शनिवार, 3 अप्रैल 2010

प्राथमिक शिक्षा का सूरतेहाल
चर्चा में पढ़ाई नहीं, मिड-डे-मील है

प्राथमिक पाठशालाओं में पकने वाला मिड-डे-मील हमेशा चर्चा में रहा है, शासन-प्रशासन, मीडिया और हर कहीं । कभी खाना न बनने, विषाक्त खाना खाकर बीमार होने या खाने में छिपकली, कीड़ों और गन्दगी की वजह से तो कभी दलित महिला द्वारा खाना तैयार कर सवर्ण बच्चों का धर्मभ्रष्ट करने की वजह से । इन पाठशालाओं की पढ़ाई और उनकी गुणवत्ता, उनमें कुछ जरूरी सुधार किए जाने की आवश्यकता कभी चर्चा का विषय नहीं बनी । गोया प्राथमिक शिक्षा का मतलब पढ़ाई नहीं, मिड-डे-मील ही होता हो । खाद्य पदार्थों में हुई बेतहाशा मूल्य वृद्धि की वजह से प्राथमिक शिक्षा पर पैनी नज़र रखने वाले भी कह रहे हैं कि महंगाई ने मिड-डे-मील को बेस्वाद कर दिया है । दलिया में दूध की जगह पानी, दाल में पानी और खीर में पानी की बात चर्चा में सुनाई देने लगी है । एन0जी0ओ0 वाले, ग्राम प्रधान और प्रधानाध्यापक कह रहे हैं कि अब मिड-डे-मील तैयार करने की लागत तीन रुपए तीस पैसे से लेकर सात रुपए तक हो गई है । ऐसे में भला पौष्टिक मिड-डे-मील दिया जाए तो कैसे र्षोर्षो एन0जी0ओ0, प्रशासन, प्रधान और प्रधानाध्यापक सब इसी चिन्ता में गले जा रहे हैं । दरअसल स्कूली बच्चों की सेहत से ज्यादा इन्हें अपनी सेहत की चिन्ता सता रही है । एकबारगी प्राथमिक शिक्षा की इस तस्वीर और मिड-डे-मील से जुड़े समाचारों से भान होता है कि कभी पढ़ाई, सांस्कृतिक गतिविधियों और खेलकूद प्रतियोगिताओं के लिए जाने जाने वाले ये विद्यालय आज भोजनालय में तब्दील हो चुके हैं । अब यहां पढ़ाई और बाल विकास की गतिविधियों के अलावा सब कुछ होता है । विद्यालयों में अध्यापक के नाम पर एक या दो शिक्षा मित्र हैं । प्रधानाध्यापक के पास तो विद्यालय भवन निर्माण, छात्रवृत्ति वितरण, मिड-डे-मील जैसे तमाम लाभप्रद कामों के अलावा पल्स-पोलियो, चुनाव, जनगणना जैसे अलाभप्रद काम भी हैं । भवन निर्माण, मिड-डे-मील, छात्रवृत्ति वितरण जैसी सेवाओं से प्रधान और प्रधानाध्यापक सहित तमाम तन्त्र लाभान्वित हो रहे हैं । यह सब जिस बुनियादी शिक्षा के लिए किया जा रहा है, वहां से शिक्षा कोसों दूर जा चुकी है । यह बात अभिभावकों को भी पता है और अध्यापकों को भी । निजी स्कूलों के अध्यापकों को पल्स-पोलियो, चुनाव, जनगणना जैसे कार्य नहीं करने होते । इससे धनिकों के बच्चों की पढ़ाई बाधित नहीं होती ।
सरकारी स्कूलों में छात्रवृत्ति और मिड-डे-मील के आकर्षण की वजह से छात्र पंजियन पुस्तिका में सैकड़ों की संख्या में नाम दर्ज हैं । इसी वजह से मानव संसाधन विकास मन्त्रालय की स्थायी समिति की रपट में कहा जा रहा है कि पहली से पांचवी कक्षा तक के बच्चों के स्कूल छोड़ने की दर घटी है । जबकि हकीकत दूसरी ही है । एक ओर मिड-डे मील के मद में आवंटित धनराशि खर्च नहीं हो पा रही है तो दूसरी और स्कूलों में पढ़ाने के लिए न तो माहौल है न अध्यापक । कुल मिलाकर देश के चरित्र निर्माण की प्रारिम्भक ईकाई, चारित्रिक पतन की सबसे घिनौनी ईकाई में तब्दील हो चुकी है ।
इस बीच एक बार फिर केन्द्र सरकार ने मिड-डे-मील योजना में संशोधन प्रस्ताव को मंजूरी देकर 12 करोड़ बच्चों की सेहत सुधारने की घोषणा कर दी है । अब दाल की मात्रा 25 ग्राम से बढ़ाकर 30 ग्राम, सब्जी की 65 ग्राम से बढ़ाकर 75 ग्राम और तेल और वसा की मात्रा दस से घटाकर साढ़े सात प्रतिशत कर दी गई है । भोजन पकाने का खर्च ढाई रुपए से बढ़ाकर पौने चार रुपए कर दिया गया है । अब 25 छात्रों पर एक रसोइया, 100 तक छात्र होने पर दो और आगे प्रति 100 छात्र पर एक अतिरिक्त रसोइया रखा जा सकेगा जिन्हें 1000 रुपए प्रति माह मिलेगा । कुल मिलाकर खाद्य पदार्थों में 5-5 ग्राम की वृद्धि कर गरीबों के प्रति और ज्यादा संवेदनशील दिखने का प्रयास किया जा रहा है ।
