चरण होते हैं । बड़ा बिरहा लोकगाथा जैसा होता है । वैसे वास्तविक बिरहा चारकड़िया ही होता है । बिरहा में केवल डेवढ़ भरी जाती है । इसका प्रादुर्भाव अपभ्रंश के गाहा छन्द से हुआ है ।
बारहमासे और ऋतु सम्बंधी गीत-कजली, फगुआ, चैता भी बिरहा युग की देन जान पड़ते हैं । कजरी, स्त्रियों द्वारा वर्ष ऋतु में गाया जाने वाला गीत है । तुकान्त गीतों में कजरी सबसे लचीला छन्द है । इस गीत की उत्पत्ति का श्रेय मिर्जापुर(उ0प्र0) को जाता है । भाद्रपद मास के शुक्लपक्ष की तृतीया, कजली तीज के नाम से प्रसिद्ध है । इस अवसर पर कजली के दंगल हुआ करते हैं । गवैये दो पार्टियों में विभक्त होकर रात-रात भर कजली गाते हैं । सम्भवत: काले बादलों के बीच गाये जाने के कारण इसका नाम कजली पड़ा होगा:- कइसे खेले जाइबि सावन में कजरिया, बदरिया घेरि आइल ननदी ।
भविष्य पुराण, जयद्रथतन्त्र, मार्कण्डेय पुराण और आल्ह खण्ड में कजरी का उल्लेख मिलता है । भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने कजरी गीत का सम्बंध कन्तित (मिर्जापुर) के परोपकारी राजा दादूराय की मृत्यु से जोड़ा है । जॉर्ज िग्रयर्सन ने भी इस मत का समर्थन किया है । भारतेन्दु के मतानुसार वहां की स्त्रियों ने दादूराय की मृत्यु से उत्पन्न दुख को प्रकट करने के लिए कजरी नामक नए तर्ज का अविष्कार किया । कजरी के एक विशिष्ट धुन का लिखित प्रमाण अकबर के शासन काल में मिलता है । कजरी का एक ही गीत प्राय: तीन विभिन्न धुनों में गाया जाता है । 1-कजरी:-समूह में बैठ कर अथवा चलते हुए ग्रामीण स्त्रियां चलती लय में गाती हैं । 2-ढुनमुनियां:- कमर तक झुक कर चुटकी बजाते हुए मण्डलाकार घूम कर गायी जाती है । 3- उजली:- गौनिहारिनों अथवा नागर स्त्रियों का ढोल-मंजीरे के साज पर गाया जाने वाला गीत है ।10
होरी, बसन्त ऋतु में गाया जाने वाला सहगान है जिसके प्रत्येक चरण का पूर्वार्द्ध विलंबित और उत्तरार्द्ध द्रुत होता है । होरी की टेक और अन्तरा दोनों का तुक प्राय: एक ही होता है: -धनि-धनि हो सिया तोर भाग राम बर पायो । लिखि-लिखि चिठिया बिस्वामित्र भेजे, मुनियन हाथ पठाये । होरी की एक आवृत्ति युक्त लय भी है जो चौताल की अपेक्षा द्रुत किन्तु बेलवरिया से विलंबित होती है । बेलवरिया में जहां अन्तरा के अन्तिम शब्द की तीन बार आवृत्ति होती है वहीं इस वर्ग की होरी में `हाय´ अथवा `सखी री´ शब्द स्तोभ के साथ अन्तरा का चरणांश ही दुहराया जाता है । प्रश्नोत्तर शैली की लचारी की धुन से मिलती-जुलती होरी की एक द्रुत विलंबित धुन भी है :-मोरा नीको ना लागे राम नइहरवा । कवना ही मासे बनकोइलि बोले, कवना मासे बोले मोरवा । सावन मासे बनकोइली बोलै, भादो मासे बोलै मोरवा ।
फाग, फागुन मास में गाया जाने वाला गीत है । यह एक श्रृंगारिक गीत है । कबीर और जोगिड़ा के अलावा होली के सभी गीत सहगान हैं । फाग के गवैयों का दूसरा दल प्राय: आगे का चरण अथवा पहले दल के गाये हुए चरण से मिलता-जुलता कोई दूसरा टुकड़ा गाता है । चौताल बसन्त ऋतु में गाया जाने वाला विलंबित लय का एक सहगान है । चार आघात और दो खाली होने के कारण इस ताल को चौताल कहा जाता है: -
देखन में छैला बाड़ा बांका, बेटा बिगड़ा है नन्द बाबा का,
मोहन मारे डाका ।
घर से निकलल दुर्लभ हो गई दईया, नई-नई नारि देखि रोके कन्हईया,
रोके गलिन के नाका ।
चोरवन में बढ़ल इनके साखा, कुछ दिन में उजरिहें इलाका,
मोहन मारे डाका ।11
चौताल और होरी के छन्द विधान में विशेष अन्तर नही है । होरी के बोल टेक से ही द्रुत होते हैं, किन्तु चौताल से विलंबित । चौताल की विलंबित लय पुनरावृत्ति में क्रमश: द्रुत होती जाती है । अन्तरा की परिसमाप्ति पर चौताल की लय फाग गीतों में सर्वाधिक द्रुत हो जाती है किन्तु दूसरी अन्तरा आरंम्भ करते ही गायक पुन: विलंबित लय पकड़ लेते हैं और क्रमश: द्रुत होते-होते सम पर चरमबिन्दु पर पहुंच जाते हैं । यही क्रम चलता रहता है ।12 यहां यह भी स्पष्ट कर देना उचित होगा कि, फागुन माह में होरी, फगुआ, चौताल, बेलवरिया, कबीर सब साथ-साथ गाए जाते हैं ।
बेलवरिया बसन्त ऋतु में गाया जाने वाला सर्वाधिक द्रुत लय का गीत है । बेलवरिया जैसे टेकयुक्त द्रुत गीतों में अन्य गायक केवल टेक दुहराते हैं किन्तु विलंबित लय के टेकयुक्त अथवा टेकरहित गीतों के प्रत्येक चरण की आवृत्ति होती है । जहां चौताल की लय क्रमश: द्रुत होती है वहीं बेलवरिया की लय आरम्भ से ही द्रुत होती है । गीत को रस और गति देने के कारण ही इसे `राग लहरी´ भी कहा जाता है :-
सेजिया सईंया मोर, सेजिया सईंया मोर,
आवत में डर लागे ।
घनन-घनन करे घुघुर,
पायल करे शोर, पायल करे शोर,
एक त रात अजोरिया, चितवे चहुं ओर, चितवे चहुं ओर,
आवत के डर लागे ।
सासू हमारे दारुन, ननदी बिरही बोल, ननदी बिरही बोल,
गोतिन और पड़ोसिन, रोज-रोज करे खोज, रोज-रोज करे खोज,
आवत के डर लागे ।
सासू जे सुते ओसरवा, ननदो दहलीज, ननदो दहलीज,
सैंया सुते सेज ऊपर, जहां कानों ना कीच, जहां कानों ना कीच,
सासू के आवे अतरिया, ननदो के बुखार, ननदो के बुखार,
सईंया के होला रतौंनी, दिन सूझे ना रात, दिन सूझे ना रात,
आवत के डर लागे ।13 ( मेरे गांव वाले इस गीत को `चहका´ कहते हैं ।)
बेलवरिया पूर्णत: लय आधारित अतुकान्त गीत है किन्त कुछ मामलों में चरणान्त में तुकों का प्रयोग मिलता है ।
कबीर, फागुन में गाया जाने वाला अश्लील एकल लघु मुक्तक गीत है । इसी प्रकार जोगिड़ा होली के अवसर पर गाया जाने वाला एकल गीत है जिसमें `जोगीजी´ संबोधन कर शास्त्रार्थ शैली में गाया जाता है ।
चइता चैत के महीने में गाया जाने वाला श्रृंगार-प्रधान विलंबित लय का लघु एकल गीत है । चइता की लय इतनी विलंबित होती है कि आकार-प्रकार में छोटा होते हुए भी चरणांत तक जाते-जाते सांस टूटकर करुण रस में बदल जाती है:- धावत राम बकईंयां हो रामा, धूरी भरे तन ।
चइता मूलत: मुक्तक लोकगीत है किन्तु कुछ चइते ऐसे भी मिलते हैं जिनकी अन्तराओं में स्थायी भावों का विस्तार कर बड़ा बना लिया गया है:-
एही ठैंयां मोतिया हेरानी हो रामा । ये ही ठैंयां ....
कोठवा में ढूंढूं, अटरिया में ढूंढूं
देवरा से पूछत लजानी हो रामा । ये ही ठैयां ....
सेजा में ढूंढूं, सुपेतिया में ढूंढूं
सईयां से पूछत लजानी हो रामा । ये ही ठैंयां ....
बारहमासा विरहणी के अन्तर्मन की अभिव्यक्ति का माध्यम रहा है । साल के बारह महीनों में विरह का अलग-अलग वर्णन यहां मिल जाता है । प्रारम्भ जून या आषाढ़ की पहली वर्षा से होता है और अन्त जेठ या वैशाख की तपती गर्मी से । बारहमासे का लघु रूप चौमासा भी उपलब्ध है । चौमासा में आषाढ़ से कुवार अथवा सावन से कार्तिक तक, प्रकृति का विरहणी के मन पर पड़ने वाले प्रभाव का चित्रण किया जाता है:-
क्या है तकदीर हमारी तजौ बनवारी । जेठ मास तन तपौ, अंग भावे नहीं सारी । बाढ़ै विरह असाढ, बून्द अदरा झकझारी । सावन सेज भयावन लागत , प्रियतम बिनु बून्द कटारी ।
तजौ बनवारी - - भादो गगन गम्भीर पीर अति हृदय मझारी कियो करार कुआर, सवति संग बसै मुरारी । कातिक रास रचै मनमोहन, कुबजा संग आप सिधारी । तजौ बनवारी - - अगहन अमित अनेक बिकल वृषभान दुलारी । पूष लगै तन आड़ देत कुबजा को गारी । माघ बसन्त हमें नहिं भावत, झूमर, चौताल, धमारी । तजौ बनवारी - -
फागुन उड़त अबीर, अरगजा, कूक मझारी
चैत फूलै बन टेस होत मुद मंगलकारी । द्विज छोटकुन वैशाख मनावत अरे पूजि गइले बारहमास
तजौ बनवारी - - 14
श्रम परिहार के गीतों में जन्तसर, धनकुट्टी, बिनावन, निरवाही, रोपनी, सोहनी, घाट, चरवाही के गीत, श्रम की प्रकृति में होने वाले बदलाव के कारण समाप्त होते जा रहे हैं ।
आटा पीसने का काम जब तक घर के जान्त पर होता था तब तक जन्तसर, भोर में घर-घर से सुनाई पड़ता था। जन्तसर दरअसल समाज और घर से उपेक्षित, प्रताड़ित नारी की पीड़ा व्यक्त करने के माध्यम थे । `रे ना, हे ना, हे राम, हुरे जी,´ ये आदि स्तोभ जन्तसर के अंग थे । चरणान्त के इन स्तोभों पर आकर दम फूल जाता था । इन्हीं स्तोभों पर स्त्रियां सांस भरती और जान्त में झींक डालतीं । जन्तसर लय प्रधान गीत है । यह छोटे आख्यानों के लंबे विवरणों का लोकगीत है:-15
सेर भर गेंहुआ रे बांसे के चंगेरिया
अरे पीसई चलेलीं जन्तसरिया हो राम ।
जान्त ना चलै रामा किलवा ना डोले
अरे जुअवा पकड़ि सखि रोवेली हो राम ।
धनकुट्टी और बिनावन के गीत प्राय: अनियन्त्रित लचारी शैली के होते हैं । बिनावन गीतों की लय, धनकुट्टी गीतों से कुछ विलंबित होती है । जन्तसर, निरवाही और किसी-किसी सोहर में यत्र-तत्र तुकों का प्रयोग हुआ है किन्तु कहरवा विशुद्ध अतुकान्त है । यद्यपि अन्त में पहले चरण के उत्तरार्ध की पुनरावृत्ति इस बात का भान नहीं होने देती ।
कहरवा की विषय वस्तु मुक्तप्रेम पर आधारित है । अपवाद स्वरूप कुछ नीतिपरक कहरवे भी देखने को मिलते हैं । कहरवा की लय द्रुत होती है । सम्भव है यह सोहर से भी पुराना हो परन्तु इसके कालखंड के बारे में ठीक-ठीक कुछ नहीं कहा जा सकता । यह भी सम्भव है कि बिरहों के उद्भव के बाद किन्ही दो शब्दों के मेल से यह ढाई चरण का स्वतन्त्र मुक्तक अंकुरित हुआ हो । बड़ा कहरवा निश्चित रूप से छिटका कहरवा के बाद जन्मा है ।16
मात्र लय पर आधारित लचीले विधान वाला अतुकान्त भावप्रधान गीत-सोहर सम्भवत: सबसे पुराना लोकगीत है । सोहर की सरलतम गायन-पद्धति, गायन में मात्र ताल-वाद्यों का प्रयोग, स्वल्प आरोह-अवरोह युक्त विलंबित लय इसकी पुरातनता के प्रमाण हैं । अनुमानत: जंगम जातियों के अर्ध निरर्थक गीतों के बाद ही सोहर का प्रादुर्भाव हुआ होगा। गीत में प्रयुक्त शब्दावली संस्कृत, प्राकृत, पाली और अपभ्रंश का ही विकसित रूप है । सोहर अपनी पहली अवस्था में मात्र लय आधारित अतुकान्त गीत था । दूसरी अवस्था में पद-स्तोभों का प्रयोग हुआ । तीसरी अवस्था में अनियन्त्रित तुकों का प्रयोग हुआ । तुलसी युग में इसी अवस्था का प्रभाव है ।17 पुत्र प्राप्ति पर खुशी, बंध्या स्त्री की पीड़ा, समाज के ताने, सभी कुछ सोहर में मिलते हैं । सोहर में देशकाल का अतिक्रमण करते हुए तमाम विषय वस्तुओं को समेटा गया है । जीरे के व्यापार और पुराने नगरों का भी सोहर में उल्लेख मिलता है । वैसे तो कहा जाता है कि लोकगीत कालसापेक्ष, जिजीविषा के तमाम संघषों, समाज की आन्तरिक और बाह्य, दैहिक और पारलौकिक संस्कृतियों को समेटते चलते हैं और ज्यादातर समाज के उपेक्षित तबकों यथा श्रमिक महिलाओं की अभिव्यक्ति के माध्यम होते हैं तथापि इन्हीं संघषों, अभिव्यक्तियों के साथ समयसापेक्ष या देशकाल के अतिक्रमण की पृष्ठभूमि भी तैयार होती है । जैसे तमाम अभावों, विपन्नताओं और रूग्णताओं से गुजरता श्रमशील मनुष्य यदि अपने जीवन में सुख नहीं प्राप्त करता तो भी उसके सामने स्वर्ग की परिकल्पना तो होती ही है । इसी स्वर्ग की परिकल्पना के कारण वह कभी काशी तो कभी मथुरा का चक्कर लगाता रहता है । स्वर्ग को हमने नहीं देखा है फिर भी तमाम काल्पनिक गल्पों में बता दिया जाता है कि वहां क्या-क्या है या नरक में किस तरह किसको सजा दी जाती है । एक सुख या भय का वातावरण, कल्पना में ही सही, तैयार कर दिया गया है । ठीक इसी प्रकार भोजपुरी सोहर लोकगीतों में ऐसे तमाम प्रसंग आए हैं जिनसे समयसापेक्ष से बाहर जाकर परिकल्पना की गई है । मसलन की लौंग के पेड़ की बात करें । हम जानते हैं कि पूरे भोजपुरी क्षेत्र में नारियल, लौंग, केसर, गुअवा(कसैली), मंजिष्ठा(एक प्रकार की पहाड़ी लता जिससे रंग तैयार होता है) या पलास के पेड़ नहीं उगते । तथापि तमाम भोजपुरी गीतों में इन पेड़-पौधों का जिक्र हुआ है, इनके होने की परिकल्पना की गई है । ये पौधों या वनस्पतियां धार्मिक महत्व के हैं या रूप, सौन्दर्य, पवित्रता, मोहकता के पर्याय हैं, इसलिए इनसे स्वयं को जोड़कर सुख, सौन्दर्य और मोहकता की परिकल्पना की गई है :-
1- कवना बने चुए नरियलवा, कवना बनवा केवल हो । ललना, कवना बनवा चुएला गुलाब, त चुनरी रंगाइबि हो । (भोजपुरी संस्कार गीत, सोहर सं0 3)
2-कवना बने फूले गुअवा नरियर, कवना बने फूल फुले हो, ए ललना कवना बने फूलेला मजीठिया, त चुनरी रंगाइबि हो । (भोजपुरी संस्कार गीत, सोहर सं0 4)
3-मोर पिछुअरिया लवंगिया, त हहर झहर करे ए, जड़ से कटाइब लवंगिया पलंगा बिनाइब ए । (भोजपुरी संस्कार गीत, सोहर सं0 10)
4-मोर पिछवरवा लवंगिया क बगिया लवंग फुले आधी राति रे, बहि लवंग कै सीतल बयरिया महंकै बड़े भिनुसार । ( कविता-कौमुदी- ग्रामगीत रामनरेश त्रिपाठी, विवाह गीत सं0 33)
5-मोर पिछवारे लौंग का बिरवा लौंग चुए आधी रात, लौंग बिनि-बिनि ढेर लगावों, लादत है बनिजार । ( कविता-कौमुदी- ग्रामगीत रामनरेश त्रिपाठी, विवाह गीत सं0 39)
6-कवना बने फूलेला सुपरिया, त कवना बने नरियर हो, आरे कवना बने फूलेला पलसवा, लोढ़न हम जाइबि हो । (भोजपुरी संस्कार गीत,सोहर सं0 14)
7- माई हे, हमराहिं बाबा के इलायची बारी, डाढ़े पाते सोहरि गइले हे । (भोजपुरी संस्कार गीत, विवाह गीत सं0 284)