हम सभी जानते हैं कि जिन पाठशालाओं में मिड-डे-मील खिलाया जाता है वहां मात्र गरीबों के ही बच्चे पढ़ने के नाम पर जाते हैं, जिनमें दलितों और पिछड़ों की ही बहुतायत होती है । ग्रामीण इलाकों के इन पाठशालाओं में शायद ही कभी किलो-तराजू से तौल कर खाना पकाया जाता हो और शायद ही प्रतिदिन इसकी जांच सम्भव हो । ऐसे में इस नए संशोधन प्रस्ताव का वास्तविक फायदा होना मुश्किल है । इन पाठशालाओं में जितने बच्चों के नाम दर्ज हैं,उसके दसवें भाग के बराबर ही बच्चे मिड-डे-मील खाने आते हैं । अधिक से अधिक नाम तो इसलिए दर्ज करा दिए जाते हैं जिससे ज्यादा राशन, ज्यादा सरकारी धन मिल सके और जिसका सदुपयोग इस तन्त्र के तमाम पायदानों से लेकर प्रधान और प्रधानाध्यापक तक कर सकें । बच्चों की अधिक संख्या दिखाकर ही तो मिड-डे-मील योजना की सफलता के डंके पीटे जा रहे हैं । जबकि हकीकत यह है कि एक बच्चे का नाम दो-दो सरकारी पाठशालाओं में दर्ज हैं और वह पढ़ने जाता है गांव में खुले निजी पाठशाला में । प्रधान और प्रधानाध्यापक को इन बच्चों के अभिभावक सहयोग इसलिए करते हैं जिससे उनके बच्चे को मुफ्त में प्रत्येक पाठशाला से तीन सौ रुपए वार्षिक छात्रवृत्ति मिलती रहे । यानी कि एक बच्चे का नाम दो प्राथमिक पाठशालाओं में दर्ज होगा तो दोनों जगहों से कुल छ: सौ रुपए वाषिZक छात्रवृत्ति मिल जायेगी । पहले जहां पटरी, टाट और श्यामपट्ट के सहारे गरीबों के बच्चे इन स्कूलों में पढ़ कर बेहतर स्थिति में पहुंच जाते थे वहीं अब शायद ही किसी गरीब का बच्चा मिड-डे-मील खा कर व्यावसायिक शिक्षा की ओर जा पाता है । व्यावसायिक शिक्षा की कमान निजी पाठशालाओं के हाथों में आ चुकी हैं जहां सक्षम लोगों के बच्चे पढ़-लिख कर अपना भविष्य बना रहे हैं । सचमुच यह मिड-डे-मील योजना बहुत ही चालाकी भरी योजना है जिसकी वजह से गरीब का बच्चा वहीं का वहीं रह जाए, उसकी औकात कटोरा लेकर आने और मिड-डे-मील खाने, कुछ रुपए की छात्रवृत्ति पाने तक बनी रहे और अमीरों के बच्चों के लिए व्यावसायिक शिक्षा के सारे अवसर उपलब्ध रहें । दोहरी शिक्षा नीति, जो दोहरी भाषा के साथ लाई गई थी, समाज के बहुसंख्यक गरीबों को ऊपर बढ़ने के रास्ते से वंचित कर, अमीरों को सुलभ रास्ते उपलब्ध कराने की सोची-समझी रणनीति थी । मिड-डे-मील योजना के धूर्त नीति-नियन्ता कहते हैं कि प्राथमिक पाठशालाओं के श्यापट्ट पर प्रत्येक दिन के खाने का मीनू लिखना अनिवार्य होगा। भई वाह! है न खूबसूरत नीति ? इससे गरीबों के बच्चे, पढ़ाई न होने के बावजूद श्यापमट्ट पर मीनू पढ़कर मुंह में पानी भर लेंगे और शान्तिपूवर्क रसोइए की ओर टकटकी लगाए वक्त गुजार देंगे । ऐसी हास्यास्पद नीतियां बनाने वालों को पहले यह सोचना चाहिए कि श्यामपट्ट खाने का मीनू लिखने के लिए नहीं होता, बेहतर शिक्षा देने के लिए होता है ।
प्राथमिक पाठशालाओं को बचाने का एक मात्र विकल्प यह होगा कि मिड-डे-मील जैसी दिखावटी और फिजूलखर्ची वाली योजनाओं को तुरत बन्द करते हुए सभी पाठशालाओं में कम से कम पांच से छ: योग्य स्थाई अध्यापकों की नियुक्ति कर उनके शिक्षण, प्रशिक्षण की प्रक्रिया पर निरन्तर नज़र रखने वाले जवाब देह तन्त्र को स्थापित किया जाए । अध्यापकों की जवाबदेही बेहतर परिणाम देने की होनी चाहिए न कि जनगणना, पल्सपोलियो, मतदान आदि में उलझाए रखने के लिए । गरीब बच्चों की मदद करने के लिए दूसरे तमाम तरीकें हैं । जैसे कि छात्रवृत्ति और अनाज, 80 प्रतिशत उपस्थिति दर्ज कराने वाले बच्चों के अभिभावकों को मुहैया कराई जा सकती है । कम से कम पाठशालाओं को रसोईघर में तब्दील होने से बचाये बगैर प्राथमिक शिक्षा का भला नहीं होने वाला है ।

सुभाष चन्द्र कुशवाहा
बी 4/140 विशालखण्ड
गोमतीनगर,लखनऊ 226010

रविवार, 7 फ़रवरी 2010


होशियारी खटक रही है, मेरा नया कहानी संग्रह है जो अंतिका प्रकाशन से आया है ।

रविवार, 31 जनवरी 2010

बरसाती पानी को बचाने की जरूरत

सुभाष चन्द्र कुशवाहा
मानसून की बेरूखी से गांव और शहर दोनों खौफजदा हैं । जहां एक ओर गर्मी,उमस से जीना बेहाल हो गया है वहीं दूसरी ओर पीने के पानी की विकराल होती समस्या के कारण देश में मारा-मारी ,धरना-प्रदर्शन,तोड़-फोड़ का दौर जारी हैं । नदियां ,नाले,झीलें सूख रही हैं । ग्लैशियर पिघल रहे हैं । हमने आज के विकास की कीमत पर कल के विनाश की इबारत अपने हाथों लिख दी है । हम चेतते नहीं, अपनी गलतियों को सुधारने के बजाए,गाल बजा रहे हैं । वातानुकूलित कमरे में , बाहर की गर्मी और पानी के लिए मचा हाहाकार सुनाई नहीं दे रहा । कहा जा रहा है कि हमारी नादानियों की वजह से इक्वीसवीं सदी के अन्त तक गंगा को पानी देने वाला ग्लैशियर हमेशा के लिए पिघल जायेगा । हिमालय से निकलने वाली नदियां सूख जायेंगी । नदियों के सूखते ही धरती पर रक्तरंजित मार-काट मचेगी और फिर मानव सभ्यता का दुखद अन्त हो जायेगा । यह कोई भविष्यवाणी नहीं है । कल का यथार्थ है ।
संयुक्त राष्ट्र संघ की रिपोर्ट के अनुसार सन् 2050 तक चार अरब लोग पानी की कमी से प्रभावित होंगे । आज भी एक अरब लोगों को शुद्ध पानी नसीब नहीं है । मुम्बई महानगर को पानी देने वाली चार महत्वपूर्ण झीलें सूख रही हैं । दूसरी ओर पहली ही बारिश में मुम्बई की सड़कों पर जलभराव दिख रहा हैं, कालोनियां पानी से लबालब भर गई हैं । यह हर साल का नजारा है । अब भला कोई पूछे कि जब मुम्बई की चारों झीलें सूख रही हैं तो बरसाती पानी से हम उन्हें भरने की कार्ययोजना क्यों नहीं बनाते ?
हमारे नीति नियन्ताओं की कार्ययोजना में गम्भीरता का मतलब महज यही है कि बारिश न होने पर वे जगह-जगह हवन,पूजा,यज्ञ के आयोजनों को कराकर, टी0वी0 पर दिखा देते हैं और समस्या को भगवान की ओर खिसका कर चैन से सांस लेते हैं । महिलाओं द्वारा नंगी होकर हल चलाने,बच्चों के कीचड़ में लोटने या मेढ़क-मेढ़की की शादी कराकर इन्द्र देवता को रिझाने जैसे टोटकों को प्रसारित कराते हैं और अपने द्वारा पैदा की गई समस्याओं को कभी ग्लोवल वार्मिंग का कारण बताकर तो कभी भगवान की मर्जी बताकर अपनी नालायकी को ढंक लेते हैं । आखिर ग्लोवल वार्मिंग के लिए जिम्मेदार कौन हैं ? नदियों से नहरों का संजाल फैलाते समय जो गुलाबी तस्वीर पेश की गई थी वह महज दो-तीन दशकों में मटमैली हो गई है । अधिकांश नहरों के अन्तिम सिरे(टेल) तक पानी नहीं पहुंचता । नहरें सिल्ट से भर गई हैं । नदियों का पानी खेतों तक पहुंचने के बजाय, वाष्प बनकर उड़ रहा है और नदियों को सुखता जा रहा है । जितने क्षेत्रफल में देश की नहरें फैली हैं, उतने क्षेत्रफल में झीलों का निर्माण कर तथा बरसाती पानी संरक्षित कर हम सिंचाई के लिए पानी बटोर लेते और साथ ही साथ खेतों की उर्वरकता को सिल्ट से प्रभावित न होने देते ।
आजादी के बाद देश में जलसंरक्षण के जितने भी साधन थे, धीरे-धीरे हमने सबको भूमाफियाओं के हवाले कर दिया जहां उन्होंने अपने लाभ के लिए कंकरीट के जंगल उगाए । विकास के आधुनिक तौर-तरीकों के नाम पर हमने खेती, सिंचाई की पूरी संरचना बदल दी । जहां पहले जमीनी पानी का इस्तेमाल न कर,परंपरागत जलस्त्रोतों से सिंचाई होती थी वहीं परंपरागत जलस्त्रोतों यथा-तालाब,कुएं और झीलों की हमने उपेक्षा कर जगह-जगह ट्यूबवेल लगा कर जमीन खोखला कर दिया । ट्यूबवेलों के चलन ने न केवल कुओं और तालाबों को पाटा अपितु जमीन के अन्दर के पानी को निचोड़ कर पूरे ऋतु चक्र को प्रभावित किया । कुओं और तालाबों के माध्यम से बरसाती, पानी जमीनी पानी के तल को बनाए रखता था। गांवों में जगह-जगह खुदे कुएं `रेन वाटर हार्वेस्टिंग का काम करते थे । आज गांवों में कुएं दिखाई नहीं देते । यही हाल तालाबों का है । जमीनों को पट्टों पर देने की राजनीति ने तमाम भूमाफियाओं को तालाबों की जमीन पर कब्जा दिला दिया । मिट्टी के बरतनों ,घरों का निर्माण रूकने से बचे-खुचे तालाब भरते गए । उनके पाट सिमटते गए । आज इक्का-दुक्का ही ऐसे तालाब बचे हैं जो पूरे साल बरसाती पानी को बचाये रखने की क्षमता रखते हैं । सामन्त, राजे-महाराजे,अपने शौक के लिए ही सही, मगर तालाबों और झीलों के संरक्षण पर विशेष ध्यान देते थे । हमारी लोकतन्त्रात्मक दृष्टि उनसे भी गई गुजरी है । या यों कहें, हमारे पास ऐसी कोई दृष्टि है ही नहीं । हम महज इन्द्र देवता को हवन, पूजा से रिझाने का ढोंग कर अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर लेना चाहते हैं । जब ऐसे ढोंग सफल नहीं होते तब अपने कृत्यों पर शर्मिन्दा होने के बजाए दूसरे ढ़ोंग का प्रदर्शन करने लगते हैं ।
अपनी अर्कमण्यता छोड़ हमें बरसाती पानी को बचाने के बारे में गम्भीरता से सोचने की जरूरत है । बरसाती पानी बचा कर जमीनी पानी बढाने के लाभदायक परिणाम के सम्बंध में केरल का एक उदाहरण हमारे सामने है । सन् 2005 में केरल पब्लिक स्कूल ने अपने 250 वर्ग मीटर छत से 2,40,000 लीटर बरसाती पानी को संरक्षित कर अपने जमीनी पानी को इतना बढ़ा लिया कि अब गर्मियों में भी वहां कुएं और ट्यूबवेल नहीं सूखते ।
जमीनी पानी के स्तर को नीचे खिसकने से बचाने के लिए रेन वाटर हार्वेस्टिंग ही एक मात्र विकल्प है । विश्व बैंक की रिपोर्ट के अनुसार यदि हमने बरसाती पानी को संरक्षित कर जमीनी पानी के स्तर को बचाने की कोशिश नहीं की तो पानी की वर्तमान उपलब्धता 500 घन किलोमीटर से घट कर स्न 2050 तक मात्र 80 घन किलोमीटर रह जायेगी । विश्व बैंक की रिपोर्ट के अनुसार आज जहां भारत का 15 प्रतिशत भू-भाग पानी के गम्भीर संकट से घिरा हुआ है वहीं सन् 2030 तक 60 प्रतिशत भू-भाग इसकी चपेट में आ जायेगा । सबसे पहले वही क्षेत्र संकटग्रस्त होंगे जहां जमीनी पानी का ज्यादा दोहन हो रहा है जैसे राजस्थान,पंजाब,हरियाण, तमिलनाडु और कर्नाटक ।
रेन वाटर हार्वेस्टिंग के बारे में कहा-सुना बहुत जा रहा है,पर किया कुछ नहीं जा रहा । शहरों में सड़कों के किनारे, बरसाती पानी को जमीन में संरक्षित करने के लिए अभी तक कोई योजना अमल में नहीं लाई जा रही है । छतों के बरसाती पानी को जमीन में पहुंचाने की बाध्यकारी योजनाएं कार्यरूप में नहीं हैं । कागजी कार्यवाहियां, पानी के संकट से हमें उबार नहीं पायेंगी । दिनों-दिन पक्की होती जा रही जमीनों से पानी जमीन के अन्दर जाता नहीं और यूं ही वाष्प बनकर उड़ जाता है ।
हमें बरसाती पानी के हर बून्द के संरक्षण के बारे में गंमीरता से सोचना चाहिए । हालात चिन्ताजनक हैं और टोटकों से हल नहीं होने वाले हैं । वोट बैंक को लहलहाने के लिए आबादी को नियन्त्रित करने की कोई योजना बनती दिखाई नहीं देती । ऐसे में ज्यादा आबादी के लिए पानी की जरूरतें बढ़ती जायेंगी । दिनोन्दिन कम होते पानी की पूर्ति के लिए जरूरत है तालाबों और झीलों को गहरा और विस्तार दिया जाए । शहरी बस्तियों में पार्को और सार्वजनिक स्थलों पर गहरे तालाबों का निर्माण कर बरसाती पानी को जमा किया जाए । घरों के प्रयुक्त पानी को नालियों में बहाने के बजाए पुन: जमीन में डाल कर संरक्षित किया जाए । बरसाती पानी को संरक्षित कर हम कुओं, तालाबों, झीलों के माध्यम से जमीनी पानी के स्तर को बढ़ा सकते हैं ।