लगता है ऐसी दुर्लभ, बहुमूल्य वस्तुएं जो जनसुलभ नहीं थीं, उनका लोकगीतों में सुनी-सुनाई बातों के रूप में वर्णन हुआ है । इसलिए कहीं-कहीं मिथ्या बातों का भी उल्लेख है:-ओहि रे अजोधिया एक पीपर, मोतियन फरल हो । या बलुवर खेत जोतइतुं, धन मोतिया बोअइतुं हो ।
संस्कार गीतों में सोहर के अलावा अन्नप्राशन, मुण्डन, जनेऊ के गीत भी गाये जाते रहे हैं । विवाह के गीत तो आज भी प्रचलित हैं ही । भोजपुरी समाज में हिन्दू और मुस्लिम समाज में लगभग समान शैली में विवाह/संस्कार गीतों का प्रचलन है:-
सुन्नत गीत
चांद हो तू त पश्चिमें उगिह
ओखली पर उगिह, छूरा पर उगिह उगिह दुलहवा के ऊपर, चांद हो तू त पश्चिमें उगिह
लोकगीतों में जातिगत विभाजन के बावजूद सांप्रदायिक विभाजन ढ़ूंढ़ना मुश्किल है । पंवरिया गायक मुस्लिम होते हुए भी सोहर और पंवारे गाते हैं जिनमें हिन्दू देवी-देवताओं की स्तुतियां होती हैं । `लोकरंग-1´ पुस्तक में ऐसे कुछ गीतों को प्रकाशित किया गया है । लोकरंग संस्कृतिक समिति मुस्लिम लोकगीतों पर काम कर रही है और हम शीघ्र ऐसी स्थिति में होंगे कि उन गीतों को प्रकाशन कर सकें ।
लचारी मूलत: अभिजात वर्ग की स्त्रियों का गीत है जो वेश्याओं के कोठे और उस्तादों के सरगम की पतली गली पार कर अभिजात वर्ग की स्त्रियों तक पहुंचा है । लचारी गीतों में विवशता के भाव मिलते हैं । यह गीत दो सदी से ज्यादा पुराना नहीं है । नवाब वाजिद अली शाह के दरबार में लचारी से ही ठुमरी और दादरा का जन्म हुआ है ।18 जातियों पर आधारित भेदभाव वाले भारतीय समाज में कुछ निम्नजातियों के अपने गीत थे । जैसे धोबी, तेली, दलित, नाई, गड़ेरिया कुम्हार, मल्लाह आदि के गीत । जोगी, कोल, सियरमरवा, वेश्या, हिजड़ों अदि के भी अपने गीत थे ।
समाज के विकास के साथ इन तमाम गंवई काम-धंधों में बदलाव आया । जीवनयापन की शैली बदली । लिहाजा इन गीतों को बदलना या लुप्त होना ही था । इन के बावजूद आज भी गांव , श्रम पर आधारित समाज है । वहां सिर्फ सामाजिकता और संवेदना का क्षरण हुआ है । गंवई जीवन में जो झूठ, लूट और फूट प्रवेश कर गई है उसे नियन्त्रित करने के लिए समरसता के विकास की जरूरत है । लोक जीवन में, लोकगीतों के बिना समरसता बनाए रखना सम्भव नही है । गंवई जीवन की समरसता बनाए रखने के लिए ही लोकगीतों का जन्म हुआ था। संवेदना को बचाए रखने में भी लोकगीतों का बहुत बड़ा योगदान था । अन्याय पर आधारित व्यवस्था को लोक की समरसता स्वीकार्य नहीं होती । व्यवस्था और सामन्ती संस्कृति सदा से लोेक संस्कृति के विरूद्ध रही है । लोक संस्कृति आम जनता को जोड़ती है जबकि गैर बराबरी की व्यवस्था समाज को तोड़ती है । लोकगीतों के काट के लिए अभिजात्य वर्ग ने शास्त्रीय संगीत को आगे बढ़ाया । उसकी सामूहिकता तोड़ी, उसकी सहजता तोड़ी । उसकी बन्दिश पर तमाम तरह के प्रतिबंध लगाए ।
आज लोकगीतों के महत्व को हल्का करने के लिए फूहड़पन का पर्याय बनाया जा रहा है । सुविधाभोगी समाज के पास लोकगीतों जैसी संपदा नही होती । श्रमशील समाज में ही लोकगीत जनमते हैं । आज लोकगीतों की प्रगतिशील चेतना को पीछे ढकेलते हुए, उन पर गंवारूपन का मुलम्मा चढ़ाकर, स्त्रीविरोधी और अश्लीलता का पर्याय बना रहा है । अश्लीलता लोकगीतों का मूल चरित्र नहीं है । यह लोकगीतों का बाजारीकरण है । इन्हें बिकाऊ बनाने के लिए अश्लील बनाया जा रहा है । इनकी जनपक्षधरता तोड़ी जा रही है । मीडिया के दूसरे माध्यमों से हमले तेज करा कर लोकगीतों को मात्र संग्रहालयों में रखने योग्य बना दिया गया है । इन सब के बावजूद लोकगीतों का आकर्षण कम नहीं हुआ है । हां उनकी धार कुन्द जरूर हुई है और ग्रामीण संस्कृति विकृत हुई है । लेकिन यह भी सच है कि जनता सदा अपनी संस्कृति की हिफाजत के लिए संघर्ष करती है । वह थोपी संस्कृति को सहजता से स्वीकार नहीं करती । यही कारण है कि आज भी शास्त्रीय संगीत जनमानस तक पहुंच नहीं पाया है जबकि तमाम कोशिशों के बावजूद लोकगीत अभी जिन्दा हैं ।
सुभाष चन्द्र कुशवाहा
सन्दर्भ
1-लोकरंग सांस्कृतिक समिति द्वारा ढ़ूंढ़े गए गीत ।
2-गंगा घाटी के गीत- डॉ0 हीरालाल तिवारी ।
3- भोजपुरी संस्कारगीत (12) ।
4- लोकरंग सांस्कृतिक समिति द्वारा ढ़ूंढ़े गए गीत ।
5-भोजपुरी संस्कारगीत (15) ।
6-गंगा घाटी के गीत- पृष्ठ 337 ।
7 -धीरे बहो गंगा-देवेन्द्र सत्यार्थी ।
8- भोजपुरी संस्कारगीत (29) ।
9,10 - गंगा घाटी के गीत- डॉ0 हीरालाल तिवारी ।
11 - लोकरंग सांस्कृतिक समिति द्वारा ढूंढे गए गीत ।
12- गंगा घाटी के गीत- डॉ0 हीरालाल तिवारी ।
13, 14- लोकरंग सांस्कृतिक समिति द्वारा ढ़ूंढ़े गए गीत ।
15, 16, 17, 18- गंगा घाटी के गीत- डॉ0 हीरालाल तिवारी ।
सोमवार, 5 अप्रैल 2010
चिकित्सा सुविधा से वंचित ग्रामीण आबादी
चिकित्सा सुविधा से वंचित ग्रामीण आबादी
-सुभाष चन्द्र कुशवाहा
`ग्रामीण क्षेत्रों में डॉक्टर नहीं हैं । प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र कागजों पर चल रहे हैं । वहां कोई सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं ।´ यह टिप्पणी देश के सर्वोच न्यायालय की है । एक अक्टूबर को की गई इस टिप्पणी से कल्याणकारी राज्य की अवधारणा की कलई खुल जाती है । यह टिप्पणी इस भयावहता को रेखांकित करती है कि देश के गरीबों का पुरसा हाल कोई नही है । बहुसंख्य गरीब जनता आज भी दुआ और नीम-हकीमों के भरोसे जी रही है । ओझा-सोखा,पीर-बाबा उन्हें ठगने के लिए अपनी दुकानें सजाए बैठे हैं । तन्त्र-मन्त्र के विज्ञापनों से अखबार रंगे पड़े हैं । आखिर गरीबों के पास ठगे जाने के अलावा चारा ही क्या है र्षोर्षो सन्तोष के लिए इन्हीं चमत्कारिक लोगों के चंगुल में फंसने को वे बाध्य कर दिए गए हैं । जिनकी थोड़ी बहुत हैसियत है वे चमत्कारिक पत्थरों को धारण कर अपनी बीमारियों को दूर करने का भ्रम पाले हुए मर रहें हैं । कुल मिलाकर इससे इनका आक्रोश दब जा रहा है ।
जब स्वास्थ्य सुविधाएं अपाहिज बना दी गई हों तो गरीब जाएं तो जाएं कहां ? पंचसितारा अस्पताल तो शहरों में खुले हैं जहां घुस पाना गरीबों के वश में नहीं । हजारों-लाखों रुपयों के इलाज के लिए इनके पास पैसा नही है । दिन-प्रतिदिन निजी अस्पतालों की अमानवीयता भी उजागर होने लगी है । कमीशनखोरी के लालच में तमाम गैरजरूरी जांच कराने, पैसा कमाने के लालच में अनावश्यक आपरेशन करने की घटनाएं आम होती जा रही हैं ।
दरअसल प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों को धीरे-धीरे अपाहिज बनाकर ही तमाम निजी स्वास्थ्य केन्द्रों को लहलहाने का रास्ता साफ किया गया है । चिकित्सा की पढ़ाई लम्बी और अत्यधिक मंहगी बना कर वहां से गरीबों की बेदखली कर दी गई है । ऐशो आराम की जिन्दगी जीने वाले अमीर डाक्टर गांवों में न तो निजी अस्पताल खेल सकते हैं न प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों पर नौकरी कर सकते हैं । यही कारण है कि ग्रामीण क्षेत्रों में काम करने हेतु पंजीकरण कराए 67 प्रतिशत डॉक्टर अपनी सेवाएं उपलब्ध नहीं कराते हैं ।
अपने देश में 26 करोड़ लोग ऐसे हैं, जिन्हें खाने के लिए दाल, सब्जी या चटनी में से कोई एक चीज बामुश्किल मिल पाती है । ग्रामीण क्षेत्रों में 30 प्रतिशत लोगों की दैनिक उपभोक्ता व्यय 12 रुपए से कम है जबकि शहरी क्षेत्र के 30 प्रतिशत लोग, रोजाना खाने-पीने पर 19 रुपए से ज्यादा खर्च नहीं कर पाते हैं । 10 प्रतिशत ग्रामीण आबादी ऐसी है जिनके पास दैनिक व्यय के लिए 9 रुपए से ज्यादा उपलब्ध नहीं है । ऐसे लोगों से हम यह उम्मीद नहीं कर सकते कि वे शहरों के निजी अस्पतालों में जाकर हजारों-लाखों खर्च कर अपना इलाज करा सकें । गुर्दा प्रत्यारोपण, कीमोथरेपी, बाईपास सर्जरी या डायलेसिस करा पाना किसी गरीब के वश में नहीं है । दूसरी ओर देश के अमीरों के लिए चिकित्सा सुविधाओं का अम्बार है । वे दौलत के बल पर शरीर के अंग-अंग ठीक करा सकते हैं । बुढ़ापे की झुर्रियां हटवा सकते हैं । प्लास्टिक सर्जरी और लाइपोसक्शन कराकर अपनी काया बदल सकते हैं ।
अपने देश में 30 हजार से लेकर 50 हजार की जनसंख्या पर एक प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र हैं । इस प्रकार देश में कुल 22,669 प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र है । राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन की ताजा रिपोर्ट के अनुसार 8 प्रतिशत प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों पर एक भी डाक्टर नहीं हैं । लगभग 20 प्रतिशत स्वास्थ्य केन्द्रों पर एक या एक भी डाक्टर नहीं हैं । जहां डॉक्टर तैनात हैं वे काम पर नहीं जाते हैं। 39 प्रतिशत प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों पर लैब टेक्नीशियन नही हैं । 17.7 प्रतिशत केन्द्रों पर फार्मेसिस्ट नहीं हैं । ऐसे में अनुमान लगा पाना सहज है कि सर्वोच न्यायालय की टिप्पणी अकारण नहीं है । 10 हजार की जनसंख्या पर एक, अर्थात लगभग 1,50,000 उप स्वास्थ्य केन्द्र हैं जो अल्प प्रशिक्षित मिडवाइफों के हवाले हैं । ये मिडवाइफें कभी कभार टिटनेस का टीका या आयरन की गोलियां बांट कर अपने कर्तव्यों को पूरा कर लेती हैं । यहां बच्चा पैदा कराने की जरूरी सुविधाएं तक नहीं हैं ।
बेहतर स्वास्थ्य सुविधा उपलब्ध कराने के उद्देश्य से देश में कुल 3910 कम्युनिटी स्वास्थ्य केन्द्र बनाए गए हैं । इनमें से 59.4 प्रतिशत केन्द्रों पर सर्जन, 45 प्रतिशत केन्द्रों पर स्त्री एवं प्रसूति रोग विशेषज्ञ, 61.1 प्रतिशत केन्द्रों पर फिजीशियन और 53.8 प्रतिशत केन्द्रों पर बालरोग विशेषज्ञ नहीं हैं । लगभग 20 लाख की जनसंख्या पर एक, अर्थात 600 जिला अस्पताल हैं जहां सुविधाओं के नाम पर कुछ डॉक्टर एवं कुछ बिस्तर उपलब्ध हैं । अल्ट्रा साउण्ड, एक्स-रे या डायलेसिस की सुविधा ज्यादातर जिला अस्पतालों में कार्य रूप में नहीं है ।
उ0प्र0, बिहार, उड़ीसा, मध्यप्रदेश और राजस्थान जैसे `बीमारू´ राज्यों की स्थिति और भी खराब है । उ0प्र0 में लगभग 14,500 डॉक्टरों के पद हैं जिन पर मात्र 8000 डॉक्टर तैनात हैं । इनमें से चालीस प्रतिशत डॉक्टर ड्यूटी पर नहीं जाते हैं। प्रति वर्ष देश में 29,500 चिकित्सा स्नातक तैयार होते हैं जिनमें से अधिकांश शहरों या विदेशों की ओर रूख करते हैं । मेडिकल कौंसिल ऑफ इण्डिया के अनुसार देश में कुल 6लाख 83 हजार पांच सौ बयासी डॉक्टर पंजीकृत हैं जिनमें से अधिकांश शहरों में हैं । ग्रामीण क्षेत्र अब भी झोला छाप डॉक्टरों और नीम-हकीमों के हवाले है ।
गांवों में डॉक्टरों के न जाने के पीछे, चिकित्सा क्षेत्र में अभिजात्य वर्ग का वर्चस्व, डाक्टरी की महंगी पढ़ाई के कारण गरीब छात्रों की चिकित्सा शिक्षा से बेदखली, प्रमुख कारण है । आवागमन के साधनों और बिजली की अनुपलब्धता, शिक्षा और सुरक्षा की समस्या के कारण भी डॉक्टर वहां जाने से कतराते हैं ।
आज देश में डॉक्टरों की कमी तो है ही, योग्य डॉक्टरों की बेहद कमी है । चिकित्सा की पढ़ाई जिन मेडिकल कॉलेजों में होती हैं, उनमें से कईयों की हालत खराब है । मेडिकल कौंसिल ऑफ इण्डिया ने कुछ मेडिकल कॉलेजों में शिक्षकों की कमी को रेखांकित करते हुए उनके द्वारा जारी डिग्रिओं को अमान्य करने की चेतावनी दे दी है । इनमें से उ0प्र0 और बिहार के कई मेडिकल कॉलेज शामिल हैं । अगर हमने इस दिशा में ठोस कार्यवाही न की तो आने वाले दिनों में स्थिति और भयावह होगी । कॉन्ट्रैक्ट आधार पर शिक्षकों की तैनाती से काम नहीं चलने वाला है । योग्य शिक्षक कॉन्ट्रैक्ट आधार पर नहीं मिल सकते । चिकित्सा शिक्षा की पढ़ाई अयोग्य हाथों में देने का दुष्परिणाम घातक होगा ।
एक तो चिकित्सा की लम्बी और खर्चीली पढ़ाई के कारण मेधावी छात्र इस क्षेत्र में आने से बचने लगे हैं वहीं दूसरी ओर इंजीनियरिंग या मैनेजमेंट की पढ़ाई कम समय में पूरी हो जाती है और वहां पैसा कमाने के अवसर ज्यादा हैं । यही कारण है कि सी0पी0एम0टी0 की परीक्षाओं में शामिल होने वाले विद्यार्थियों की संख्या कम होने लगी है ।
एक ओर अशिक्षा दूसरी ओर गरीबी के कारण गरीबों की बीमारी जानलेवा होती जा रही है । गरीब तमाम पीर-बाबा, ओझा-सोखा के चंगुल में फंस कर दम तोड रहे हैं । गरीबी और मजबूरी उन्हें कोई राह नहीं सुझाती । चाहें इंसेफिलाइटिस का कहर हो या तपेदिक का, हर ओर कंधे पर लाश उठाए, विलाप करते मरीजों के परिजन दिख जाते हैं । ऐसे में सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणी हमारे लिए गम्भीर चेतावनी होनी चाहिए । हमें यह स्वीकार करना चाहिए कि गरीबों को चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराने की समस्या गम्भीर हो गई है । इस दिशा में कुछ ठोस किया जाना चाहिए । हमें औद्योगिक विकास दर की चिन्ता करने के पूर्व देश की बहुसंख्यक आबादी की चिन्ता करनी चाहिए । देश की बीस प्रतिशत आबादी के लिए सारी चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराकर हम अस्सी प्रतिशत आबादी के साथ अमानवीय व्यवहार कर रहे हैं । हमें अपनी प्राथमिकताओं को पुन: परिभाषित करने की आवश्यकता है । प्रचार के लिए अस्पताल बनवा देने से गरीबों का भला नहीं होने वाला है । जरूरी है अस्पतालों में डाक्टर, दवा और जांच की सुविधाएं भी हों ।
सुभाष चन्द्र कुशवाहा
बी 4/140 विशालखण्ड
गोमतीनगर
लखनऊ 226010
-सुभाष चन्द्र कुशवाहा
`ग्रामीण क्षेत्रों में डॉक्टर नहीं हैं । प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र कागजों पर चल रहे हैं । वहां कोई सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं ।´ यह टिप्पणी देश के सर्वोच न्यायालय की है । एक अक्टूबर को की गई इस टिप्पणी से कल्याणकारी राज्य की अवधारणा की कलई खुल जाती है । यह टिप्पणी इस भयावहता को रेखांकित करती है कि देश के गरीबों का पुरसा हाल कोई नही है । बहुसंख्य गरीब जनता आज भी दुआ और नीम-हकीमों के भरोसे जी रही है । ओझा-सोखा,पीर-बाबा उन्हें ठगने के लिए अपनी दुकानें सजाए बैठे हैं । तन्त्र-मन्त्र के विज्ञापनों से अखबार रंगे पड़े हैं । आखिर गरीबों के पास ठगे जाने के अलावा चारा ही क्या है र्षोर्षो सन्तोष के लिए इन्हीं चमत्कारिक लोगों के चंगुल में फंसने को वे बाध्य कर दिए गए हैं । जिनकी थोड़ी बहुत हैसियत है वे चमत्कारिक पत्थरों को धारण कर अपनी बीमारियों को दूर करने का भ्रम पाले हुए मर रहें हैं । कुल मिलाकर इससे इनका आक्रोश दब जा रहा है ।
जब स्वास्थ्य सुविधाएं अपाहिज बना दी गई हों तो गरीब जाएं तो जाएं कहां ? पंचसितारा अस्पताल तो शहरों में खुले हैं जहां घुस पाना गरीबों के वश में नहीं । हजारों-लाखों रुपयों के इलाज के लिए इनके पास पैसा नही है । दिन-प्रतिदिन निजी अस्पतालों की अमानवीयता भी उजागर होने लगी है । कमीशनखोरी के लालच में तमाम गैरजरूरी जांच कराने, पैसा कमाने के लालच में अनावश्यक आपरेशन करने की घटनाएं आम होती जा रही हैं ।
दरअसल प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों को धीरे-धीरे अपाहिज बनाकर ही तमाम निजी स्वास्थ्य केन्द्रों को लहलहाने का रास्ता साफ किया गया है । चिकित्सा की पढ़ाई लम्बी और अत्यधिक मंहगी बना कर वहां से गरीबों की बेदखली कर दी गई है । ऐशो आराम की जिन्दगी जीने वाले अमीर डाक्टर गांवों में न तो निजी अस्पताल खेल सकते हैं न प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों पर नौकरी कर सकते हैं । यही कारण है कि ग्रामीण क्षेत्रों में काम करने हेतु पंजीकरण कराए 67 प्रतिशत डॉक्टर अपनी सेवाएं उपलब्ध नहीं कराते हैं ।
अपने देश में 26 करोड़ लोग ऐसे हैं, जिन्हें खाने के लिए दाल, सब्जी या चटनी में से कोई एक चीज बामुश्किल मिल पाती है । ग्रामीण क्षेत्रों में 30 प्रतिशत लोगों की दैनिक उपभोक्ता व्यय 12 रुपए से कम है जबकि शहरी क्षेत्र के 30 प्रतिशत लोग, रोजाना खाने-पीने पर 19 रुपए से ज्यादा खर्च नहीं कर पाते हैं । 10 प्रतिशत ग्रामीण आबादी ऐसी है जिनके पास दैनिक व्यय के लिए 9 रुपए से ज्यादा उपलब्ध नहीं है । ऐसे लोगों से हम यह उम्मीद नहीं कर सकते कि वे शहरों के निजी अस्पतालों में जाकर हजारों-लाखों खर्च कर अपना इलाज करा सकें । गुर्दा प्रत्यारोपण, कीमोथरेपी, बाईपास सर्जरी या डायलेसिस करा पाना किसी गरीब के वश में नहीं है । दूसरी ओर देश के अमीरों के लिए चिकित्सा सुविधाओं का अम्बार है । वे दौलत के बल पर शरीर के अंग-अंग ठीक करा सकते हैं । बुढ़ापे की झुर्रियां हटवा सकते हैं । प्लास्टिक सर्जरी और लाइपोसक्शन कराकर अपनी काया बदल सकते हैं ।
अपने देश में 30 हजार से लेकर 50 हजार की जनसंख्या पर एक प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र हैं । इस प्रकार देश में कुल 22,669 प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र है । राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन की ताजा रिपोर्ट के अनुसार 8 प्रतिशत प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों पर एक भी डाक्टर नहीं हैं । लगभग 20 प्रतिशत स्वास्थ्य केन्द्रों पर एक या एक भी डाक्टर नहीं हैं । जहां डॉक्टर तैनात हैं वे काम पर नहीं जाते हैं। 39 प्रतिशत प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों पर लैब टेक्नीशियन नही हैं । 17.7 प्रतिशत केन्द्रों पर फार्मेसिस्ट नहीं हैं । ऐसे में अनुमान लगा पाना सहज है कि सर्वोच न्यायालय की टिप्पणी अकारण नहीं है । 10 हजार की जनसंख्या पर एक, अर्थात लगभग 1,50,000 उप स्वास्थ्य केन्द्र हैं जो अल्प प्रशिक्षित मिडवाइफों के हवाले हैं । ये मिडवाइफें कभी कभार टिटनेस का टीका या आयरन की गोलियां बांट कर अपने कर्तव्यों को पूरा कर लेती हैं । यहां बच्चा पैदा कराने की जरूरी सुविधाएं तक नहीं हैं ।
बेहतर स्वास्थ्य सुविधा उपलब्ध कराने के उद्देश्य से देश में कुल 3910 कम्युनिटी स्वास्थ्य केन्द्र बनाए गए हैं । इनमें से 59.4 प्रतिशत केन्द्रों पर सर्जन, 45 प्रतिशत केन्द्रों पर स्त्री एवं प्रसूति रोग विशेषज्ञ, 61.1 प्रतिशत केन्द्रों पर फिजीशियन और 53.8 प्रतिशत केन्द्रों पर बालरोग विशेषज्ञ नहीं हैं । लगभग 20 लाख की जनसंख्या पर एक, अर्थात 600 जिला अस्पताल हैं जहां सुविधाओं के नाम पर कुछ डॉक्टर एवं कुछ बिस्तर उपलब्ध हैं । अल्ट्रा साउण्ड, एक्स-रे या डायलेसिस की सुविधा ज्यादातर जिला अस्पतालों में कार्य रूप में नहीं है ।
उ0प्र0, बिहार, उड़ीसा, मध्यप्रदेश और राजस्थान जैसे `बीमारू´ राज्यों की स्थिति और भी खराब है । उ0प्र0 में लगभग 14,500 डॉक्टरों के पद हैं जिन पर मात्र 8000 डॉक्टर तैनात हैं । इनमें से चालीस प्रतिशत डॉक्टर ड्यूटी पर नहीं जाते हैं। प्रति वर्ष देश में 29,500 चिकित्सा स्नातक तैयार होते हैं जिनमें से अधिकांश शहरों या विदेशों की ओर रूख करते हैं । मेडिकल कौंसिल ऑफ इण्डिया के अनुसार देश में कुल 6लाख 83 हजार पांच सौ बयासी डॉक्टर पंजीकृत हैं जिनमें से अधिकांश शहरों में हैं । ग्रामीण क्षेत्र अब भी झोला छाप डॉक्टरों और नीम-हकीमों के हवाले है ।
गांवों में डॉक्टरों के न जाने के पीछे, चिकित्सा क्षेत्र में अभिजात्य वर्ग का वर्चस्व, डाक्टरी की महंगी पढ़ाई के कारण गरीब छात्रों की चिकित्सा शिक्षा से बेदखली, प्रमुख कारण है । आवागमन के साधनों और बिजली की अनुपलब्धता, शिक्षा और सुरक्षा की समस्या के कारण भी डॉक्टर वहां जाने से कतराते हैं ।
आज देश में डॉक्टरों की कमी तो है ही, योग्य डॉक्टरों की बेहद कमी है । चिकित्सा की पढ़ाई जिन मेडिकल कॉलेजों में होती हैं, उनमें से कईयों की हालत खराब है । मेडिकल कौंसिल ऑफ इण्डिया ने कुछ मेडिकल कॉलेजों में शिक्षकों की कमी को रेखांकित करते हुए उनके द्वारा जारी डिग्रिओं को अमान्य करने की चेतावनी दे दी है । इनमें से उ0प्र0 और बिहार के कई मेडिकल कॉलेज शामिल हैं । अगर हमने इस दिशा में ठोस कार्यवाही न की तो आने वाले दिनों में स्थिति और भयावह होगी । कॉन्ट्रैक्ट आधार पर शिक्षकों की तैनाती से काम नहीं चलने वाला है । योग्य शिक्षक कॉन्ट्रैक्ट आधार पर नहीं मिल सकते । चिकित्सा शिक्षा की पढ़ाई अयोग्य हाथों में देने का दुष्परिणाम घातक होगा ।
एक तो चिकित्सा की लम्बी और खर्चीली पढ़ाई के कारण मेधावी छात्र इस क्षेत्र में आने से बचने लगे हैं वहीं दूसरी ओर इंजीनियरिंग या मैनेजमेंट की पढ़ाई कम समय में पूरी हो जाती है और वहां पैसा कमाने के अवसर ज्यादा हैं । यही कारण है कि सी0पी0एम0टी0 की परीक्षाओं में शामिल होने वाले विद्यार्थियों की संख्या कम होने लगी है ।
एक ओर अशिक्षा दूसरी ओर गरीबी के कारण गरीबों की बीमारी जानलेवा होती जा रही है । गरीब तमाम पीर-बाबा, ओझा-सोखा के चंगुल में फंस कर दम तोड रहे हैं । गरीबी और मजबूरी उन्हें कोई राह नहीं सुझाती । चाहें इंसेफिलाइटिस का कहर हो या तपेदिक का, हर ओर कंधे पर लाश उठाए, विलाप करते मरीजों के परिजन दिख जाते हैं । ऐसे में सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणी हमारे लिए गम्भीर चेतावनी होनी चाहिए । हमें यह स्वीकार करना चाहिए कि गरीबों को चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराने की समस्या गम्भीर हो गई है । इस दिशा में कुछ ठोस किया जाना चाहिए । हमें औद्योगिक विकास दर की चिन्ता करने के पूर्व देश की बहुसंख्यक आबादी की चिन्ता करनी चाहिए । देश की बीस प्रतिशत आबादी के लिए सारी चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराकर हम अस्सी प्रतिशत आबादी के साथ अमानवीय व्यवहार कर रहे हैं । हमें अपनी प्राथमिकताओं को पुन: परिभाषित करने की आवश्यकता है । प्रचार के लिए अस्पताल बनवा देने से गरीबों का भला नहीं होने वाला है । जरूरी है अस्पतालों में डाक्टर, दवा और जांच की सुविधाएं भी हों ।
सुभाष चन्द्र कुशवाहा
बी 4/140 विशालखण्ड
गोमतीनगर
लखनऊ 226010
शनिवार, 3 अप्रैल 2010
प्राथमिक शिक्षा का सूरतेहाल
चर्चा में पढ़ाई नहीं, मिड-डे-मील है
प्राथमिक पाठशालाओं में पकने वाला मिड-डे-मील हमेशा चर्चा में रहा है, शासन-प्रशासन, मीडिया और हर कहीं । कभी खाना न बनने, विषाक्त खाना खाकर बीमार होने या खाने में छिपकली, कीड़ों और गन्दगी की वजह से तो कभी दलित महिला द्वारा खाना तैयार कर सवर्ण बच्चों का धर्मभ्रष्ट करने की वजह से । इन पाठशालाओं की पढ़ाई और उनकी गुणवत्ता, उनमें कुछ जरूरी सुधार किए जाने की आवश्यकता कभी चर्चा का विषय नहीं बनी । गोया प्राथमिक शिक्षा का मतलब पढ़ाई नहीं, मिड-डे-मील ही होता हो । खाद्य पदार्थों में हुई बेतहाशा मूल्य वृद्धि की वजह से प्राथमिक शिक्षा पर पैनी नज़र रखने वाले भी कह रहे हैं कि महंगाई ने मिड-डे-मील को बेस्वाद कर दिया है । दलिया में दूध की जगह पानी, दाल में पानी और खीर में पानी की बात चर्चा में सुनाई देने लगी है । एन0जी0ओ0 वाले, ग्राम प्रधान और प्रधानाध्यापक कह रहे हैं कि अब मिड-डे-मील तैयार करने की लागत तीन रुपए तीस पैसे से लेकर सात रुपए तक हो गई है । ऐसे में भला पौष्टिक मिड-डे-मील दिया जाए तो कैसे र्षोर्षो एन0जी0ओ0, प्रशासन, प्रधान और प्रधानाध्यापक सब इसी चिन्ता में गले जा रहे हैं । दरअसल स्कूली बच्चों की सेहत से ज्यादा इन्हें अपनी सेहत की चिन्ता सता रही है । एकबारगी प्राथमिक शिक्षा की इस तस्वीर और मिड-डे-मील से जुड़े समाचारों से भान होता है कि कभी पढ़ाई, सांस्कृतिक गतिविधियों और खेलकूद प्रतियोगिताओं के लिए जाने जाने वाले ये विद्यालय आज भोजनालय में तब्दील हो चुके हैं । अब यहां पढ़ाई और बाल विकास की गतिविधियों के अलावा सब कुछ होता है । विद्यालयों में अध्यापक के नाम पर एक या दो शिक्षा मित्र हैं । प्रधानाध्यापक के पास तो विद्यालय भवन निर्माण, छात्रवृत्ति वितरण, मिड-डे-मील जैसे तमाम लाभप्रद कामों के अलावा पल्स-पोलियो, चुनाव, जनगणना जैसे अलाभप्रद काम भी हैं । भवन निर्माण, मिड-डे-मील, छात्रवृत्ति वितरण जैसी सेवाओं से प्रधान और प्रधानाध्यापक सहित तमाम तन्त्र लाभान्वित हो रहे हैं । यह सब जिस बुनियादी शिक्षा के लिए किया जा रहा है, वहां से शिक्षा कोसों दूर जा चुकी है । यह बात अभिभावकों को भी पता है और अध्यापकों को भी । निजी स्कूलों के अध्यापकों को पल्स-पोलियो, चुनाव, जनगणना जैसे कार्य नहीं करने होते । इससे धनिकों के बच्चों की पढ़ाई बाधित नहीं होती ।
सरकारी स्कूलों में छात्रवृत्ति और मिड-डे-मील के आकर्षण की वजह से छात्र पंजियन पुस्तिका में सैकड़ों की संख्या में नाम दर्ज हैं । इसी वजह से मानव संसाधन विकास मन्त्रालय की स्थायी समिति की रपट में कहा जा रहा है कि पहली से पांचवी कक्षा तक के बच्चों के स्कूल छोड़ने की दर घटी है । जबकि हकीकत दूसरी ही है । एक ओर मिड-डे मील के मद में आवंटित धनराशि खर्च नहीं हो पा रही है तो दूसरी और स्कूलों में पढ़ाने के लिए न तो माहौल है न अध्यापक । कुल मिलाकर देश के चरित्र निर्माण की प्रारिम्भक ईकाई, चारित्रिक पतन की सबसे घिनौनी ईकाई में तब्दील हो चुकी है ।
इस बीच एक बार फिर केन्द्र सरकार ने मिड-डे-मील योजना में संशोधन प्रस्ताव को मंजूरी देकर 12 करोड़ बच्चों की सेहत सुधारने की घोषणा कर दी है । अब दाल की मात्रा 25 ग्राम से बढ़ाकर 30 ग्राम, सब्जी की 65 ग्राम से बढ़ाकर 75 ग्राम और तेल और वसा की मात्रा दस से घटाकर साढ़े सात प्रतिशत कर दी गई है । भोजन पकाने का खर्च ढाई रुपए से बढ़ाकर पौने चार रुपए कर दिया गया है । अब 25 छात्रों पर एक रसोइया, 100 तक छात्र होने पर दो और आगे प्रति 100 छात्र पर एक अतिरिक्त रसोइया रखा जा सकेगा जिन्हें 1000 रुपए प्रति माह मिलेगा । कुल मिलाकर खाद्य पदार्थों में 5-5 ग्राम की वृद्धि कर गरीबों के प्रति और ज्यादा संवेदनशील दिखने का प्रयास किया जा रहा है ।