सुभाष चन्द्र कुशवाहा
बी 4/140 विशालखण्ड
गोमतीनगर,लखनऊ 226010

शुक्रवार, 29 जनवरी 2010

शिक्षा से गांव की बेदखली

शिक्षा से गांव की बेदखली
-सुभाष चन्द्र कुशवाहा
नब्बे के दशक से ही गंवई छात्र/छात्राओं के लिए शिक्षा और रोजगार के रास्ते बन्द करने का कुचक्र शुरू हो गया था । तब जो नई शिक्षा नीति लाई गई थी, उसमें मुख्य चिन्ता गांव के युवाओं के विश्वविद्यालयों में पहुंचने के बारे में थी । व्यवस्था को लग रहा था कि गांव के युवा विश्वविद्यालयों में आकर समाजशास्त्र,राजनीतिशास्त्र और अर्थशास्त्र का अध्ययन कर चतुर हो जाते हैं और व्यवस्था के मुखौटे को पहचान लेते हैं । अब नई शिक्षा नीति की जो तस्वीर बनाई गई है, उससे गांव के युवकों को पूरी तरह से बेदखल करने की तैयारी की जा रही है । उस पर तुर्रा यह कि 6 से 14 वर्ष तक के बच्चों को अनिवार्य शिक्षा दी जायेगी । खिचड़ी खिला कर उनका `कल्याण´ किया जायेगा ।
नई शिक्षा नीति को चासनी के साथ, प्रचार,प्रसार कर परोसा जा रहा है । गोया शासन,प्रशासन द्वारा कोई चमत्कारिक कार्य किया जा रहा हो । याथार्थ हमारे सामने है कि गंवई आबादी को विगत तीन दशकों से छला जा रहा है । एहसान दिखा कर उसे ठगा जा रहा है । सर्वोच्च न्यायालय के जज माननीय उन्नीकृष्णन ने 1993 में ही फैसला दे दिया था कि संविधान के अनुच्छेद 45 के अतंर्गत 14 वर्ष तक के बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार है । ऐसे में 14 वर्ष तक के बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा देने के नाम पर 86 वां संविधान संशोधन की क्या जरूरत थी ? दरअसल 86वें संशोधन के अनुच्छेद 21 (क) के अनुसार 6-14 वर्ष की आयु के बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा ``उस रीति से दी जायेगी जो राज्य कानूनन निर्धारित करेगा ।´´ यानी कि अनिवार्य और मुफ्त शिक्षा का मौलिक अधिकार क्या हो, यह तय करने का अधिकार संविधान प्रदत्त न होकर वैसा होगा जैसा सरकार चाहेगी । जाहिर है किसी भी अन्य मौलिक अधिकार के बारे में सरकार को ऐसी शक्तियां हासिल नही हैं । संविधान में लिखित 14 वर्ष तक के बच्चों की जगह `6 से 14 वर्ष तक´ के बच्चों का उल्लेख किया जाना भी अपने आप में विचारणीय है ।
आजादी के साठ वर्षों में प्राथमिक पाठशालाओं को तबाह कर निजी स्कूलों की बाढ़ लाई गई जहां गांव वालों को शिक्षा से बेदख कर दिया गया । तभी तो गरीबों के बच्चे जिन प्राथमिक स्कूलों में खिचड़ी खाने के लालच में पढ़ने जाते हैं वहां कैसी पढ़ाई होती है, एक बानगी देखें । देश के 6,51,064 प्राथमिक स्कूलों में से 15.67 फीसदी प्राथमिक स्कूलों में एक या एक भी शिक्षक नहीं हैं । ये शिक्षक पढ़ाने के बजाए , खाना पकाने की तैयारी में लगे रहते हैं । अपने लाभ के लिए फर्जी हाजिरी बढ़ाते हैं । 1996 में कराये गए छठे सम्पूर्ण भारतीय सर्वेक्षण में बीस फीसदी स्कूलों में सिर्फ दो अध्यापक पाए गए । सातवें सर्वेक्षण में पाया गया कि प्राथमिक स्कूलों के कुल 25,33,205 पूर्ण कालिक शिक्षकों में से लगभग 21 प्रतिशत अप्रशिक्षित हैं । यह विचार करने का विषय है कि जब स्कूलों में अध्यापक ही नहीं होंगे तब क्या खिचड़ी खिलाने से बच्चे पढ़ पायेंगे ? वहीं अब जो नया सुधार किया जाने वाला है, उससे विदेशी विश्वविद्यालयों के लिए देश के दरवाजे खोल कर बची-खुची कसर भी निकाल दी जायेगी । कई दशकों तक प्रौढ़ शिक्षा के नाम पर कितने प्रौढ़ों को साक्षर बनाया गया, यह तथ्य किसी से छिपा नही है । हां इसके नाम पर अरबों रुपए लुटा दिए गए फिर भी अपनढ़, पढ़ न सके। अब सर्वशिक्षा के नाम पर `मिड-डे-मील´ खिलाकर गंवई बच्चों का जैसा भविष्य बनाया जा रहा है, वह भी सबके सामने है । जिन प्राथमिक पाठशालाओं से पढ़कर बच्चे अफसर बनते थे, अब वे पाठशालाएं देखते-देखते तबाह हो गईं । पहले अध्यापकों की नियुक्ति रोकी गई, बाद में एक प्राथमिक पाठशाला में पांच अध्यापकों की जगह एक अध्यापक और एक शिक्षा मित्र को बैठा दिया गया । पढ़ाई का स्तर मात्र इतना रखा गया कि पांचवीं पास बच्चा अच्छर ज्ञान प्राप्त कर ले । उसे शिक्षित घोषित कर दिया जाए । जिससे वह शेष जिन्दगी अनुदानों,राहत,नरेगा वृद्धा पेंशन,विधवा पेंशन आदि के सहारे गुजार दे और एक आदर्श मतदाता बना रहे ।