हम सभी जानते हैं कि जिन पाठशालाओं में मिड-डे-मील खिलाया जाता है वहां मात्र गरीबों के ही बच्चे पढ़ने के नाम पर जाते हैं, जिनमें दलितों और पिछड़ों की ही बहुतायत होती है । ग्रामीण इलाकों के इन पाठशालाओं में शायद ही कभी किलो-तराजू से तौल कर खाना पकाया जाता हो और शायद ही प्रतिदिन इसकी जांच सम्भव हो । ऐसे में इस नए संशोधन प्रस्ताव का वास्तविक फायदा होना मुश्किल है । इन पाठशालाओं में जितने बच्चों के नाम दर्ज हैं,उसके दसवें भाग के बराबर ही बच्चे मिड-डे-मील खाने आते हैं । अधिक से अधिक नाम तो इसलिए दर्ज करा दिए जाते हैं जिससे ज्यादा राशन, ज्यादा सरकारी धन मिल सके और जिसका सदुपयोग इस तन्त्र के तमाम पायदानों से लेकर प्रधान और प्रधानाध्यापक तक कर सकें । बच्चों की अधिक संख्या दिखाकर ही तो मिड-डे-मील योजना की सफलता के डंके पीटे जा रहे हैं । जबकि हकीकत यह है कि एक बच्चे का नाम दो-दो सरकारी पाठशालाओं में दर्ज हैं और वह पढ़ने जाता है गांव में खुले निजी पाठशाला में । प्रधान और प्रधानाध्यापक को इन बच्चों के अभिभावक सहयोग इसलिए करते हैं जिससे उनके बच्चे को मुफ्त में प्रत्येक पाठशाला से तीन सौ रुपए वार्षिक छात्रवृत्ति मिलती रहे । यानी कि एक बच्चे का नाम दो प्राथमिक पाठशालाओं में दर्ज होगा तो दोनों जगहों से कुल छ: सौ रुपए वाषिZक छात्रवृत्ति मिल जायेगी । पहले जहां पटरी, टाट और श्यामपट्ट के सहारे गरीबों के बच्चे इन स्कूलों में पढ़ कर बेहतर स्थिति में पहुंच जाते थे वहीं अब शायद ही किसी गरीब का बच्चा मिड-डे-मील खा कर व्यावसायिक शिक्षा की ओर जा पाता है । व्यावसायिक शिक्षा की कमान निजी पाठशालाओं के हाथों में आ चुकी हैं जहां सक्षम लोगों के बच्चे पढ़-लिख कर अपना भविष्य बना रहे हैं । सचमुच यह मिड-डे-मील योजना बहुत ही चालाकी भरी योजना है जिसकी वजह से गरीब का बच्चा वहीं का वहीं रह जाए, उसकी औकात कटोरा लेकर आने और मिड-डे-मील खाने, कुछ रुपए की छात्रवृत्ति पाने तक बनी रहे और अमीरों के बच्चों के लिए व्यावसायिक शिक्षा के सारे अवसर उपलब्ध रहें । दोहरी शिक्षा नीति, जो दोहरी भाषा के साथ लाई गई थी, समाज के बहुसंख्यक गरीबों को ऊपर बढ़ने के रास्ते से वंचित कर, अमीरों को सुलभ रास्ते उपलब्ध कराने की सोची-समझी रणनीति थी । मिड-डे-मील योजना के धूर्त नीति-नियन्ता कहते हैं कि प्राथमिक पाठशालाओं के श्यापट्ट पर प्रत्येक दिन के खाने का मीनू लिखना अनिवार्य होगा। भई वाह! है न खूबसूरत नीति ? इससे गरीबों के बच्चे, पढ़ाई न होने के बावजूद श्यापमट्ट पर मीनू पढ़कर मुंह में पानी भर लेंगे और शान्तिपूवर्क रसोइए की ओर टकटकी लगाए वक्त गुजार देंगे । ऐसी हास्यास्पद नीतियां बनाने वालों को पहले यह सोचना चाहिए कि श्यामपट्ट खाने का मीनू लिखने के लिए नहीं होता, बेहतर शिक्षा देने के लिए होता है ।
प्राथमिक पाठशालाओं को बचाने का एक मात्र विकल्प यह होगा कि मिड-डे-मील जैसी दिखावटी और फिजूलखर्ची वाली योजनाओं को तुरत बन्द करते हुए सभी पाठशालाओं में कम से कम पांच से छ: योग्य स्थाई अध्यापकों की नियुक्ति कर उनके शिक्षण, प्रशिक्षण की प्रक्रिया पर निरन्तर नज़र रखने वाले जवाब देह तन्त्र को स्थापित किया जाए । अध्यापकों की जवाबदेही बेहतर परिणाम देने की होनी चाहिए न कि जनगणना, पल्सपोलियो, मतदान आदि में उलझाए रखने के लिए । गरीब बच्चों की मदद करने के लिए दूसरे तमाम तरीकें हैं । जैसे कि छात्रवृत्ति और अनाज, 80 प्रतिशत उपस्थिति दर्ज कराने वाले बच्चों के अभिभावकों को मुहैया कराई जा सकती है । कम से कम पाठशालाओं को रसोईघर में तब्दील होने से बचाये बगैर प्राथमिक शिक्षा का भला नहीं होने वाला है ।
सुभाष चन्द्र कुशवाहा
बी 4/140 विशालखण्ड
गोमतीनगर,लखनऊ 226010
चर्चा में पढ़ाई नहीं, मिड-डे-मील है
प्राथमिक पाठशालाओं में पकने वाला मिड-डे-मील हमेशा चर्चा में रहा है, शासन-प्रशासन, मीडिया और हर कहीं । कभी खाना न बनने, विषाक्त खाना खाकर बीमार होने या खाने में छिपकली, कीड़ों और गन्दगी की वजह से तो कभी दलित महिला द्वारा खाना तैयार कर सवर्ण बच्चों का धर्मभ्रष्ट करने की वजह से । इन पाठशालाओं की पढ़ाई और उनकी गुणवत्ता, उनमें कुछ जरूरी सुधार किए जाने की आवश्यकता कभी चर्चा का विषय नहीं बनी । गोया प्राथमिक शिक्षा का मतलब पढ़ाई नहीं, मिड-डे-मील ही होता हो । खाद्य पदार्थों में हुई बेतहाशा मूल्य वृद्धि की वजह से प्राथमिक शिक्षा पर पैनी नज़र रखने वाले भी कह रहे हैं कि महंगाई ने मिड-डे-मील को बेस्वाद कर दिया है । दलिया में दूध की जगह पानी, दाल में पानी और खीर में पानी की बात चर्चा में सुनाई देने लगी है । एन0जी0ओ0 वाले, ग्राम प्रधान और प्रधानाध्यापक कह रहे हैं कि अब मिड-डे-मील तैयार करने की लागत तीन रुपए तीस पैसे से लेकर सात रुपए तक हो गई है । ऐसे में भला पौष्टिक मिड-डे-मील दिया जाए तो कैसे र्षोर्षो एन0जी0ओ0, प्रशासन, प्रधान और प्रधानाध्यापक सब इसी चिन्ता में गले जा रहे हैं । दरअसल स्कूली बच्चों की सेहत से ज्यादा इन्हें अपनी सेहत की चिन्ता सता रही है । एकबारगी प्राथमिक शिक्षा की इस तस्वीर और मिड-डे-मील से जुड़े समाचारों से भान होता है कि कभी पढ़ाई, सांस्कृतिक गतिविधियों और खेलकूद प्रतियोगिताओं के लिए जाने जाने वाले ये विद्यालय आज भोजनालय में तब्दील हो चुके हैं । अब यहां पढ़ाई और बाल विकास की गतिविधियों के अलावा सब कुछ होता है । विद्यालयों में अध्यापक के नाम पर एक या दो शिक्षा मित्र हैं । प्रधानाध्यापक के पास तो विद्यालय भवन निर्माण, छात्रवृत्ति वितरण, मिड-डे-मील जैसे तमाम लाभप्रद कामों के अलावा पल्स-पोलियो, चुनाव, जनगणना जैसे अलाभप्रद काम भी हैं । भवन निर्माण, मिड-डे-मील, छात्रवृत्ति वितरण जैसी सेवाओं से प्रधान और प्रधानाध्यापक सहित तमाम तन्त्र लाभान्वित हो रहे हैं । यह सब जिस बुनियादी शिक्षा के लिए किया जा रहा है, वहां से शिक्षा कोसों दूर जा चुकी है । यह बात अभिभावकों को भी पता है और अध्यापकों को भी । निजी स्कूलों के अध्यापकों को पल्स-पोलियो, चुनाव, जनगणना जैसे कार्य नहीं करने होते । इससे धनिकों के बच्चों की पढ़ाई बाधित नहीं होती ।
सरकारी स्कूलों में छात्रवृत्ति और मिड-डे-मील के आकर्षण की वजह से छात्र पंजियन पुस्तिका में सैकड़ों की संख्या में नाम दर्ज हैं । इसी वजह से मानव संसाधन विकास मन्त्रालय की स्थायी समिति की रपट में कहा जा रहा है कि पहली से पांचवी कक्षा तक के बच्चों के स्कूल छोड़ने की दर घटी है । जबकि हकीकत दूसरी ही है । एक ओर मिड-डे मील के मद में आवंटित धनराशि खर्च नहीं हो पा रही है तो दूसरी और स्कूलों में पढ़ाने के लिए न तो माहौल है न अध्यापक । कुल मिलाकर देश के चरित्र निर्माण की प्रारिम्भक ईकाई, चारित्रिक पतन की सबसे घिनौनी ईकाई में तब्दील हो चुकी है ।
इस बीच एक बार फिर केन्द्र सरकार ने मिड-डे-मील योजना में संशोधन प्रस्ताव को मंजूरी देकर 12 करोड़ बच्चों की सेहत सुधारने की घोषणा कर दी है । अब दाल की मात्रा 25 ग्राम से बढ़ाकर 30 ग्राम, सब्जी की 65 ग्राम से बढ़ाकर 75 ग्राम और तेल और वसा की मात्रा दस से घटाकर साढ़े सात प्रतिशत कर दी गई है । भोजन पकाने का खर्च ढाई रुपए से बढ़ाकर पौने चार रुपए कर दिया गया है । अब 25 छात्रों पर एक रसोइया, 100 तक छात्र होने पर दो और आगे प्रति 100 छात्र पर एक अतिरिक्त रसोइया रखा जा सकेगा जिन्हें 1000 रुपए प्रति माह मिलेगा । कुल मिलाकर खाद्य पदार्थों में 5-5 ग्राम की वृद्धि कर गरीबों के प्रति और ज्यादा संवेदनशील दिखने का प्रयास किया जा रहा है ।
हम सभी जानते हैं कि जिन पाठशालाओं में मिड-डे-मील खिलाया जाता है वहां मात्र गरीबों के ही बच्चे पढ़ने के नाम पर जाते हैं, जिनमें दलितों और पिछड़ों की ही बहुतायत होती है । ग्रामीण इलाकों के इन पाठशालाओं में शायद ही कभी किलो-तराजू से तौल कर खाना पकाया जाता हो और शायद ही प्रतिदिन इसकी जांच सम्भव हो । ऐसे में इस नए संशोधन प्रस्ताव का वास्तविक फायदा होना मुश्किल है । इन पाठशालाओं में जितने बच्चों के नाम दर्ज हैं,उसके दसवें भाग के बराबर ही बच्चे मिड-डे-मील खाने आते हैं । अधिक से अधिक नाम तो इसलिए दर्ज करा दिए जाते हैं जिससे ज्यादा राशन, ज्यादा सरकारी धन मिल सके और जिसका सदुपयोग इस तन्त्र के तमाम पायदानों से लेकर प्रधान और प्रधानाध्यापक तक कर सकें । बच्चों की अधिक संख्या दिखाकर ही तो मिड-डे-मील योजना की सफलता के डंके पीटे जा रहे हैं । जबकि हकीकत यह है कि एक बच्चे का नाम दो-दो सरकारी पाठशालाओं में दर्ज हैं और वह पढ़ने जाता है गांव में खुले निजी पाठशाला में । प्रधान और प्रधानाध्यापक को इन बच्चों के अभिभावक सहयोग इसलिए करते हैं जिससे उनके बच्चे को मुफ्त में प्रत्येक पाठशाला से तीन सौ रुपए वार्षिक छात्रवृत्ति मिलती रहे । यानी कि एक बच्चे का नाम दो प्राथमिक पाठशालाओं में दर्ज होगा तो दोनों जगहों से कुल छ: सौ रुपए वाषिZक छात्रवृत्ति मिल जायेगी । पहले जहां पटरी, टाट और श्यामपट्ट के सहारे गरीबों के बच्चे इन स्कूलों में पढ़ कर बेहतर स्थिति में पहुंच जाते थे वहीं अब शायद ही किसी गरीब का बच्चा मिड-डे-मील खा कर व्यावसायिक शिक्षा की ओर जा पाता है । व्यावसायिक शिक्षा की कमान निजी पाठशालाओं के हाथों में आ चुकी हैं जहां सक्षम लोगों के बच्चे पढ़-लिख कर अपना भविष्य बना रहे हैं । सचमुच यह मिड-डे-मील योजना बहुत ही चालाकी भरी योजना है जिसकी वजह से गरीब का बच्चा वहीं का वहीं रह जाए, उसकी औकात कटोरा लेकर आने और मिड-डे-मील खाने, कुछ रुपए की छात्रवृत्ति पाने तक बनी रहे और अमीरों के बच्चों के लिए व्यावसायिक शिक्षा के सारे अवसर उपलब्ध रहें । दोहरी शिक्षा नीति, जो दोहरी भाषा के साथ लाई गई थी, समाज के बहुसंख्यक गरीबों को ऊपर बढ़ने के रास्ते से वंचित कर, अमीरों को सुलभ रास्ते उपलब्ध कराने की सोची-समझी रणनीति थी । मिड-डे-मील योजना के धूर्त नीति-नियन्ता कहते हैं कि प्राथमिक पाठशालाओं के श्यापट्ट पर प्रत्येक दिन के खाने का मीनू लिखना अनिवार्य होगा। भई वाह! है न खूबसूरत नीति ? इससे गरीबों के बच्चे, पढ़ाई न होने के बावजूद श्यापमट्ट पर मीनू पढ़कर मुंह में पानी भर लेंगे और शान्तिपूवर्क रसोइए की ओर टकटकी लगाए वक्त गुजार देंगे । ऐसी हास्यास्पद नीतियां बनाने वालों को पहले यह सोचना चाहिए कि श्यामपट्ट खाने का मीनू लिखने के लिए नहीं होता, बेहतर शिक्षा देने के लिए होता है ।
प्राथमिक पाठशालाओं को बचाने का एक मात्र विकल्प यह होगा कि मिड-डे-मील जैसी दिखावटी और फिजूलखर्ची वाली योजनाओं को तुरत बन्द करते हुए सभी पाठशालाओं में कम से कम पांच से छ: योग्य स्थाई अध्यापकों की नियुक्ति कर उनके शिक्षण, प्रशिक्षण की प्रक्रिया पर निरन्तर नज़र रखने वाले जवाब देह तन्त्र को स्थापित किया जाए । अध्यापकों की जवाबदेही बेहतर परिणाम देने की होनी चाहिए न कि जनगणना, पल्सपोलियो, मतदान आदि में उलझाए रखने के लिए । गरीब बच्चों की मदद करने के लिए दूसरे तमाम तरीकें हैं । जैसे कि छात्रवृत्ति और अनाज, 80 प्रतिशत उपस्थिति दर्ज कराने वाले बच्चों के अभिभावकों को मुहैया कराई जा सकती है । कम से कम पाठशालाओं को रसोईघर में तब्दील होने से बचाये बगैर प्राथमिक शिक्षा का भला नहीं होने वाला है ।
सुभाष चन्द्र कुशवाहा
बी 4/140 विशालखण्ड
गोमतीनगर,लखनऊ 226010
रविवार, 31 जनवरी 2010
बरसाती पानी को बचाने की जरूरत
सुभाष चन्द्र कुशवाहा
मानसून की बेरूखी से गांव और शहर दोनों खौफजदा हैं । जहां एक ओर गर्मी,उमस से जीना बेहाल हो गया है वहीं दूसरी ओर पीने के पानी की विकराल होती समस्या के कारण देश में मारा-मारी ,धरना-प्रदर्शन,तोड़-फोड़ का दौर जारी हैं । नदियां ,नाले,झीलें सूख रही हैं । ग्लैशियर पिघल रहे हैं । हमने आज के विकास की कीमत पर कल के विनाश की इबारत अपने हाथों लिख दी है । हम चेतते नहीं, अपनी गलतियों को सुधारने के बजाए,गाल बजा रहे हैं । वातानुकूलित कमरे में , बाहर की गर्मी और पानी के लिए मचा हाहाकार सुनाई नहीं दे रहा । कहा जा रहा है कि हमारी नादानियों की वजह से इक्वीसवीं सदी के अन्त तक गंगा को पानी देने वाला ग्लैशियर हमेशा के लिए पिघल जायेगा । हिमालय से निकलने वाली नदियां सूख जायेंगी । नदियों के सूखते ही धरती पर रक्तरंजित मार-काट मचेगी और फिर मानव सभ्यता का दुखद अन्त हो जायेगा । यह कोई भविष्यवाणी नहीं है । कल का यथार्थ है ।
संयुक्त राष्ट्र संघ की रिपोर्ट के अनुसार सन् 2050 तक चार अरब लोग पानी की कमी से प्रभावित होंगे । आज भी एक अरब लोगों को शुद्ध पानी नसीब नहीं है । मुम्बई महानगर को पानी देने वाली चार महत्वपूर्ण झीलें सूख रही हैं । दूसरी ओर पहली ही बारिश में मुम्बई की सड़कों पर जलभराव दिख रहा हैं, कालोनियां पानी से लबालब भर गई हैं । यह हर साल का नजारा है । अब भला कोई पूछे कि जब मुम्बई की चारों झीलें सूख रही हैं तो बरसाती पानी से हम उन्हें भरने की कार्ययोजना क्यों नहीं बनाते ?
हमारे नीति नियन्ताओं की कार्ययोजना में गम्भीरता का मतलब महज यही है कि बारिश न होने पर वे जगह-जगह हवन,पूजा,यज्ञ के आयोजनों को कराकर, टी0वी0 पर दिखा देते हैं और समस्या को भगवान की ओर खिसका कर चैन से सांस लेते हैं । महिलाओं द्वारा नंगी होकर हल चलाने,बच्चों के कीचड़ में लोटने या मेढ़क-मेढ़की की शादी कराकर इन्द्र देवता को रिझाने जैसे टोटकों को प्रसारित कराते हैं और अपने द्वारा पैदा की गई समस्याओं को कभी ग्लोवल वार्मिंग का कारण बताकर तो कभी भगवान की मर्जी बताकर अपनी नालायकी को ढंक लेते हैं । आखिर ग्लोवल वार्मिंग के लिए जिम्मेदार कौन हैं ? नदियों से नहरों का संजाल फैलाते समय जो गुलाबी तस्वीर पेश की गई थी वह महज दो-तीन दशकों में मटमैली हो गई है । अधिकांश नहरों के अन्तिम सिरे(टेल) तक पानी नहीं पहुंचता । नहरें सिल्ट से भर गई हैं । नदियों का पानी खेतों तक पहुंचने के बजाय, वाष्प बनकर उड़ रहा है और नदियों को सुखता जा रहा है । जितने क्षेत्रफल में देश की नहरें फैली हैं, उतने क्षेत्रफल में झीलों का निर्माण कर तथा बरसाती पानी संरक्षित कर हम सिंचाई के लिए पानी बटोर लेते और साथ ही साथ खेतों की उर्वरकता को सिल्ट से प्रभावित न होने देते ।
आजादी के बाद देश में जलसंरक्षण के जितने भी साधन थे, धीरे-धीरे हमने सबको भूमाफियाओं के हवाले कर दिया जहां उन्होंने अपने लाभ के लिए कंकरीट के जंगल उगाए । विकास के आधुनिक तौर-तरीकों के नाम पर हमने खेती, सिंचाई की पूरी संरचना बदल दी । जहां पहले जमीनी पानी का इस्तेमाल न कर,परंपरागत जलस्त्रोतों से सिंचाई होती थी वहीं परंपरागत जलस्त्रोतों यथा-तालाब,कुएं और झीलों की हमने उपेक्षा कर जगह-जगह ट्यूबवेल लगा कर जमीन खोखला कर दिया । ट्यूबवेलों के चलन ने न केवल कुओं और तालाबों को पाटा अपितु जमीन के अन्दर के पानी को निचोड़ कर पूरे ऋतु चक्र को प्रभावित किया । कुओं और तालाबों के माध्यम से बरसाती, पानी जमीनी पानी के तल को बनाए रखता था। गांवों में जगह-जगह खुदे कुएं `रेन वाटर हार्वेस्टिंग का काम करते थे । आज गांवों में कुएं दिखाई नहीं देते । यही हाल तालाबों का है । जमीनों को पट्टों पर देने की राजनीति ने तमाम भूमाफियाओं को तालाबों की जमीन पर कब्जा दिला दिया । मिट्टी के बरतनों ,घरों का निर्माण रूकने से बचे-खुचे तालाब भरते गए । उनके पाट सिमटते गए । आज इक्का-दुक्का ही ऐसे तालाब बचे हैं जो पूरे साल बरसाती पानी को बचाये रखने की क्षमता रखते हैं । सामन्त, राजे-महाराजे,अपने शौक के लिए ही सही, मगर तालाबों और झीलों के संरक्षण पर विशेष ध्यान देते थे । हमारी लोकतन्त्रात्मक दृष्टि उनसे भी गई गुजरी है । या यों कहें, हमारे पास ऐसी कोई दृष्टि है ही नहीं । हम महज इन्द्र देवता को हवन, पूजा से रिझाने का ढोंग कर अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर लेना चाहते हैं । जब ऐसे ढोंग सफल नहीं होते तब अपने कृत्यों पर शर्मिन्दा होने के बजाए दूसरे ढ़ोंग का प्रदर्शन करने लगते हैं ।
अपनी अर्कमण्यता छोड़ हमें बरसाती पानी को बचाने के बारे में गम्भीरता से सोचने की जरूरत है । बरसाती पानी बचा कर जमीनी पानी बढाने के लाभदायक परिणाम के सम्बंध में केरल का एक उदाहरण हमारे सामने है । सन् 2005 में केरल पब्लिक स्कूल ने अपने 250 वर्ग मीटर छत से 2,40,000 लीटर बरसाती पानी को संरक्षित कर अपने जमीनी पानी को इतना बढ़ा लिया कि अब गर्मियों में भी वहां कुएं और ट्यूबवेल नहीं सूखते ।
जमीनी पानी के स्तर को नीचे खिसकने से बचाने के लिए रेन वाटर हार्वेस्टिंग ही एक मात्र विकल्प है । विश्व बैंक की रिपोर्ट के अनुसार यदि हमने बरसाती पानी को संरक्षित कर जमीनी पानी के स्तर को बचाने की कोशिश नहीं की तो पानी की वर्तमान उपलब्धता 500 घन किलोमीटर से घट कर स्न 2050 तक मात्र 80 घन किलोमीटर रह जायेगी । विश्व बैंक की रिपोर्ट के अनुसार आज जहां भारत का 15 प्रतिशत भू-भाग पानी के गम्भीर संकट से घिरा हुआ है वहीं सन् 2030 तक 60 प्रतिशत भू-भाग इसकी चपेट में आ जायेगा । सबसे पहले वही क्षेत्र संकटग्रस्त होंगे जहां जमीनी पानी का ज्यादा दोहन हो रहा है जैसे राजस्थान,पंजाब,हरियाण, तमिलनाडु और कर्नाटक ।
रेन वाटर हार्वेस्टिंग के बारे में कहा-सुना बहुत जा रहा है,पर किया कुछ नहीं जा रहा । शहरों में सड़कों के किनारे, बरसाती पानी को जमीन में संरक्षित करने के लिए अभी तक कोई योजना अमल में नहीं लाई जा रही है । छतों के बरसाती पानी को जमीन में पहुंचाने की बाध्यकारी योजनाएं कार्यरूप में नहीं हैं । कागजी कार्यवाहियां, पानी के संकट से हमें उबार नहीं पायेंगी । दिनों-दिन पक्की होती जा रही जमीनों से पानी जमीन के अन्दर जाता नहीं और यूं ही वाष्प बनकर उड़ जाता है ।
हमें बरसाती पानी के हर बून्द के संरक्षण के बारे में गंमीरता से सोचना चाहिए । हालात चिन्ताजनक हैं और टोटकों से हल नहीं होने वाले हैं । वोट बैंक को लहलहाने के लिए आबादी को नियन्त्रित करने की कोई योजना बनती दिखाई नहीं देती । ऐसे में ज्यादा आबादी के लिए पानी की जरूरतें बढ़ती जायेंगी । दिनोन्दिन कम होते पानी की पूर्ति के लिए जरूरत है तालाबों और झीलों को गहरा और विस्तार दिया जाए । शहरी बस्तियों में पार्को और सार्वजनिक स्थलों पर गहरे तालाबों का निर्माण कर बरसाती पानी को जमा किया जाए । घरों के प्रयुक्त पानी को नालियों में बहाने के बजाए पुन: जमीन में डाल कर संरक्षित किया जाए । बरसाती पानी को संरक्षित कर हम कुओं, तालाबों, झीलों के माध्यम से जमीनी पानी के स्तर को बढ़ा सकते हैं ।
सुभाष चन्द्र कुशवाहा
बी 4/140 विशालखण्ड
गोमतीनगर,लखनऊ 226010
सुभाष चन्द्र कुशवाहा
मानसून की बेरूखी से गांव और शहर दोनों खौफजदा हैं । जहां एक ओर गर्मी,उमस से जीना बेहाल हो गया है वहीं दूसरी ओर पीने के पानी की विकराल होती समस्या के कारण देश में मारा-मारी ,धरना-प्रदर्शन,तोड़-फोड़ का दौर जारी हैं । नदियां ,नाले,झीलें सूख रही हैं । ग्लैशियर पिघल रहे हैं । हमने आज के विकास की कीमत पर कल के विनाश की इबारत अपने हाथों लिख दी है । हम चेतते नहीं, अपनी गलतियों को सुधारने के बजाए,गाल बजा रहे हैं । वातानुकूलित कमरे में , बाहर की गर्मी और पानी के लिए मचा हाहाकार सुनाई नहीं दे रहा । कहा जा रहा है कि हमारी नादानियों की वजह से इक्वीसवीं सदी के अन्त तक गंगा को पानी देने वाला ग्लैशियर हमेशा के लिए पिघल जायेगा । हिमालय से निकलने वाली नदियां सूख जायेंगी । नदियों के सूखते ही धरती पर रक्तरंजित मार-काट मचेगी और फिर मानव सभ्यता का दुखद अन्त हो जायेगा । यह कोई भविष्यवाणी नहीं है । कल का यथार्थ है ।
संयुक्त राष्ट्र संघ की रिपोर्ट के अनुसार सन् 2050 तक चार अरब लोग पानी की कमी से प्रभावित होंगे । आज भी एक अरब लोगों को शुद्ध पानी नसीब नहीं है । मुम्बई महानगर को पानी देने वाली चार महत्वपूर्ण झीलें सूख रही हैं । दूसरी ओर पहली ही बारिश में मुम्बई की सड़कों पर जलभराव दिख रहा हैं, कालोनियां पानी से लबालब भर गई हैं । यह हर साल का नजारा है । अब भला कोई पूछे कि जब मुम्बई की चारों झीलें सूख रही हैं तो बरसाती पानी से हम उन्हें भरने की कार्ययोजना क्यों नहीं बनाते ?
हमारे नीति नियन्ताओं की कार्ययोजना में गम्भीरता का मतलब महज यही है कि बारिश न होने पर वे जगह-जगह हवन,पूजा,यज्ञ के आयोजनों को कराकर, टी0वी0 पर दिखा देते हैं और समस्या को भगवान की ओर खिसका कर चैन से सांस लेते हैं । महिलाओं द्वारा नंगी होकर हल चलाने,बच्चों के कीचड़ में लोटने या मेढ़क-मेढ़की की शादी कराकर इन्द्र देवता को रिझाने जैसे टोटकों को प्रसारित कराते हैं और अपने द्वारा पैदा की गई समस्याओं को कभी ग्लोवल वार्मिंग का कारण बताकर तो कभी भगवान की मर्जी बताकर अपनी नालायकी को ढंक लेते हैं । आखिर ग्लोवल वार्मिंग के लिए जिम्मेदार कौन हैं ? नदियों से नहरों का संजाल फैलाते समय जो गुलाबी तस्वीर पेश की गई थी वह महज दो-तीन दशकों में मटमैली हो गई है । अधिकांश नहरों के अन्तिम सिरे(टेल) तक पानी नहीं पहुंचता । नहरें सिल्ट से भर गई हैं । नदियों का पानी खेतों तक पहुंचने के बजाय, वाष्प बनकर उड़ रहा है और नदियों को सुखता जा रहा है । जितने क्षेत्रफल में देश की नहरें फैली हैं, उतने क्षेत्रफल में झीलों का निर्माण कर तथा बरसाती पानी संरक्षित कर हम सिंचाई के लिए पानी बटोर लेते और साथ ही साथ खेतों की उर्वरकता को सिल्ट से प्रभावित न होने देते ।
आजादी के बाद देश में जलसंरक्षण के जितने भी साधन थे, धीरे-धीरे हमने सबको भूमाफियाओं के हवाले कर दिया जहां उन्होंने अपने लाभ के लिए कंकरीट के जंगल उगाए । विकास के आधुनिक तौर-तरीकों के नाम पर हमने खेती, सिंचाई की पूरी संरचना बदल दी । जहां पहले जमीनी पानी का इस्तेमाल न कर,परंपरागत जलस्त्रोतों से सिंचाई होती थी वहीं परंपरागत जलस्त्रोतों यथा-तालाब,कुएं और झीलों की हमने उपेक्षा कर जगह-जगह ट्यूबवेल लगा कर जमीन खोखला कर दिया । ट्यूबवेलों के चलन ने न केवल कुओं और तालाबों को पाटा अपितु जमीन के अन्दर के पानी को निचोड़ कर पूरे ऋतु चक्र को प्रभावित किया । कुओं और तालाबों के माध्यम से बरसाती, पानी जमीनी पानी के तल को बनाए रखता था। गांवों में जगह-जगह खुदे कुएं `रेन वाटर हार्वेस्टिंग का काम करते थे । आज गांवों में कुएं दिखाई नहीं देते । यही हाल तालाबों का है । जमीनों को पट्टों पर देने की राजनीति ने तमाम भूमाफियाओं को तालाबों की जमीन पर कब्जा दिला दिया । मिट्टी के बरतनों ,घरों का निर्माण रूकने से बचे-खुचे तालाब भरते गए । उनके पाट सिमटते गए । आज इक्का-दुक्का ही ऐसे तालाब बचे हैं जो पूरे साल बरसाती पानी को बचाये रखने की क्षमता रखते हैं । सामन्त, राजे-महाराजे,अपने शौक के लिए ही सही, मगर तालाबों और झीलों के संरक्षण पर विशेष ध्यान देते थे । हमारी लोकतन्त्रात्मक दृष्टि उनसे भी गई गुजरी है । या यों कहें, हमारे पास ऐसी कोई दृष्टि है ही नहीं । हम महज इन्द्र देवता को हवन, पूजा से रिझाने का ढोंग कर अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर लेना चाहते हैं । जब ऐसे ढोंग सफल नहीं होते तब अपने कृत्यों पर शर्मिन्दा होने के बजाए दूसरे ढ़ोंग का प्रदर्शन करने लगते हैं ।
अपनी अर्कमण्यता छोड़ हमें बरसाती पानी को बचाने के बारे में गम्भीरता से सोचने की जरूरत है । बरसाती पानी बचा कर जमीनी पानी बढाने के लाभदायक परिणाम के सम्बंध में केरल का एक उदाहरण हमारे सामने है । सन् 2005 में केरल पब्लिक स्कूल ने अपने 250 वर्ग मीटर छत से 2,40,000 लीटर बरसाती पानी को संरक्षित कर अपने जमीनी पानी को इतना बढ़ा लिया कि अब गर्मियों में भी वहां कुएं और ट्यूबवेल नहीं सूखते ।
जमीनी पानी के स्तर को नीचे खिसकने से बचाने के लिए रेन वाटर हार्वेस्टिंग ही एक मात्र विकल्प है । विश्व बैंक की रिपोर्ट के अनुसार यदि हमने बरसाती पानी को संरक्षित कर जमीनी पानी के स्तर को बचाने की कोशिश नहीं की तो पानी की वर्तमान उपलब्धता 500 घन किलोमीटर से घट कर स्न 2050 तक मात्र 80 घन किलोमीटर रह जायेगी । विश्व बैंक की रिपोर्ट के अनुसार आज जहां भारत का 15 प्रतिशत भू-भाग पानी के गम्भीर संकट से घिरा हुआ है वहीं सन् 2030 तक 60 प्रतिशत भू-भाग इसकी चपेट में आ जायेगा । सबसे पहले वही क्षेत्र संकटग्रस्त होंगे जहां जमीनी पानी का ज्यादा दोहन हो रहा है जैसे राजस्थान,पंजाब,हरियाण, तमिलनाडु और कर्नाटक ।
रेन वाटर हार्वेस्टिंग के बारे में कहा-सुना बहुत जा रहा है,पर किया कुछ नहीं जा रहा । शहरों में सड़कों के किनारे, बरसाती पानी को जमीन में संरक्षित करने के लिए अभी तक कोई योजना अमल में नहीं लाई जा रही है । छतों के बरसाती पानी को जमीन में पहुंचाने की बाध्यकारी योजनाएं कार्यरूप में नहीं हैं । कागजी कार्यवाहियां, पानी के संकट से हमें उबार नहीं पायेंगी । दिनों-दिन पक्की होती जा रही जमीनों से पानी जमीन के अन्दर जाता नहीं और यूं ही वाष्प बनकर उड़ जाता है ।
हमें बरसाती पानी के हर बून्द के संरक्षण के बारे में गंमीरता से सोचना चाहिए । हालात चिन्ताजनक हैं और टोटकों से हल नहीं होने वाले हैं । वोट बैंक को लहलहाने के लिए आबादी को नियन्त्रित करने की कोई योजना बनती दिखाई नहीं देती । ऐसे में ज्यादा आबादी के लिए पानी की जरूरतें बढ़ती जायेंगी । दिनोन्दिन कम होते पानी की पूर्ति के लिए जरूरत है तालाबों और झीलों को गहरा और विस्तार दिया जाए । शहरी बस्तियों में पार्को और सार्वजनिक स्थलों पर गहरे तालाबों का निर्माण कर बरसाती पानी को जमा किया जाए । घरों के प्रयुक्त पानी को नालियों में बहाने के बजाए पुन: जमीन में डाल कर संरक्षित किया जाए । बरसाती पानी को संरक्षित कर हम कुओं, तालाबों, झीलों के माध्यम से जमीनी पानी के स्तर को बढ़ा सकते हैं ।
सुभाष चन्द्र कुशवाहा
बी 4/140 विशालखण्ड
गोमतीनगर,लखनऊ 226010
शुक्रवार, 29 जनवरी 2010
शिक्षा से गांव की बेदखली
शिक्षा से गांव की बेदखली
-सुभाष चन्द्र कुशवाहा
नब्बे के दशक से ही गंवई छात्र/छात्राओं के लिए शिक्षा और रोजगार के रास्ते बन्द करने का कुचक्र शुरू हो गया था । तब जो नई शिक्षा नीति लाई गई थी, उसमें मुख्य चिन्ता गांव के युवाओं के विश्वविद्यालयों में पहुंचने के बारे में थी । व्यवस्था को लग रहा था कि गांव के युवा विश्वविद्यालयों में आकर समाजशास्त्र,राजनीतिशास्त्र और अर्थशास्त्र का अध्ययन कर चतुर हो जाते हैं और व्यवस्था के मुखौटे को पहचान लेते हैं । अब नई शिक्षा नीति की जो तस्वीर बनाई गई है, उससे गांव के युवकों को पूरी तरह से बेदखल करने की तैयारी की जा रही है । उस पर तुर्रा यह कि 6 से 14 वर्ष तक के बच्चों को अनिवार्य शिक्षा दी जायेगी । खिचड़ी खिला कर उनका `कल्याण´ किया जायेगा ।