ऐसा विश्वबैंक के निर्देशों के तहत किया गया है । अब सरकारी शिक्षा व्यवस्था को तबाह कर, निजी शिक्षण व्यवस्था को बढ़ावा देकर, साक्षरता अभियानों,अनौपचारिक शिक्षा और शिक्षा ऋण जैसे चोंचलों से लोगों को भरमाए रखने का कुचक्र किया जा रहा है । अपनी भाषा में शिक्षा ग्रहण की अनिवार्यता को समाप्त कर अंग्रेजी माध्यम से शिक्षा ग्रहण करने की नीति,गंवई समाज को शासन-प्रशन से बेदखल करने की दूसरी नीति है । ऐसे में गांव के नौनिहाल, अफसर क्या चपरासी भी बनने से रहे ।
सर्वशिक्षा की `मिड-डे-मील´ योजना ने गंवई बच्चों का कोई भला नहीं किया है । इसने मात्र गरीबों के आक्रोश को दबाने का काम किया है । गंवई आबादी के साथ यह कैसा मजाक है कि शहरी मांए `पैंरट्स-डे´ पर स्कूलों में अपने बच्चों की `प्रोग्रेस रिपोर्ट´ देखने जाती हैं जबकि गंवई मांओं से कहा जाता है कि-`बारी-बारी मांए आएं,जांचे-परखें तभी खिलाएं ।´ यही है दोहरी शिक्षा व्यवस्था का मूल चरित्र । नई शिक्षा नीति में दोहरी शिक्षा व्यवस्था का नंगापन सामने होते हुए भी अब विदेशी विश्वविद्यालयों को स्थापित करने की बात कही जा रही है । गांव के प्राथमिक पाठशालाओं की शिक्षा का जो स्तर रह गया है, उससे बच्चे माध्यमिक कक्षाओं में पास होने से रहे । लिहाजा नई शिक्षा नीति में बोर्ड परीक्षाओं की अनिवार्यता समाप्त की जा रही है । यानी की डरिए नहीं, फेल होने जैसी समस्या से भी निजात दी जा रही है ।
नई शिक्षा नीति में व्यावसायिक शिक्षा की बात जोर-शोर से उठाई गई है । व्यावसायिक शिक्षा के लिए बैंक ऋण में गरीबों को अनुदान देने जैसी बात भी कही जा रही है । जिस देश के 26 करोड़ लोग ऐसे हों, जिन्हें खाने के लिए दाल ,सब्जी या चटनी में से कोई एक चीज बामुश्किल मिल पाती हो । ग्रामीण क्षेत्रों में 30 प्रतिशत लोगों कि दैनिक उपभोक्ता व्यय 12 रुपए से कम हो, जबकि शहरी क्षेत्र के 30 प्रतिशत लोग, रोजाना खाने-पीने पर 19 रुपए से ज्यादा खर्च नहीं कर पाते हों, 10 प्रतिशत ग्रामीण आबादी ऐसी हो , जिनके पास दैनिक व्यय के लिए 9 रुपए से ज्यादा उपलब्ध न हो , तब ऐसी स्थिति में उन गरीबों के बच्चे लाखों की सलाना फीस वाले किसी व्यावसायिक संस्थान में शिक्षा ऋण पर अनुदान पाकर भी कैसे पढ़ेंगे ? योग्यता की बात करने वाले क्यों नहीं बताते कि गरीब, मेधावी लड़के आई0आई0टी0 या आई0एम0ए0 में चयनित होने पर लाखों की फीस कैसे चुकाएंगे ? क्या इन संस्थानों में चयनित गरीबों को निशुल्क पढ़ाने की व्यवस्था है ? दूसरी ओर यदि आपकी जेब में दौलत है तो आप अपने आवारा और अयोग्य बच्चों को बिना प्रतियोगी परीक्षा पास कराए, `पेड´ सीट पर दाखिला करा सकते हैं ।
दरअसल प्रतियोगी परीक्षाओं का सारा ढ़ांचा पैसे वालों के लिए तैयार किया जा रहा है । देश में खुल रहे महंगें कोचिंग संस्थान और महंगी पुस्तकें गरीबों को दौड़ से बाहर कर रही हैं । मौजूदा हालात में गंवई बच्चों का भविष्य अंधकारमय नज़र आ रहा है । बिना किसी किन्तु-परन्तु के 14 वर्ष तक के बच्चों को उनकी भाषा में मुफ्त और गुणात्मक शिक्षा उपलब्ध कराये और उसके बाद गुणात्मक उच्च शिक्षा के समान अवसर उपलब्ध कराये बिना गंवई बच्चों का भविष्य नहीं संवारा जा सकता । प्रचार के लिए स्कूल बनवा देने से गंवई बच्चों का भला नहीं होने वाला है ।