नई शिक्षा नीति को चासनी के साथ, प्रचार,प्रसार कर परोसा जा रहा है । गोया शासन,प्रशासन द्वारा कोई चमत्कारिक कार्य किया जा रहा हो । याथार्थ हमारे सामने है कि गंवई आबादी को विगत तीन दशकों से छला जा रहा है । एहसान दिखा कर उसे ठगा जा रहा है । सर्वोच्च न्यायालय के जज माननीय उन्नीकृष्णन ने 1993 में ही फैसला दे दिया था कि संविधान के अनुच्छेद 45 के अतंर्गत 14 वर्ष तक के बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार है । ऐसे में 14 वर्ष तक के बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा देने के नाम पर 86 वां संविधान संशोधन की क्या जरूरत थी ? दरअसल 86वें संशोधन के अनुच्छेद 21 (क) के अनुसार 6-14 वर्ष की आयु के बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा ``उस रीति से दी जायेगी जो राज्य कानूनन निर्धारित करेगा ।´´ यानी कि अनिवार्य और मुफ्त शिक्षा का मौलिक अधिकार क्या हो, यह तय करने का अधिकार संविधान प्रदत्त न होकर वैसा होगा जैसा सरकार चाहेगी । जाहिर है किसी भी अन्य मौलिक अधिकार के बारे में सरकार को ऐसी शक्तियां हासिल नही हैं । संविधान में लिखित 14 वर्ष तक के बच्चों की जगह `6 से 14 वर्ष तक´ के बच्चों का उल्लेख किया जाना भी अपने आप में विचारणीय है ।
आजादी के साठ वर्षों में प्राथमिक पाठशालाओं को तबाह कर निजी स्कूलों की बाढ़ लाई गई जहां गांव वालों को शिक्षा से बेदख कर दिया गया । तभी तो गरीबों के बच्चे जिन प्राथमिक स्कूलों में खिचड़ी खाने के लालच में पढ़ने जाते हैं वहां कैसी पढ़ाई होती है, एक बानगी देखें । देश के 6,51,064 प्राथमिक स्कूलों में से 15.67 फीसदी प्राथमिक स्कूलों में एक या एक भी शिक्षक नहीं हैं । ये शिक्षक पढ़ाने के बजाए , खाना पकाने की तैयारी में लगे रहते हैं । अपने लाभ के लिए फर्जी हाजिरी बढ़ाते हैं । 1996 में कराये गए छठे सम्पूर्ण भारतीय सर्वेक्षण में बीस फीसदी स्कूलों में सिर्फ दो अध्यापक पाए गए । सातवें सर्वेक्षण में पाया गया कि प्राथमिक स्कूलों के कुल 25,33,205 पूर्ण कालिक शिक्षकों में से लगभग 21 प्रतिशत अप्रशिक्षित हैं । यह विचार करने का विषय है कि जब स्कूलों में अध्यापक ही नहीं होंगे तब क्या खिचड़ी खिलाने से बच्चे पढ़ पायेंगे ? वहीं अब जो नया सुधार किया जाने वाला है, उससे विदेशी विश्वविद्यालयों के लिए देश के दरवाजे खोल कर बची-खुची कसर भी निकाल दी जायेगी । कई दशकों तक प्रौढ़ शिक्षा के नाम पर कितने प्रौढ़ों को साक्षर बनाया गया, यह तथ्य किसी से छिपा नही है । हां इसके नाम पर अरबों रुपए लुटा दिए गए फिर भी अपनढ़, पढ़ न सके। अब सर्वशिक्षा के नाम पर `मिड-डे-मील´ खिलाकर गंवई बच्चों का जैसा भविष्य बनाया जा रहा है, वह भी सबके सामने है । जिन प्राथमिक पाठशालाओं से पढ़कर बच्चे अफसर बनते थे, अब वे पाठशालाएं देखते-देखते तबाह हो गईं । पहले अध्यापकों की नियुक्ति रोकी गई, बाद में एक प्राथमिक पाठशाला में पांच अध्यापकों की जगह एक अध्यापक और एक शिक्षा मित्र को बैठा दिया गया । पढ़ाई का स्तर मात्र इतना रखा गया कि पांचवीं पास बच्चा अच्छर ज्ञान प्राप्त कर ले । उसे शिक्षित घोषित कर दिया जाए । जिससे वह शेष जिन्दगी अनुदानों,राहत,नरेगा वृद्धा पेंशन,विधवा पेंशन आदि के सहारे गुजार दे और एक आदर्श मतदाता बना रहे ।
ऐसा विश्वबैंक के निर्देशों के तहत किया गया है । अब सरकारी शिक्षा व्यवस्था को तबाह कर, निजी शिक्षण व्यवस्था को बढ़ावा देकर, साक्षरता अभियानों,अनौपचारिक शिक्षा और शिक्षा ऋण जैसे चोंचलों से लोगों को भरमाए रखने का कुचक्र किया जा रहा है । अपनी भाषा में शिक्षा ग्रहण की अनिवार्यता को समाप्त कर अंग्रेजी माध्यम से शिक्षा ग्रहण करने की नीति,गंवई समाज को शासन-प्रशन से बेदखल करने की दूसरी नीति है । ऐसे में गांव के नौनिहाल, अफसर क्या चपरासी भी बनने से रहे ।
सर्वशिक्षा की `मिड-डे-मील´ योजना ने गंवई बच्चों का कोई भला नहीं किया है । इसने मात्र गरीबों के आक्रोश को दबाने का काम किया है । गंवई आबादी के साथ यह कैसा मजाक है कि शहरी मांए `पैंरट्स-डे´ पर स्कूलों में अपने बच्चों की `प्रोग्रेस रिपोर्ट´ देखने जाती हैं जबकि गंवई मांओं से कहा जाता है कि-`बारी-बारी मांए आएं,जांचे-परखें तभी खिलाएं ।´ यही है दोहरी शिक्षा व्यवस्था का मूल चरित्र । नई शिक्षा नीति में दोहरी शिक्षा व्यवस्था का नंगापन सामने होते हुए भी अब विदेशी विश्वविद्यालयों को स्थापित करने की बात कही जा रही है । गांव के प्राथमिक पाठशालाओं की शिक्षा का जो स्तर रह गया है, उससे बच्चे माध्यमिक कक्षाओं में पास होने से रहे । लिहाजा नई शिक्षा नीति में बोर्ड परीक्षाओं की अनिवार्यता समाप्त की जा रही है । यानी की डरिए नहीं, फेल होने जैसी समस्या से भी निजात दी जा रही है ।
नई शिक्षा नीति में व्यावसायिक शिक्षा की बात जोर-शोर से उठाई गई है । व्यावसायिक शिक्षा के लिए बैंक ऋण में गरीबों को अनुदान देने जैसी बात भी कही जा रही है । जिस देश के 26 करोड़ लोग ऐसे हों, जिन्हें खाने के लिए दाल ,सब्जी या चटनी में से कोई एक चीज बामुश्किल मिल पाती हो । ग्रामीण क्षेत्रों में 30 प्रतिशत लोगों कि दैनिक उपभोक्ता व्यय 12 रुपए से कम हो, जबकि शहरी क्षेत्र के 30 प्रतिशत लोग, रोजाना खाने-पीने पर 19 रुपए से ज्यादा खर्च नहीं कर पाते हों, 10 प्रतिशत ग्रामीण आबादी ऐसी हो , जिनके पास दैनिक व्यय के लिए 9 रुपए से ज्यादा उपलब्ध न हो , तब ऐसी स्थिति में उन गरीबों के बच्चे लाखों की सलाना फीस वाले किसी व्यावसायिक संस्थान में शिक्षा ऋण पर अनुदान पाकर भी कैसे पढ़ेंगे ? योग्यता की बात करने वाले क्यों नहीं बताते कि गरीब, मेधावी लड़के आई0आई0टी0 या आई0एम0ए0 में चयनित होने पर लाखों की फीस कैसे चुकाएंगे ? क्या इन संस्थानों में चयनित गरीबों को निशुल्क पढ़ाने की व्यवस्था है ? दूसरी ओर यदि आपकी जेब में दौलत है तो आप अपने आवारा और अयोग्य बच्चों को बिना प्रतियोगी परीक्षा पास कराए, `पेड´ सीट पर दाखिला करा सकते हैं ।
दरअसल प्रतियोगी परीक्षाओं का सारा ढ़ांचा पैसे वालों के लिए तैयार किया जा रहा है । देश में खुल रहे महंगें कोचिंग संस्थान और महंगी पुस्तकें गरीबों को दौड़ से बाहर कर रही हैं । मौजूदा हालात में गंवई बच्चों का भविष्य अंधकारमय नज़र आ रहा है । बिना किसी किन्तु-परन्तु के 14 वर्ष तक के बच्चों को उनकी भाषा में मुफ्त और गुणात्मक शिक्षा उपलब्ध कराये और उसके बाद गुणात्मक उच्च शिक्षा के समान अवसर उपलब्ध कराये बिना गंवई बच्चों का भविष्य नहीं संवारा जा सकता । प्रचार के लिए स्कूल बनवा देने से गंवई बच्चों का भला नहीं होने वाला है ।
सुभाष चन्द्र कुशवाहा
बी 4/140 विशालखण्ड
गोमतीनगर
लखनऊ 226010
-सुभाष चन्द्र कुशवाहा
नब्बे के दशक से ही गंवई छात्र/छात्राओं के लिए शिक्षा और रोजगार के रास्ते बन्द करने का कुचक्र शुरू हो गया था । तब जो नई शिक्षा नीति लाई गई थी, उसमें मुख्य चिन्ता गांव के युवाओं के विश्वविद्यालयों में पहुंचने के बारे में थी । व्यवस्था को लग रहा था कि गांव के युवा विश्वविद्यालयों में आकर समाजशास्त्र,राजनीतिशास्त्र और अर्थशास्त्र का अध्ययन कर चतुर हो जाते हैं और व्यवस्था के मुखौटे को पहचान लेते हैं । अब नई शिक्षा नीति की जो तस्वीर बनाई गई है, उससे गांव के युवकों को पूरी तरह से बेदखल करने की तैयारी की जा रही है । उस पर तुर्रा यह कि 6 से 14 वर्ष तक के बच्चों को अनिवार्य शिक्षा दी जायेगी । खिचड़ी खिला कर उनका `कल्याण´ किया जायेगा ।
नई शिक्षा नीति को चासनी के साथ, प्रचार,प्रसार कर परोसा जा रहा है । गोया शासन,प्रशासन द्वारा कोई चमत्कारिक कार्य किया जा रहा हो । याथार्थ हमारे सामने है कि गंवई आबादी को विगत तीन दशकों से छला जा रहा है । एहसान दिखा कर उसे ठगा जा रहा है । सर्वोच्च न्यायालय के जज माननीय उन्नीकृष्णन ने 1993 में ही फैसला दे दिया था कि संविधान के अनुच्छेद 45 के अतंर्गत 14 वर्ष तक के बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार है । ऐसे में 14 वर्ष तक के बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा देने के नाम पर 86 वां संविधान संशोधन की क्या जरूरत थी ? दरअसल 86वें संशोधन के अनुच्छेद 21 (क) के अनुसार 6-14 वर्ष की आयु के बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा ``उस रीति से दी जायेगी जो राज्य कानूनन निर्धारित करेगा ।´´ यानी कि अनिवार्य और मुफ्त शिक्षा का मौलिक अधिकार क्या हो, यह तय करने का अधिकार संविधान प्रदत्त न होकर वैसा होगा जैसा सरकार चाहेगी । जाहिर है किसी भी अन्य मौलिक अधिकार के बारे में सरकार को ऐसी शक्तियां हासिल नही हैं । संविधान में लिखित 14 वर्ष तक के बच्चों की जगह `6 से 14 वर्ष तक´ के बच्चों का उल्लेख किया जाना भी अपने आप में विचारणीय है ।
आजादी के साठ वर्षों में प्राथमिक पाठशालाओं को तबाह कर निजी स्कूलों की बाढ़ लाई गई जहां गांव वालों को शिक्षा से बेदख कर दिया गया । तभी तो गरीबों के बच्चे जिन प्राथमिक स्कूलों में खिचड़ी खाने के लालच में पढ़ने जाते हैं वहां कैसी पढ़ाई होती है, एक बानगी देखें । देश के 6,51,064 प्राथमिक स्कूलों में से 15.67 फीसदी प्राथमिक स्कूलों में एक या एक भी शिक्षक नहीं हैं । ये शिक्षक पढ़ाने के बजाए , खाना पकाने की तैयारी में लगे रहते हैं । अपने लाभ के लिए फर्जी हाजिरी बढ़ाते हैं । 1996 में कराये गए छठे सम्पूर्ण भारतीय सर्वेक्षण में बीस फीसदी स्कूलों में सिर्फ दो अध्यापक पाए गए । सातवें सर्वेक्षण में पाया गया कि प्राथमिक स्कूलों के कुल 25,33,205 पूर्ण कालिक शिक्षकों में से लगभग 21 प्रतिशत अप्रशिक्षित हैं । यह विचार करने का विषय है कि जब स्कूलों में अध्यापक ही नहीं होंगे तब क्या खिचड़ी खिलाने से बच्चे पढ़ पायेंगे ? वहीं अब जो नया सुधार किया जाने वाला है, उससे विदेशी विश्वविद्यालयों के लिए देश के दरवाजे खोल कर बची-खुची कसर भी निकाल दी जायेगी । कई दशकों तक प्रौढ़ शिक्षा के नाम पर कितने प्रौढ़ों को साक्षर बनाया गया, यह तथ्य किसी से छिपा नही है । हां इसके नाम पर अरबों रुपए लुटा दिए गए फिर भी अपनढ़, पढ़ न सके। अब सर्वशिक्षा के नाम पर `मिड-डे-मील´ खिलाकर गंवई बच्चों का जैसा भविष्य बनाया जा रहा है, वह भी सबके सामने है । जिन प्राथमिक पाठशालाओं से पढ़कर बच्चे अफसर बनते थे, अब वे पाठशालाएं देखते-देखते तबाह हो गईं । पहले अध्यापकों की नियुक्ति रोकी गई, बाद में एक प्राथमिक पाठशाला में पांच अध्यापकों की जगह एक अध्यापक और एक शिक्षा मित्र को बैठा दिया गया । पढ़ाई का स्तर मात्र इतना रखा गया कि पांचवीं पास बच्चा अच्छर ज्ञान प्राप्त कर ले । उसे शिक्षित घोषित कर दिया जाए । जिससे वह शेष जिन्दगी अनुदानों,राहत,नरेगा वृद्धा पेंशन,विधवा पेंशन आदि के सहारे गुजार दे और एक आदर्श मतदाता बना रहे ।
ऐसा विश्वबैंक के निर्देशों के तहत किया गया है । अब सरकारी शिक्षा व्यवस्था को तबाह कर, निजी शिक्षण व्यवस्था को बढ़ावा देकर, साक्षरता अभियानों,अनौपचारिक शिक्षा और शिक्षा ऋण जैसे चोंचलों से लोगों को भरमाए रखने का कुचक्र किया जा रहा है । अपनी भाषा में शिक्षा ग्रहण की अनिवार्यता को समाप्त कर अंग्रेजी माध्यम से शिक्षा ग्रहण करने की नीति,गंवई समाज को शासन-प्रशन से बेदखल करने की दूसरी नीति है । ऐसे में गांव के नौनिहाल, अफसर क्या चपरासी भी बनने से रहे ।
सर्वशिक्षा की `मिड-डे-मील´ योजना ने गंवई बच्चों का कोई भला नहीं किया है । इसने मात्र गरीबों के आक्रोश को दबाने का काम किया है । गंवई आबादी के साथ यह कैसा मजाक है कि शहरी मांए `पैंरट्स-डे´ पर स्कूलों में अपने बच्चों की `प्रोग्रेस रिपोर्ट´ देखने जाती हैं जबकि गंवई मांओं से कहा जाता है कि-`बारी-बारी मांए आएं,जांचे-परखें तभी खिलाएं ।´ यही है दोहरी शिक्षा व्यवस्था का मूल चरित्र । नई शिक्षा नीति में दोहरी शिक्षा व्यवस्था का नंगापन सामने होते हुए भी अब विदेशी विश्वविद्यालयों को स्थापित करने की बात कही जा रही है । गांव के प्राथमिक पाठशालाओं की शिक्षा का जो स्तर रह गया है, उससे बच्चे माध्यमिक कक्षाओं में पास होने से रहे । लिहाजा नई शिक्षा नीति में बोर्ड परीक्षाओं की अनिवार्यता समाप्त की जा रही है । यानी की डरिए नहीं, फेल होने जैसी समस्या से भी निजात दी जा रही है ।
नई शिक्षा नीति में व्यावसायिक शिक्षा की बात जोर-शोर से उठाई गई है । व्यावसायिक शिक्षा के लिए बैंक ऋण में गरीबों को अनुदान देने जैसी बात भी कही जा रही है । जिस देश के 26 करोड़ लोग ऐसे हों, जिन्हें खाने के लिए दाल ,सब्जी या चटनी में से कोई एक चीज बामुश्किल मिल पाती हो । ग्रामीण क्षेत्रों में 30 प्रतिशत लोगों कि दैनिक उपभोक्ता व्यय 12 रुपए से कम हो, जबकि शहरी क्षेत्र के 30 प्रतिशत लोग, रोजाना खाने-पीने पर 19 रुपए से ज्यादा खर्च नहीं कर पाते हों, 10 प्रतिशत ग्रामीण आबादी ऐसी हो , जिनके पास दैनिक व्यय के लिए 9 रुपए से ज्यादा उपलब्ध न हो , तब ऐसी स्थिति में उन गरीबों के बच्चे लाखों की सलाना फीस वाले किसी व्यावसायिक संस्थान में शिक्षा ऋण पर अनुदान पाकर भी कैसे पढ़ेंगे ? योग्यता की बात करने वाले क्यों नहीं बताते कि गरीब, मेधावी लड़के आई0आई0टी0 या आई0एम0ए0 में चयनित होने पर लाखों की फीस कैसे चुकाएंगे ? क्या इन संस्थानों में चयनित गरीबों को निशुल्क पढ़ाने की व्यवस्था है ? दूसरी ओर यदि आपकी जेब में दौलत है तो आप अपने आवारा और अयोग्य बच्चों को बिना प्रतियोगी परीक्षा पास कराए, `पेड´ सीट पर दाखिला करा सकते हैं ।
दरअसल प्रतियोगी परीक्षाओं का सारा ढ़ांचा पैसे वालों के लिए तैयार किया जा रहा है । देश में खुल रहे महंगें कोचिंग संस्थान और महंगी पुस्तकें गरीबों को दौड़ से बाहर कर रही हैं । मौजूदा हालात में गंवई बच्चों का भविष्य अंधकारमय नज़र आ रहा है । बिना किसी किन्तु-परन्तु के 14 वर्ष तक के बच्चों को उनकी भाषा में मुफ्त और गुणात्मक शिक्षा उपलब्ध कराये और उसके बाद गुणात्मक उच्च शिक्षा के समान अवसर उपलब्ध कराये बिना गंवई बच्चों का भविष्य नहीं संवारा जा सकता । प्रचार के लिए स्कूल बनवा देने से गंवई बच्चों का भला नहीं होने वाला है ।
सुभाष चन्द्र कुशवाहा
बी 4/140 विशालखण्ड
गोमतीनगर
लखनऊ 226010
बुधवार, 27 जनवरी 2010
रविवार, 24 जनवरी 2010
शनिवार, 23 जनवरी 2010
सपने जो खुदकुशी तक ले जाते हैं
सपने जो खुदकुशी तक ले जाते हैं
हाल-फिलहाल बच्चों और युवाओं में आत्महत्या करने की प्रवृत्ति बढ़ी है । मुम्बई जैसे अति आधुनिक महानगरीय संस्कृति से लेकर लखनऊ जैसे आधुनिक और पुरातन संस्कृति के बीच पले-बढ़े बच्चों में भी, सात साल के अबोध और 25 साल के शिक्षित युवाओं में भी । किशोरावस्था की दहलीज पर पहुचने वालों से लेकर, युवावस्था तक के छात्र, अपनी जिन्दगी से निराश होकर और उससे जूझने का हौसला खोकर, स्वयं को खत्म कर लेना मुनासिब समझ रहे हैं । अभिभावक हैरान, परेशान हैं । कहां है खोट ? कौन निगल ले गया सुख-दुख में जिन्दगी से जूझने की क्षमता को ? अपने ही लाड़लों को समझने-बूझने में चूक रहे हैं माता-पिता । मनोचिकित्सकों के सामने नई उपजती ग्रन्थियों को समझने, सुलझाने की चुनौतियां आ खड़ी हुई हैं । समाचार पत्रों में हर रोज आत्महत्या की खबरें आ रही हैं । आखिर इस आत्मघाती समाज के बीज, बाजारवाद के गर्भ में तो नही पल-बढ़ रहे ? आत्महत्या करने के जो कारण दिखाई दे रहे हैं, वह `सुपर मैन´ `अवतार´, हैरीपाटर´ जैसी चमत्कारी या जादुई यथार्थ को आत्मसात करने वाली शहरी पीढी को झुग्गियों में पलने वाली पीढ़ी जैसी आत्मबल भी प्रदान नहीं कर पा रही है ।
कुछ आत्महत्याओं के पीछे शिक्षा और परीक्षा का दबाव है तो कुछ के पीछे मात्र अभिभावकों की सामान्य सी डांट, अपने या सहपाठियों की उपेक्षा या अंग्रेजी भाषा का अभाव । ऐसे कारणों से आत्मघाती निर्णय तक पहुंचने वाली यह पीढ़ी, अपने मां-बाप, भाई-बहन के प्यार और उन पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों की परवाह नहीं कर रही । यानी कि हमने नितान्त आत्मकेन्द्रित, आत्मजीवी पीढ़ी की बुनियाद रख दी है और शायद यही बाजारबाद की मूल आत्मा भी है । हमारे नौनिहालों में, एक भरी-पूरी जिन्दगी को अपने ही हाथों खत्म करने की प्रवृत्ति का यूं बढ़ जाना चिन्ता का विषय होना चाहिए । पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था और उसके सामानान्तर निर्मित हो रही वैश्विक संस्कृति, जिसमें हमारी शिक्षा प्रणाली भी है, कि क्रूरता, निरर्थकता की पड़ताल होनी चाहिए । किशोरों और युवाओं के भविष्य के जो सपने हम तैयार कर रहे हैं, उसमें व्याप्त खोट की पड़ताल होनी चाहिए । करियर का जो अत्यधिक दबाव हम उन पर थोप रहे हैं, उनसे उनका बचपन या किशोरापन छीन रहे हैं, उनकी अव्यावहारिकता की भी समीक्षा होनी चाहिए । इस नई पीढीं के सामने हम जो आदर्श प्रस्तुत कर रहे हैं, वे कितने वाजिब या गैर वाजिब हैं, नई पीढ़ी की आत्महत्या करने की परिणति देख, मूल्यांकन किया जाना चाहिए । युवा पीढ़ी, इस अवसादग्रस्तता के लिए कत्तई जिम्मेदार नहीं है । समाज का नया ढांचा जिसमें विकास का नया ढ़ांचा शामिल है, जिम्मेदार है । ऐसी अवसादग्रस्त दुनिया की बुनियाद हमने स्वयं रखी है ।
बाजार का सबसे अधिक दबाब बच्चों और युवाओं पर है । आज की सम्पूर्ण आर्थिक और सामाजिक व्यवस्था, युवा पीढ़ी या बच्चों को ध्यान में रखकर बनाई जा रही है । आर्थिक लाभ के लिए इन्हें गैर जरूरी प्रवृत्तियों की ओर ढकेला जा रहा है । बच्चे बाजार के सबसे महत्वपूर्ण अंग बना दिए गए हैं । जादुई तिलिस्म और महत्वाकांक्षी दुनिया की तस्वीर के अलावा जिन्दगी के वास्तविक यथार्थ उनके सामने दिखाये, बताये नहीं जा रहे । उनके सामने सब कुछ हासिल करने का ख्वाब दिखाया जाता है, वह भी बिना संघर्ष किए, बिना असफल हुए । असफलता भी सफलता के लिए जरूरी है, आज की पीढ़ी को स्वीकार्य नहीं ।
इस युवा पीढ़ी के सामने हमने नितान्त व्यक्तिक और बाजारू दुनिया खड़ा कर दिया है । हम सुख-सुविधाओं के पीछे भाग रहे हैं । हमारे पास ठहर कर सोचने, कुछ पल सुकून से जिन्दगी जीने का समय नहीं है । विकास हमें दौड़ा रहा है और हम भाग रहे हैं । इस भागा-भागी में मां-बाप, भाई-बहन, रिश्ते-नाते, गांव-देहात, पास-पड़ोस और यहां तक की राष्ट्रीयता का भी कोई मूल्य नहीं रह जाता है । हमें लगता है कि इस गलाकाट प्रतियोगिता में जरा-सी देरी या चूक सतरंगी दुनिया से बेदखल कर सकती है और हमें आर्थिक नुकसान पहुंचा सकती है । इसलिए हम केवल पैसा बनाने की मानसिकता में जी रहे हैं । हमारे पास साहित्य, संगीत, कला और संस्कृति के लिए समय नहीं है । हम अपने बच्चों को सामाजिक परिवेश से जोड़ने के बजाय, नितान्त व्यावसायिक मानसिकता में ले जा रहे हैं और गैर जरूरी दबाव बनाकर उन्हें सिर्फ चमकते बाजार का हिस्सा बनाना चाहते हैं । हम उन्हें बाजार में ऊंचे दाम पर बिकते देखना चाहते हैं । उन्हें समय से पहले हॉस्टल में डालकर अकेलापन दे रहे हैं । परिवार से कट कर स्वयं की अलग दुनिया बसा लेना, परिवार की अन्तरंगता से विमुखता, रिश्तों में ठण्डापन का होना, बाजारीकरण के बुनियादी तत्व बताए जा रहे हैं । बाजारीकरण, संघर्षशीलता का पाठ पढ़ाने के बजाए, पैसे से सबकुछ हासिल करने, धूर्तता, ठगी या छीनाझपटी को कोई अवगुण नहीं बता रहा है । मनोकांक्षाओं का विस्फोट, सब्र की समाप्ति और सामाजिकता का लोप, बहुत हद तक इसके लिए जिम्मेदार है । इस पीढ़ी के ऊपर कृत्रिम बाजार का, नई चहकती दिखती दुनिया के ग्लैमर का, कल्पनालोक का ऐसा आकर्षण पैदा कर दिया गया है, गोया इसके इतर जिन्दगी बेकार है ।
जिन्दगी को भोगने की प्रवृत्ति और दायित्वबोध की समाप्ति, युवाओं को विपरीत स्थितियों से उबारने में अक्षम बना रही है । बाजारवाद ने आज जिस समाज की रचना की है, वहां संवेदना, सम्बंध, समाजिकता का कोई मतलब नहीं रह गया है । हर कोई उपभोक्ता है । हर कोई अपने लिए जी रहा है । हम भूखों का रुदन नहीं देखते, सिर्फ सेंसेक्स का ग्राफ देखते हैं । जबकि इसी दुनिया में करोड़ों लोग भूखे रहते हैं, आधा पेट खाते हैं, उनके पास रहने को घर नहीं है पर वे आत्महत्या नहीं करते । जिन्दगी से जूझने की विकट क्षमता है उनमें । जो बाजार से नहीं जुड़े हैं वे सबसे जुड़े हैं ।
जो लोग संघर्षशील जिन्दगी जीते हैं, उनकी संवेदना मरती नहीं है । वे अपने सामने आईं विपरीत परिस्थितियों से लड़ लेते हैं । दूसरी ओर समाज का जो वर्ग सिर्फ हवा में उड़ना जानता है, वह भी उधार के या नकली डैनों से, वह हल्के तुफानों में भी नीचे टपक पड़ता है । मात्र नब्बे या निन्यानबे प्रतिशत अंक पाना सफलता का पैमाना होता तो न्यूटन, गैलीलियो, आर्किमिडीज, जेम्सवाट जैसे सामान्य विद्यार्थी आज वैज्ञानिकों की सूची में न होते ।
दरअसल यह नई अर्थव्यवस्था, सुविधाओं का अंबार लगा कर मनुष्य विरोधी होती जा रही है । यह मनुष्यता की कीमत पर समाज का निर्माण कर रही है । किताबों का बोझ बढ़ाकर बच्चों को दादा-दादी, मां-बाप, घर-परिवार, खेल-कूद सबसे काट रही है । घर के कोने में रखा बुद्धू बक्सा, कार्टून फिल्मों से बच्चों को संवेदनहीन बना रहा है । अब बच्चों के आंखों में आंसू नहीं दिखते । मां-बाप के बीमार पड़ने पर सिर्फ फोन पर हिदायत, सलाह देकर अपने दायित्व की इतिश्री कर लेते हैं । जब अपनों से संवादहीनता की स्थिति बनती जा रही हो तब इस समाज की नई पीढ़ी असफलता का दर्द किससे बांटेगी ? इन्टरनेट से ?
इसलिए आज की पीढ़ी को टूटने से बचाने के लिए जरूरी है, हम विकास के सारे मॉडलों की पुन: समीक्षा करें । प्रगति, जिन्दगी से बड़ी नहीं होती । तमाम सामाजिक कार्यो द्वारा जिन्दगी को सार्थक और संवेदनशील बनाया जा सकता है । सार्थक और संवेदनशील जिन्दगी के मायने समझ लेने वाली समाज की नई पीढ़ी न तो अवसादग्रस्त होगी और न आत्महत्या करेगी ।
सुभाष चन्द्र कुशवाहा
बी 4/140 विशालखण्ड
गोमतीनगर, लखनऊ ।
हाल-फिलहाल बच्चों और युवाओं में आत्महत्या करने की प्रवृत्ति बढ़ी है । मुम्बई जैसे अति आधुनिक महानगरीय संस्कृति से लेकर लखनऊ जैसे आधुनिक और पुरातन संस्कृति के बीच पले-बढ़े बच्चों में भी, सात साल के अबोध और 25 साल के शिक्षित युवाओं में भी । किशोरावस्था की दहलीज पर पहुचने वालों से लेकर, युवावस्था तक के छात्र, अपनी जिन्दगी से निराश होकर और उससे जूझने का हौसला खोकर, स्वयं को खत्म कर लेना मुनासिब समझ रहे हैं । अभिभावक हैरान, परेशान हैं । कहां है खोट ? कौन निगल ले गया सुख-दुख में जिन्दगी से जूझने की क्षमता को ? अपने ही लाड़लों को समझने-बूझने में चूक रहे हैं माता-पिता । मनोचिकित्सकों के सामने नई उपजती ग्रन्थियों को समझने, सुलझाने की चुनौतियां आ खड़ी हुई हैं । समाचार पत्रों में हर रोज आत्महत्या की खबरें आ रही हैं । आखिर इस आत्मघाती समाज के बीज, बाजारवाद के गर्भ में तो नही पल-बढ़ रहे ? आत्महत्या करने के जो कारण दिखाई दे रहे हैं, वह `सुपर मैन´ `अवतार´, हैरीपाटर´ जैसी चमत्कारी या जादुई यथार्थ को आत्मसात करने वाली शहरी पीढी को झुग्गियों में पलने वाली पीढ़ी जैसी आत्मबल भी प्रदान नहीं कर पा रही है ।
कुछ आत्महत्याओं के पीछे शिक्षा और परीक्षा का दबाव है तो कुछ के पीछे मात्र अभिभावकों की सामान्य सी डांट, अपने या सहपाठियों की उपेक्षा या अंग्रेजी भाषा का अभाव । ऐसे कारणों से आत्मघाती निर्णय तक पहुंचने वाली यह पीढ़ी, अपने मां-बाप, भाई-बहन के प्यार और उन पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों की परवाह नहीं कर रही । यानी कि हमने नितान्त आत्मकेन्द्रित, आत्मजीवी पीढ़ी की बुनियाद रख दी है और शायद यही बाजारबाद की मूल आत्मा भी है । हमारे नौनिहालों में, एक भरी-पूरी जिन्दगी को अपने ही हाथों खत्म करने की प्रवृत्ति का यूं बढ़ जाना चिन्ता का विषय होना चाहिए । पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था और उसके सामानान्तर निर्मित हो रही वैश्विक संस्कृति, जिसमें हमारी शिक्षा प्रणाली भी है, कि क्रूरता, निरर्थकता की पड़ताल होनी चाहिए । किशोरों और युवाओं के भविष्य के जो सपने हम तैयार कर रहे हैं, उसमें व्याप्त खोट की पड़ताल होनी चाहिए । करियर का जो अत्यधिक दबाव हम उन पर थोप रहे हैं, उनसे उनका बचपन या किशोरापन छीन रहे हैं, उनकी अव्यावहारिकता की भी समीक्षा होनी चाहिए । इस नई पीढीं के सामने हम जो आदर्श प्रस्तुत कर रहे हैं, वे कितने वाजिब या गैर वाजिब हैं, नई पीढ़ी की आत्महत्या करने की परिणति देख, मूल्यांकन किया जाना चाहिए । युवा पीढ़ी, इस अवसादग्रस्तता के लिए कत्तई जिम्मेदार नहीं है । समाज का नया ढांचा जिसमें विकास का नया ढ़ांचा शामिल है, जिम्मेदार है । ऐसी अवसादग्रस्त दुनिया की बुनियाद हमने स्वयं रखी है ।
बाजार का सबसे अधिक दबाब बच्चों और युवाओं पर है । आज की सम्पूर्ण आर्थिक और सामाजिक व्यवस्था, युवा पीढ़ी या बच्चों को ध्यान में रखकर बनाई जा रही है । आर्थिक लाभ के लिए इन्हें गैर जरूरी प्रवृत्तियों की ओर ढकेला जा रहा है । बच्चे बाजार के सबसे महत्वपूर्ण अंग बना दिए गए हैं । जादुई तिलिस्म और महत्वाकांक्षी दुनिया की तस्वीर के अलावा जिन्दगी के वास्तविक यथार्थ उनके सामने दिखाये, बताये नहीं जा रहे । उनके सामने सब कुछ हासिल करने का ख्वाब दिखाया जाता है, वह भी बिना संघर्ष किए, बिना असफल हुए । असफलता भी सफलता के लिए जरूरी है, आज की पीढ़ी को स्वीकार्य नहीं ।
इस युवा पीढ़ी के सामने हमने नितान्त व्यक्तिक और बाजारू दुनिया खड़ा कर दिया है । हम सुख-सुविधाओं के पीछे भाग रहे हैं । हमारे पास ठहर कर सोचने, कुछ पल सुकून से जिन्दगी जीने का समय नहीं है । विकास हमें दौड़ा रहा है और हम भाग रहे हैं । इस भागा-भागी में मां-बाप, भाई-बहन, रिश्ते-नाते, गांव-देहात, पास-पड़ोस और यहां तक की राष्ट्रीयता का भी कोई मूल्य नहीं रह जाता है । हमें लगता है कि इस गलाकाट प्रतियोगिता में जरा-सी देरी या चूक सतरंगी दुनिया से बेदखल कर सकती है और हमें आर्थिक नुकसान पहुंचा सकती है । इसलिए हम केवल पैसा बनाने की मानसिकता में जी रहे हैं । हमारे पास साहित्य, संगीत, कला और संस्कृति के लिए समय नहीं है । हम अपने बच्चों को सामाजिक परिवेश से जोड़ने के बजाय, नितान्त व्यावसायिक मानसिकता में ले जा रहे हैं और गैर जरूरी दबाव बनाकर उन्हें सिर्फ चमकते बाजार का हिस्सा बनाना चाहते हैं । हम उन्हें बाजार में ऊंचे दाम पर बिकते देखना चाहते हैं । उन्हें समय से पहले हॉस्टल में डालकर अकेलापन दे रहे हैं । परिवार से कट कर स्वयं की अलग दुनिया बसा लेना, परिवार की अन्तरंगता से विमुखता, रिश्तों में ठण्डापन का होना, बाजारीकरण के बुनियादी तत्व बताए जा रहे हैं । बाजारीकरण, संघर्षशीलता का पाठ पढ़ाने के बजाए, पैसे से सबकुछ हासिल करने, धूर्तता, ठगी या छीनाझपटी को कोई अवगुण नहीं बता रहा है । मनोकांक्षाओं का विस्फोट, सब्र की समाप्ति और सामाजिकता का लोप, बहुत हद तक इसके लिए जिम्मेदार है । इस पीढ़ी के ऊपर कृत्रिम बाजार का, नई चहकती दिखती दुनिया के ग्लैमर का, कल्पनालोक का ऐसा आकर्षण पैदा कर दिया गया है, गोया इसके इतर जिन्दगी बेकार है ।
जिन्दगी को भोगने की प्रवृत्ति और दायित्वबोध की समाप्ति, युवाओं को विपरीत स्थितियों से उबारने में अक्षम बना रही है । बाजारवाद ने आज जिस समाज की रचना की है, वहां संवेदना, सम्बंध, समाजिकता का कोई मतलब नहीं रह गया है । हर कोई उपभोक्ता है । हर कोई अपने लिए जी रहा है । हम भूखों का रुदन नहीं देखते, सिर्फ सेंसेक्स का ग्राफ देखते हैं । जबकि इसी दुनिया में करोड़ों लोग भूखे रहते हैं, आधा पेट खाते हैं, उनके पास रहने को घर नहीं है पर वे आत्महत्या नहीं करते । जिन्दगी से जूझने की विकट क्षमता है उनमें । जो बाजार से नहीं जुड़े हैं वे सबसे जुड़े हैं ।
जो लोग संघर्षशील जिन्दगी जीते हैं, उनकी संवेदना मरती नहीं है । वे अपने सामने आईं विपरीत परिस्थितियों से लड़ लेते हैं । दूसरी ओर समाज का जो वर्ग सिर्फ हवा में उड़ना जानता है, वह भी उधार के या नकली डैनों से, वह हल्के तुफानों में भी नीचे टपक पड़ता है । मात्र नब्बे या निन्यानबे प्रतिशत अंक पाना सफलता का पैमाना होता तो न्यूटन, गैलीलियो, आर्किमिडीज, जेम्सवाट जैसे सामान्य विद्यार्थी आज वैज्ञानिकों की सूची में न होते ।
दरअसल यह नई अर्थव्यवस्था, सुविधाओं का अंबार लगा कर मनुष्य विरोधी होती जा रही है । यह मनुष्यता की कीमत पर समाज का निर्माण कर रही है । किताबों का बोझ बढ़ाकर बच्चों को दादा-दादी, मां-बाप, घर-परिवार, खेल-कूद सबसे काट रही है । घर के कोने में रखा बुद्धू बक्सा, कार्टून फिल्मों से बच्चों को संवेदनहीन बना रहा है । अब बच्चों के आंखों में आंसू नहीं दिखते । मां-बाप के बीमार पड़ने पर सिर्फ फोन पर हिदायत, सलाह देकर अपने दायित्व की इतिश्री कर लेते हैं । जब अपनों से संवादहीनता की स्थिति बनती जा रही हो तब इस समाज की नई पीढ़ी असफलता का दर्द किससे बांटेगी ? इन्टरनेट से ?