सुभाष चन्द्र कुशवाहा
बी 4/140 विशालखण्ड
गोमतीनगर
लखनऊ 226010

रविवार, 24 जनवरी 2010

आशा


कविता की एवं मेरी रचना की पहली किताब

कैद में है जिंदगी


कैद में है जिंदगी,कविता संग्रह की भूमिका त्रिलोचन जी ने लिखी है ।

जातिदंश की कहानियां


20 महत्वपूर्ण कहानिकारों की कहानियां
सामयिक प्रकाशन

लोकरंग-1


लोकसंस्कृतियों के निरूपण का विनम्र प्रयास
28 महत्वपूर्ण लेखकों की रचनाएं

शनिवार, 23 जनवरी 2010

सपने जो खुदकुशी तक ले जाते हैं

सपने जो खुदकुशी तक ले जाते हैं
हाल-फिलहाल बच्चों और युवाओं में आत्महत्या करने की प्रवृत्ति बढ़ी है । मुम्बई जैसे अति आधुनिक महानगरीय संस्कृति से लेकर लखनऊ जैसे आधुनिक और पुरातन संस्कृति के बीच पले-बढ़े बच्चों में भी, सात साल के अबोध और 25 साल के शिक्षित युवाओं में भी । किशोरावस्था की दहलीज पर पहुचने वालों से लेकर, युवावस्था तक के छात्र, अपनी जिन्दगी से निराश होकर और उससे जूझने का हौसला खोकर, स्वयं को खत्म कर लेना मुनासिब समझ रहे हैं । अभिभावक हैरान, परेशान हैं । कहां है खोट ? कौन निगल ले गया सुख-दुख में जिन्दगी से जूझने की क्षमता को ? अपने ही लाड़लों को समझने-बूझने में चूक रहे हैं माता-पिता । मनोचिकित्सकों के सामने नई उपजती ग्रन्थियों को समझने, सुलझाने की चुनौतियां आ खड़ी हुई हैं । समाचार पत्रों में हर रोज आत्महत्या की खबरें आ रही हैं । आखिर इस आत्मघाती समाज के बीज, बाजारवाद के गर्भ में तो नही पल-बढ़ रहे ? आत्महत्या करने के जो कारण दिखाई दे रहे हैं, वह `सुपर मैन´ `अवतार´, हैरीपाटर´ जैसी चमत्कारी या जादुई यथार्थ को आत्मसात करने वाली शहरी पीढी को झुग्गियों में पलने वाली पीढ़ी जैसी आत्मबल भी प्रदान नहीं कर पा रही है ।
कुछ आत्महत्याओं के पीछे शिक्षा और परीक्षा का दबाव है तो कुछ के पीछे मात्र अभिभावकों की सामान्य सी डांट, अपने या सहपाठियों की उपेक्षा या अंग्रेजी भाषा का अभाव । ऐसे कारणों से आत्मघाती निर्णय तक पहुंचने वाली यह पीढ़ी, अपने मां-बाप, भाई-बहन के प्यार और उन पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों की परवाह नहीं कर रही । यानी कि हमने नितान्त आत्मकेन्द्रित, आत्मजीवी पीढ़ी की बुनियाद रख दी है और शायद यही बाजारबाद की मूल आत्मा भी है । हमारे नौनिहालों में, एक भरी-पूरी जिन्दगी को अपने ही हाथों खत्म करने की प्रवृत्ति का यूं बढ़ जाना चिन्ता का विषय होना चाहिए । पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था और उसके सामानान्तर निर्मित हो रही वैश्विक संस्कृति, जिसमें हमारी शिक्षा प्रणाली भी है, कि क्रूरता, निरर्थकता की पड़ताल होनी चाहिए । किशोरों और युवाओं के भविष्य के जो सपने हम तैयार कर रहे हैं, उसमें व्याप्त खोट की पड़ताल होनी चाहिए । करियर का जो अत्यधिक दबाव हम उन पर थोप रहे हैं, उनसे उनका बचपन या किशोरापन छीन रहे हैं, उनकी अव्यावहारिकता की भी समीक्षा होनी चाहिए । इस नई पीढीं के सामने हम जो आदर्श प्रस्तुत कर रहे हैं, वे कितने वाजिब या गैर वाजिब हैं, नई पीढ़ी की आत्महत्या करने की परिणति देख, मूल्यांकन किया जाना चाहिए । युवा पीढ़ी, इस अवसादग्रस्तता के लिए कत्तई जिम्मेदार नहीं है । समाज का नया ढांचा जिसमें विकास का नया ढ़ांचा शामिल है, जिम्मेदार है । ऐसी अवसादग्रस्त दुनिया की बुनियाद हमने स्वयं रखी है ।
बाजार का सबसे अधिक दबाब बच्चों और युवाओं पर है । आज की सम्पूर्ण आर्थिक और सामाजिक व्यवस्था, युवा पीढ़ी या बच्चों को ध्यान में रखकर बनाई जा रही है । आर्थिक लाभ के लिए इन्हें गैर जरूरी प्रवृत्तियों की ओर ढकेला जा रहा है । बच्चे बाजार के सबसे महत्वपूर्ण अंग बना दिए गए हैं । जादुई तिलिस्म और महत्वाकांक्षी दुनिया की तस्वीर के अलावा जिन्दगी के वास्तविक यथार्थ उनके सामने दिखाये, बताये नहीं जा रहे । उनके सामने सब कुछ हासिल करने का ख्वाब दिखाया जाता है, वह भी बिना संघर्ष किए, बिना असफल हुए । असफलता भी सफलता के लिए जरूरी है, आज की पीढ़ी को स्वीकार्य नहीं ।