इसलिए आज की पीढ़ी को टूटने से बचाने के लिए जरूरी है, हम विकास के सारे मॉडलों की पुन: समीक्षा करें । प्रगति, जिन्दगी से बड़ी नहीं होती । तमाम सामाजिक कार्यो द्वारा जिन्दगी को सार्थक और संवेदनशील बनाया जा सकता है । सार्थक और संवेदनशील जिन्दगी के मायने समझ लेने वाली समाज की नई पीढ़ी न तो अवसादग्रस्त होगी और न आत्महत्या करेगी ।
सुभाष चन्द्र कुशवाहा
बी 4/140 विशालखण्ड
गोमतीनगर, लखनऊ ।
बुधवार, 20 जनवरी 2010
अंधविश्वास और मीडिया की दायित्वहीनता
अंधविश्वास और मीडिया की दायित्वहीनता
सुभाष चन्द्र कुशवाहा
आज समाज की सोच, संवेदना और बौद्धिकता को सबसे अधिक मीडिया प्रभावित कर रहा है,खासकर दृश्य मीडिया । उपभोक्तावादी दौर में साहित्य, दर्शन और इतिहास की उपेक्षा, साथ ही साथ उपभोक्तावाद को फैलाने में जनमानस की बुद्धि पर नियन्त्रण का काम मीडिया के द्वारा ही सम्भव हुआ है । मीडिया अपने सामाजिक दायित्वों से मुक्त हो,टी0आर0पी0 के चंगुल में जा फंसा है । उसने जनता को जितना दिया है,उससे कहीं अधिक उसका नुकसान किया है । चूंकि वह धनबल से संचालित है इसलिए समाज उसके लिए मात्र उपभोक्ता है । वह ऐन-केन प्रकारेण मुनाफा कमाना चाहता है । सत्य-असत्य के विश्लेषण में समय बर्बाद करने का वक्त नहीं है यह । और न यह मीडिया के एजेण्डे में है ।
मीडिया द्वारा तर्क यह दिया जा रहा है कि दर्शक जो देखना चाहते हैं, वह दिखाया जा रहा है । सवाल तो यह भी है कि दर्शकों की राय,चाह जानने का तरीका क्या है ? दर्शकों की बेहतर राय, सोच और चाह के निर्माण का दायित्व क्या मीडिया का नहीं है ? दर्शकों का एक वर्ग अगर ब्लू फिल्में देखना पसन्द करे तो मीडिया क्या उसे भी परोसेगा ? दरअसल यह उत्तर निहायत गैर जिम्मेदारी भरा और उपभोक्तावादी नज़रिए से युक्त है । मीडिया ने आज दर्शकों को वहां लाकर खड़ा कर दिया है जहां उनकी बुद्धि का अपहरण करना बेहद आसान हो गया है । धर्म और आस्था का इस काम में बेहतर इस्तेमाल किया जा रहा है । ऐसे दौर में अंधविश्वासों को पुख्ता करने, समाज को वैज्ञानिक ताने-बाने के झांसे में उलझाकर अंधविश्वासी बनाने का कार्य मीडिया बखूबी कर रहा है ।
कितनी अजीब बात है कि सारे सत्य आंखों के सामने होने के बावजूद,ठगी-दर-ठगी के हम शिकार होते जा रहे हैं । अंधविश्वासों की वास्तविकता देखने के बावजूद पुन: अगले अंधविश्वास में उलझा दिए जा रहे हैं । देशभर में फैले सूखे पर मेंढ़क-मेंढकी विवाह, यज्ञ, हवन, नंगी औरतों के हल चलाने जैसे जो तमाम टोटके हुए, उनसे तो मानसून प्रभावित नहीं हुआ ? फिर सत्य उद्घाटित करने का दावा करने वाला मीडिया इन टोटकों के खिलाफ मुहिम क्यों नहीं छेड़ा ? वह तो अब भी तमाम चैनलों पर टोटकों की दुकानें खोले समाज की बुद्धि पर डाका डाल रहा है ।
समाज में चमत्कारिक पत्थरों को बेच कर जनमानस के कल्याण के दावे तो पहले से होते आए हैं । अब इन चमत्कारिक पत्थरों को बाकायदा टी0वी0 पर दिखाकर, दावे सम्बंधी झूठे विज्ञापनों और कुछ महानुभावों का अनुभव दिखा-बता कर दर्शकों को ऐसे पत्थरों को खरीदने के लिए उत्प्रेरित किया जा रहा है । मूंगा, लहसुनिया, गोमेद, माणिक, मोती, पुखराज, सुनहला, नीलम, पन्ना अदि रु0 2100 से लेकर रु0 2400 तक टी0वी0 के माध्यम से बेचे जा रहे हैं ।
रक्षा कवचों की तो बाढ़ आई हुई है । शुरुआत तो `रूद्राक्ष रक्षा कवच´ से हुई थी । अब नित्य नए रक्षा कवच प्रकाश में आ रहे हैं । दावे तो इतने बढ़े-चढ़े हैं कि लगता है मात्र तरह-तरह के रक्षा कवचों के सहारे ही जिन्दगी ऐशो आराम से गुजर जायेगी । एक चैनल `नज़र सुरक्षा कवच´ बेच रहा है और दावा कर रहा है कि दुनिया भर के वैज्ञानिकों ने उसके रक्षा कवच को बुरी नज़रों से बचाने में प्रभावी माना है । दुनिया के ये कौन से वैज्ञानिक हैं और कहां रहते हैं,चैनल के पास इसका जवाब नहीं है । तीस दिन में लाभ प्राप्त न होने पर पैसा वापस करने का दावा किया जा रहा है । ये रक्षा कवच, व्यवसाय में लाभ दिलाते हैं, नए रिश्ते बनाते हैं, प्रेमिकाएं उपलब्ध कराते हैं, वेतन बढ़ाते हैं और न जाने क्या-क्या लाभ दिलाते हैं । `नज़र सुरक्षा कवच´, `शिव शक्ति सुरक्षा कवच´, `शनि सुरक्षा कवच´,`शनि वाहन रक्षा कवच´, `हनुमान रक्षा कवच´, `दुर्गा रक्षा कवच´ और न जाने कितने प्रकार के रक्षा कवच रु0 2500 के आसपास बेचे जा रहे हैं । जाहिर है दो जून की रोटी का जुगाड़ न करने वालों के लिए ऐसे रक्षा कवच नहीं हैं ।
रक्षा कवचों पर आस्था न रखने वालों के सम्बंध में बर्बादी की खौफनाक बातें बताई जाती हैं । बताया जाता है कैसे अविश्वासी का जीवन नरक तुल्य हो गया । दर्शकों को बताया जाता है कि इन रक्षा कवचों के सहारे हर प्रकार का लाभ कमाया जा सकता है । फिर तो इस देश की गरीबी, दुर्दशा, लाचारी, भुखमरी देखकर हमें आश्चर्य चकित होना चाहिए । मीडिया में छाये रहने वाले इन रक्षा कवचों को आम जनता में बांट कर करोड़ों रुपयों की लागत से चलाई जाने वाली तमाम विकास योजनाओं, अस्पतालों, वैज्ञानिक संस्थानों से बचा जा सकता है । देश को इन तान्त्रिकों, बाबाओं और ठगों के हवाले कर हमें निश्चिन्त हो जाना चाहिए । अगर नहीं तो फिर यह पूछा जाना चाहिए कि मीडिया के सहारे इन ठगों को जनता को ठगने की इजाजत कैसे मिली हुई है? ऐसे अंधविश्वासी समाज का निर्माण कर क्या मुल्क तरक्की कर सकता है ? क्या अभी सदियों तक हम ऐसे ही ठगों के रहमों -करम पर ज़िन्दा रहेंगे ?
विडंबना तो यह है कि हर रक्षा कवच अपने को श्रेष्ठ बता कर दूसरे की असलियत की पोल स्वयं खोल रहा है । दूसरों को बेकार और अपने को श्रेष्ठ बता रहा है । इसके बावजूद मीडिया के विज्ञापनों, विज्ञापनों में दिखने वाले चमत्कारिक बाबाओं और देवी-देवताओं के नामों का इस्तेमाल कर ये ठग जनता को भुलावे में लेने में सफल हो रहे हैं । वास्तुशास्त्र वाले जहां वास्तुदोषों को दूर करने के लिए रसोई घर,बाथरूम आदि की तोड़फोड़ करा कर वास्तु दोषों को दूर करने के तरीके बता रहे हैं तो वहीं रक्षा कवच बेचने वाले दावा करते हैं कि शिव शक्ति सुरक्षा कवच घर पर लगाने से स्वत: सारे वास्तुदोष दूर हो जाते हैं । यानि की तोड़फोड़ कराने की जरूरत ही नहीं । अब यह दर्शकों की बुद्धि पर निर्भर है कि वे वास्तुशास्त्र के बल पर जियें या रक्षा कवचों के सहारे । कहा जा रहा है कि शनि नाराज हो जाएं तो राजा को भिखारी और भिखारी को राजा बना देते हैं । क्या शनि इतनी गैर जिम्मेदारी का व्यवहार करते हैं ? राजा को रंक और रंक को राजा बनाने का कोई तार्किक कारण तो होना ही चाहिए ? दरअसल इस उपभोक्तावादी दुनिया में यह सब ठगों की चाल है जो मीडिया के सहारे अपनी दुकानें सजाए, लाभ कमा रहे हैं। । आम लोगों का भविष्य संवरे या न संवरे, इन ठगों का भविष्य तो संवर ही रहा है । मीडिया को भी लाभ कमाना है चाहे दर्शक ठगे जाएं या अंधविश्वासों के चंगुल में फंस कर रह जाएं, उसकी कोई जवाबदेही नहीं है । ऐसे समय और दौर में मीडिया को कोई हक भी नहीं बनता जो अपनी विश्वसनीयता का दावा करे,किसी ठगी का पर्दाफाश करे और दूसरों की विश्वसनीयता या ठगी पर सवाल उठाए । जब वह स्वयं समाज को ठगने का वाहक बना हुआ है तो फिर समाज की बौद्धिकता के निर्माण के लिए हमें दूसरे विकल्पों का सहारा लेना ही पड़ेगा । चूंकि ऐसे विकल्प सीमित हैं, इसलिए यह सम्भव है कि आने वाले दिनों में विज्ञान की तमाम प्रगति के बावजूद वृहत् समाज अंधविश्वासी समाज में तब्दील होता जायेगा । इस अंधी सुरंग से निकलने का रास्ता जनआन्दोलनों से ही सम्भव है । अब देखना है कि उपभोक्तावाद, जिसने तमाम जनआन्दोलनों की हवा निकाल दी है, उसके खिलाफ कब और कैसे कोई जनचेतना विकसित होती है ।
सुभाष चन्द्र कुशवाहा
बी 4/140 विशालखण्ड
गोमतीनगर,लखनऊ 226010
सुभाष चन्द्र कुशवाहा
आज समाज की सोच, संवेदना और बौद्धिकता को सबसे अधिक मीडिया प्रभावित कर रहा है,खासकर दृश्य मीडिया । उपभोक्तावादी दौर में साहित्य, दर्शन और इतिहास की उपेक्षा, साथ ही साथ उपभोक्तावाद को फैलाने में जनमानस की बुद्धि पर नियन्त्रण का काम मीडिया के द्वारा ही सम्भव हुआ है । मीडिया अपने सामाजिक दायित्वों से मुक्त हो,टी0आर0पी0 के चंगुल में जा फंसा है । उसने जनता को जितना दिया है,उससे कहीं अधिक उसका नुकसान किया है । चूंकि वह धनबल से संचालित है इसलिए समाज उसके लिए मात्र उपभोक्ता है । वह ऐन-केन प्रकारेण मुनाफा कमाना चाहता है । सत्य-असत्य के विश्लेषण में समय बर्बाद करने का वक्त नहीं है यह । और न यह मीडिया के एजेण्डे में है ।
मीडिया द्वारा तर्क यह दिया जा रहा है कि दर्शक जो देखना चाहते हैं, वह दिखाया जा रहा है । सवाल तो यह भी है कि दर्शकों की राय,चाह जानने का तरीका क्या है ? दर्शकों की बेहतर राय, सोच और चाह के निर्माण का दायित्व क्या मीडिया का नहीं है ? दर्शकों का एक वर्ग अगर ब्लू फिल्में देखना पसन्द करे तो मीडिया क्या उसे भी परोसेगा ? दरअसल यह उत्तर निहायत गैर जिम्मेदारी भरा और उपभोक्तावादी नज़रिए से युक्त है । मीडिया ने आज दर्शकों को वहां लाकर खड़ा कर दिया है जहां उनकी बुद्धि का अपहरण करना बेहद आसान हो गया है । धर्म और आस्था का इस काम में बेहतर इस्तेमाल किया जा रहा है । ऐसे दौर में अंधविश्वासों को पुख्ता करने, समाज को वैज्ञानिक ताने-बाने के झांसे में उलझाकर अंधविश्वासी बनाने का कार्य मीडिया बखूबी कर रहा है ।
कितनी अजीब बात है कि सारे सत्य आंखों के सामने होने के बावजूद,ठगी-दर-ठगी के हम शिकार होते जा रहे हैं । अंधविश्वासों की वास्तविकता देखने के बावजूद पुन: अगले अंधविश्वास में उलझा दिए जा रहे हैं । देशभर में फैले सूखे पर मेंढ़क-मेंढकी विवाह, यज्ञ, हवन, नंगी औरतों के हल चलाने जैसे जो तमाम टोटके हुए, उनसे तो मानसून प्रभावित नहीं हुआ ? फिर सत्य उद्घाटित करने का दावा करने वाला मीडिया इन टोटकों के खिलाफ मुहिम क्यों नहीं छेड़ा ? वह तो अब भी तमाम चैनलों पर टोटकों की दुकानें खोले समाज की बुद्धि पर डाका डाल रहा है ।
समाज में चमत्कारिक पत्थरों को बेच कर जनमानस के कल्याण के दावे तो पहले से होते आए हैं । अब इन चमत्कारिक पत्थरों को बाकायदा टी0वी0 पर दिखाकर, दावे सम्बंधी झूठे विज्ञापनों और कुछ महानुभावों का अनुभव दिखा-बता कर दर्शकों को ऐसे पत्थरों को खरीदने के लिए उत्प्रेरित किया जा रहा है । मूंगा, लहसुनिया, गोमेद, माणिक, मोती, पुखराज, सुनहला, नीलम, पन्ना अदि रु0 2100 से लेकर रु0 2400 तक टी0वी0 के माध्यम से बेचे जा रहे हैं ।
रक्षा कवचों की तो बाढ़ आई हुई है । शुरुआत तो `रूद्राक्ष रक्षा कवच´ से हुई थी । अब नित्य नए रक्षा कवच प्रकाश में आ रहे हैं । दावे तो इतने बढ़े-चढ़े हैं कि लगता है मात्र तरह-तरह के रक्षा कवचों के सहारे ही जिन्दगी ऐशो आराम से गुजर जायेगी । एक चैनल `नज़र सुरक्षा कवच´ बेच रहा है और दावा कर रहा है कि दुनिया भर के वैज्ञानिकों ने उसके रक्षा कवच को बुरी नज़रों से बचाने में प्रभावी माना है । दुनिया के ये कौन से वैज्ञानिक हैं और कहां रहते हैं,चैनल के पास इसका जवाब नहीं है । तीस दिन में लाभ प्राप्त न होने पर पैसा वापस करने का दावा किया जा रहा है । ये रक्षा कवच, व्यवसाय में लाभ दिलाते हैं, नए रिश्ते बनाते हैं, प्रेमिकाएं उपलब्ध कराते हैं, वेतन बढ़ाते हैं और न जाने क्या-क्या लाभ दिलाते हैं । `नज़र सुरक्षा कवच´, `शिव शक्ति सुरक्षा कवच´, `शनि सुरक्षा कवच´,`शनि वाहन रक्षा कवच´, `हनुमान रक्षा कवच´, `दुर्गा रक्षा कवच´ और न जाने कितने प्रकार के रक्षा कवच रु0 2500 के आसपास बेचे जा रहे हैं । जाहिर है दो जून की रोटी का जुगाड़ न करने वालों के लिए ऐसे रक्षा कवच नहीं हैं ।
रक्षा कवचों पर आस्था न रखने वालों के सम्बंध में बर्बादी की खौफनाक बातें बताई जाती हैं । बताया जाता है कैसे अविश्वासी का जीवन नरक तुल्य हो गया । दर्शकों को बताया जाता है कि इन रक्षा कवचों के सहारे हर प्रकार का लाभ कमाया जा सकता है । फिर तो इस देश की गरीबी, दुर्दशा, लाचारी, भुखमरी देखकर हमें आश्चर्य चकित होना चाहिए । मीडिया में छाये रहने वाले इन रक्षा कवचों को आम जनता में बांट कर करोड़ों रुपयों की लागत से चलाई जाने वाली तमाम विकास योजनाओं, अस्पतालों, वैज्ञानिक संस्थानों से बचा जा सकता है । देश को इन तान्त्रिकों, बाबाओं और ठगों के हवाले कर हमें निश्चिन्त हो जाना चाहिए । अगर नहीं तो फिर यह पूछा जाना चाहिए कि मीडिया के सहारे इन ठगों को जनता को ठगने की इजाजत कैसे मिली हुई है? ऐसे अंधविश्वासी समाज का निर्माण कर क्या मुल्क तरक्की कर सकता है ? क्या अभी सदियों तक हम ऐसे ही ठगों के रहमों -करम पर ज़िन्दा रहेंगे ?
विडंबना तो यह है कि हर रक्षा कवच अपने को श्रेष्ठ बता कर दूसरे की असलियत की पोल स्वयं खोल रहा है । दूसरों को बेकार और अपने को श्रेष्ठ बता रहा है । इसके बावजूद मीडिया के विज्ञापनों, विज्ञापनों में दिखने वाले चमत्कारिक बाबाओं और देवी-देवताओं के नामों का इस्तेमाल कर ये ठग जनता को भुलावे में लेने में सफल हो रहे हैं । वास्तुशास्त्र वाले जहां वास्तुदोषों को दूर करने के लिए रसोई घर,बाथरूम आदि की तोड़फोड़ करा कर वास्तु दोषों को दूर करने के तरीके बता रहे हैं तो वहीं रक्षा कवच बेचने वाले दावा करते हैं कि शिव शक्ति सुरक्षा कवच घर पर लगाने से स्वत: सारे वास्तुदोष दूर हो जाते हैं । यानि की तोड़फोड़ कराने की जरूरत ही नहीं । अब यह दर्शकों की बुद्धि पर निर्भर है कि वे वास्तुशास्त्र के बल पर जियें या रक्षा कवचों के सहारे । कहा जा रहा है कि शनि नाराज हो जाएं तो राजा को भिखारी और भिखारी को राजा बना देते हैं । क्या शनि इतनी गैर जिम्मेदारी का व्यवहार करते हैं ? राजा को रंक और रंक को राजा बनाने का कोई तार्किक कारण तो होना ही चाहिए ? दरअसल इस उपभोक्तावादी दुनिया में यह सब ठगों की चाल है जो मीडिया के सहारे अपनी दुकानें सजाए, लाभ कमा रहे हैं। । आम लोगों का भविष्य संवरे या न संवरे, इन ठगों का भविष्य तो संवर ही रहा है । मीडिया को भी लाभ कमाना है चाहे दर्शक ठगे जाएं या अंधविश्वासों के चंगुल में फंस कर रह जाएं, उसकी कोई जवाबदेही नहीं है । ऐसे समय और दौर में मीडिया को कोई हक भी नहीं बनता जो अपनी विश्वसनीयता का दावा करे,किसी ठगी का पर्दाफाश करे और दूसरों की विश्वसनीयता या ठगी पर सवाल उठाए । जब वह स्वयं समाज को ठगने का वाहक बना हुआ है तो फिर समाज की बौद्धिकता के निर्माण के लिए हमें दूसरे विकल्पों का सहारा लेना ही पड़ेगा । चूंकि ऐसे विकल्प सीमित हैं, इसलिए यह सम्भव है कि आने वाले दिनों में विज्ञान की तमाम प्रगति के बावजूद वृहत् समाज अंधविश्वासी समाज में तब्दील होता जायेगा । इस अंधी सुरंग से निकलने का रास्ता जनआन्दोलनों से ही सम्भव है । अब देखना है कि उपभोक्तावाद, जिसने तमाम जनआन्दोलनों की हवा निकाल दी है, उसके खिलाफ कब और कैसे कोई जनचेतना विकसित होती है ।
सुभाष चन्द्र कुशवाहा
बी 4/140 विशालखण्ड
गोमतीनगर,लखनऊ 226010
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