इस युवा पीढ़ी के सामने हमने नितान्त व्यक्तिक और बाजारू दुनिया खड़ा कर दिया है । हम सुख-सुविधाओं के पीछे भाग रहे हैं । हमारे पास ठहर कर सोचने, कुछ पल सुकून से जिन्दगी जीने का समय नहीं है । विकास हमें दौड़ा रहा है और हम भाग रहे हैं । इस भागा-भागी में मां-बाप, भाई-बहन, रिश्ते-नाते, गांव-देहात, पास-पड़ोस और यहां तक की राष्ट्रीयता का भी कोई मूल्य नहीं रह जाता है । हमें लगता है कि इस गलाकाट प्रतियोगिता में जरा-सी देरी या चूक सतरंगी दुनिया से बेदखल कर सकती है और हमें आर्थिक नुकसान पहुंचा सकती है । इसलिए हम केवल पैसा बनाने की मानसिकता में जी रहे हैं । हमारे पास साहित्य, संगीत, कला और संस्कृति के लिए समय नहीं है । हम अपने बच्चों को सामाजिक परिवेश से जोड़ने के बजाय, नितान्त व्यावसायिक मानसिकता में ले जा रहे हैं और गैर जरूरी दबाव बनाकर उन्हें सिर्फ चमकते बाजार का हिस्सा बनाना चाहते हैं । हम उन्हें बाजार में ऊंचे दाम पर बिकते देखना चाहते हैं । उन्हें समय से पहले हॉस्टल में डालकर अकेलापन दे रहे हैं । परिवार से कट कर स्वयं की अलग दुनिया बसा लेना, परिवार की अन्तरंगता से विमुखता, रिश्तों में ठण्डापन का होना, बाजारीकरण के बुनियादी तत्व बताए जा रहे हैं । बाजारीकरण, संघर्षशीलता का पाठ पढ़ाने के बजाए, पैसे से सबकुछ हासिल करने, धूर्तता, ठगी या छीनाझपटी को कोई अवगुण नहीं बता रहा है । मनोकांक्षाओं का विस्फोट, सब्र की समाप्ति और सामाजिकता का लोप, बहुत हद तक इसके लिए जिम्मेदार है । इस पीढ़ी के ऊपर कृत्रिम बाजार का, नई चहकती दिखती दुनिया के ग्लैमर का, कल्पनालोक का ऐसा आकर्षण पैदा कर दिया गया है, गोया इसके इतर जिन्दगी बेकार है ।
जिन्दगी को भोगने की प्रवृत्ति और दायित्वबोध की समाप्ति, युवाओं को विपरीत स्थितियों से उबारने में अक्षम बना रही है । बाजारवाद ने आज जिस समाज की रचना की है, वहां संवेदना, सम्बंध, समाजिकता का कोई मतलब नहीं रह गया है । हर कोई उपभोक्ता है । हर कोई अपने लिए जी रहा है । हम भूखों का रुदन नहीं देखते, सिर्फ सेंसेक्स का ग्राफ देखते हैं । जबकि इसी दुनिया में करोड़ों लोग भूखे रहते हैं, आधा पेट खाते हैं, उनके पास रहने को घर नहीं है पर वे आत्महत्या नहीं करते । जिन्दगी से जूझने की विकट क्षमता है उनमें । जो बाजार से नहीं जुड़े हैं वे सबसे जुड़े हैं ।
जो लोग संघर्षशील जिन्दगी जीते हैं, उनकी संवेदना मरती नहीं है । वे अपने सामने आईं विपरीत परिस्थितियों से लड़ लेते हैं । दूसरी ओर समाज का जो वर्ग सिर्फ हवा में उड़ना जानता है, वह भी उधार के या नकली डैनों से, वह हल्के तुफानों में भी नीचे टपक पड़ता है । मात्र नब्बे या निन्यानबे प्रतिशत अंक पाना सफलता का पैमाना होता तो न्यूटन, गैलीलियो, आर्किमिडीज, जेम्सवाट जैसे सामान्य विद्यार्थी आज वैज्ञानिकों की सूची में न होते ।
दरअसल यह नई अर्थव्यवस्था, सुविधाओं का अंबार लगा कर मनुष्य विरोधी होती जा रही है । यह मनुष्यता की कीमत पर समाज का निर्माण कर रही है । किताबों का बोझ बढ़ाकर बच्चों को दादा-दादी, मां-बाप, घर-परिवार, खेल-कूद सबसे काट रही है । घर के कोने में रखा बुद्धू बक्सा, कार्टून फिल्मों से बच्चों को संवेदनहीन बना रहा है । अब बच्चों के आंखों में आंसू नहीं दिखते । मां-बाप के बीमार पड़ने पर सिर्फ फोन पर हिदायत, सलाह देकर अपने दायित्व की इतिश्री कर लेते हैं । जब अपनों से संवादहीनता की स्थिति बनती जा रही हो तब इस समाज की नई पीढ़ी असफलता का दर्द किससे बांटेगी ? इन्टरनेट से ?
इसलिए आज की पीढ़ी को टूटने से बचाने के लिए जरूरी है, हम विकास के सारे मॉडलों की पुन: समीक्षा करें । प्रगति, जिन्दगी से बड़ी नहीं होती । तमाम सामाजिक कार्यो द्वारा जिन्दगी को सार्थक और संवेदनशील बनाया जा सकता है । सार्थक और संवेदनशील जिन्दगी के मायने समझ लेने वाली समाज की नई पीढ़ी न तो अवसादग्रस्त होगी और न आत्महत्या करेगी ।

सुभाष चन्द्र कुशवाहा
बी 4/140 विशालखण्ड
गोमतीनगर, लखनऊ ।

बुधवार, 20 जनवरी 2010

अंधविश्वास और मीडिया की दायित्वहीनता

अंधविश्वास और मीडिया की दायित्वहीनता
सुभाष चन्द्र कुशवाहा
आज समाज की सोच, संवेदना और बौद्धिकता को सबसे अधिक मीडिया प्रभावित कर रहा है,खासकर दृश्य मीडिया । उपभोक्तावादी दौर में साहित्य, दर्शन और इतिहास की उपेक्षा, साथ ही साथ उपभोक्तावाद को फैलाने में जनमानस की बुद्धि पर नियन्त्रण का काम मीडिया के द्वारा ही सम्भव हुआ है । मीडिया अपने सामाजिक दायित्वों से मुक्त हो,टी0आर0पी0 के चंगुल में जा फंसा है । उसने जनता को जितना दिया है,उससे कहीं अधिक उसका नुकसान किया है । चूंकि वह धनबल से संचालित है इसलिए समाज उसके लिए मात्र उपभोक्ता है । वह ऐन-केन प्रकारेण मुनाफा कमाना चाहता है । सत्य-असत्य के विश्लेषण में समय बर्बाद करने का वक्त नहीं है यह । और न यह मीडिया के एजेण्डे में है ।
मीडिया द्वारा तर्क यह दिया जा रहा है कि दर्शक जो देखना चाहते हैं, वह दिखाया जा रहा है । सवाल तो यह भी है कि दर्शकों की राय,चाह जानने का तरीका क्या है ? दर्शकों की बेहतर राय, सोच और चाह के निर्माण का दायित्व क्या मीडिया का नहीं है ? दर्शकों का एक वर्ग अगर ब्लू फिल्में देखना पसन्द करे तो मीडिया क्या उसे भी परोसेगा ? दरअसल यह उत्तर निहायत गैर जिम्मेदारी भरा और उपभोक्तावादी नज़रिए से युक्त है । मीडिया ने आज दर्शकों को वहां लाकर खड़ा कर दिया है जहां उनकी बुद्धि का अपहरण करना बेहद आसान हो गया है । धर्म और आस्था का इस काम में बेहतर इस्तेमाल किया जा रहा है । ऐसे दौर में अंधविश्वासों को पुख्ता करने, समाज को वैज्ञानिक ताने-बाने के झांसे में उलझाकर अंधविश्वासी बनाने का कार्य मीडिया बखूबी कर रहा है ।
कितनी अजीब बात है कि सारे सत्य आंखों के सामने होने के बावजूद,ठगी-दर-ठगी के हम शिकार होते जा रहे हैं । अंधविश्वासों की वास्तविकता देखने के बावजूद पुन: अगले अंधविश्वास में उलझा दिए जा रहे हैं । देशभर में फैले सूखे पर मेंढ़क-मेंढकी विवाह, यज्ञ, हवन, नंगी औरतों के हल चलाने जैसे जो तमाम टोटके हुए, उनसे तो मानसून प्रभावित नहीं हुआ ? फिर सत्य उद्घाटित करने का दावा करने वाला मीडिया इन टोटकों के खिलाफ मुहिम क्यों नहीं छेड़ा ? वह तो अब भी तमाम चैनलों पर टोटकों की दुकानें खोले समाज की बुद्धि पर डाका डाल रहा है ।
समाज में चमत्कारिक पत्थरों को बेच कर जनमानस के कल्याण के दावे तो पहले से होते आए हैं । अब इन चमत्कारिक पत्थरों को बाकायदा टी0वी0 पर दिखाकर, दावे सम्बंधी झूठे विज्ञापनों और कुछ महानुभावों का अनुभव दिखा-बता कर दर्शकों को ऐसे पत्थरों को खरीदने के लिए उत्प्रेरित किया जा रहा है । मूंगा, लहसुनिया, गोमेद, माणिक, मोती, पुखराज, सुनहला, नीलम, पन्ना अदि रु0 2100 से लेकर रु0 2400 तक टी0वी0 के माध्यम से बेचे जा रहे हैं ।
रक्षा कवचों की तो बाढ़ आई हुई है । शुरुआत तो `रूद्राक्ष रक्षा कवच´ से हुई थी । अब नित्य नए रक्षा कवच प्रकाश में आ रहे हैं । दावे तो इतने बढ़े-चढ़े हैं कि लगता है मात्र तरह-तरह के रक्षा कवचों के सहारे ही जिन्दगी ऐशो आराम से गुजर जायेगी । एक चैनल `नज़र सुरक्षा कवच´ बेच रहा है और दावा कर रहा है कि दुनिया भर के वैज्ञानिकों ने उसके रक्षा कवच को बुरी नज़रों से बचाने में प्रभावी माना है । दुनिया के ये कौन से वैज्ञानिक हैं और कहां रहते हैं,चैनल के पास इसका जवाब नहीं है । तीस दिन में लाभ प्राप्त न होने पर पैसा वापस करने का दावा किया जा रहा है । ये रक्षा कवच, व्यवसाय में लाभ दिलाते हैं, नए रिश्ते बनाते हैं, प्रेमिकाएं उपलब्ध कराते हैं, वेतन बढ़ाते हैं और न जाने क्या-क्या लाभ दिलाते हैं । `नज़र सुरक्षा कवच´, `शिव शक्ति सुरक्षा कवच´, `शनि सुरक्षा कवच´,`शनि वाहन रक्षा कवच´, `हनुमान रक्षा कवच´, `दुर्गा रक्षा कवच´ और न जाने कितने प्रकार के रक्षा कवच रु0 2500 के आसपास बेचे जा रहे हैं । जाहिर है दो जून की रोटी का जुगाड़ न करने वालों के लिए ऐसे रक्षा कवच नहीं हैं ।
रक्षा कवचों पर आस्था न रखने वालों के सम्बंध में बर्बादी की खौफनाक बातें बताई जाती हैं । बताया जाता है कैसे अविश्वासी का जीवन नरक तुल्य हो गया । दर्शकों को बताया जाता है कि इन रक्षा कवचों के सहारे हर प्रकार का लाभ कमाया जा सकता है । फिर तो इस देश की गरीबी, दुर्दशा, लाचारी, भुखमरी देखकर हमें आश्चर्य चकित होना चाहिए । मीडिया में छाये रहने वाले इन रक्षा कवचों को आम जनता में बांट कर करोड़ों रुपयों की लागत से चलाई जाने वाली तमाम विकास योजनाओं, अस्पतालों, वैज्ञानिक संस्थानों से बचा जा सकता है । देश को इन तान्त्रिकों, बाबाओं और ठगों के हवाले कर हमें निश्चिन्त हो जाना चाहिए । अगर नहीं तो फिर यह पूछा जाना चाहिए कि मीडिया के सहारे इन ठगों को जनता को ठगने की इजाजत कैसे मिली हुई है? ऐसे अंधविश्वासी समाज का निर्माण कर क्या मुल्क तरक्की कर सकता है ? क्या अभी सदियों तक हम ऐसे ही ठगों के रहमों -करम पर ज़िन्दा रहेंगे ?
विडंबना तो यह है कि हर रक्षा कवच अपने को श्रेष्ठ बता कर दूसरे की असलियत की पोल स्वयं खोल रहा है । दूसरों को बेकार और अपने को श्रेष्ठ बता रहा है । इसके बावजूद मीडिया के विज्ञापनों, विज्ञापनों में दिखने वाले चमत्कारिक बाबाओं और देवी-देवताओं के नामों का इस्तेमाल कर ये ठग जनता को भुलावे में लेने में सफल हो रहे हैं । वास्तुशास्त्र वाले जहां वास्तुदोषों को दूर करने के लिए रसोई घर,बाथरूम आदि की तोड़फोड़ करा कर वास्तु दोषों को दूर करने के तरीके बता रहे हैं तो वहीं रक्षा कवच बेचने वाले दावा करते हैं कि शिव शक्ति सुरक्षा कवच घर पर लगाने से स्वत: सारे वास्तुदोष दूर हो जाते हैं । यानि की तोड़फोड़ कराने की जरूरत ही नहीं । अब यह दर्शकों की बुद्धि पर निर्भर है कि वे वास्तुशास्त्र के बल पर जियें या रक्षा कवचों के सहारे । कहा जा रहा है कि शनि नाराज हो जाएं तो राजा को भिखारी और भिखारी को राजा बना देते हैं । क्या शनि इतनी गैर जिम्मेदारी का व्यवहार करते हैं ? राजा को रंक और रंक को राजा बनाने का कोई तार्किक कारण तो होना ही चाहिए ? दरअसल इस उपभोक्तावादी दुनिया में यह सब ठगों की चाल है जो मीडिया के सहारे अपनी दुकानें सजाए, लाभ कमा रहे हैं। । आम लोगों का भविष्य संवरे या न संवरे, इन ठगों का भविष्य तो संवर ही रहा है । मीडिया को भी लाभ कमाना है चाहे दर्शक ठगे जाएं या अंधविश्वासों के चंगुल में फंस कर रह जाएं, उसकी कोई जवाबदेही नहीं है । ऐसे समय और दौर में मीडिया को कोई हक भी नहीं बनता जो अपनी विश्वसनीयता का दावा करे,किसी ठगी का पर्दाफाश करे और दूसरों की विश्वसनीयता या ठगी पर सवाल उठाए । जब वह स्वयं समाज को ठगने का वाहक बना हुआ है तो फिर समाज की बौद्धिकता के निर्माण के लिए हमें दूसरे विकल्पों का सहारा लेना ही पड़ेगा । चूंकि ऐसे विकल्प सीमित हैं, इसलिए यह सम्भव है कि आने वाले दिनों में विज्ञान की तमाम प्रगति के बावजूद वृहत् समाज अंधविश्वासी समाज में तब्दील होता जायेगा । इस अंधी सुरंग से निकलने का रास्ता जनआन्दोलनों से ही सम्भव है । अब देखना है कि उपभोक्तावाद, जिसने तमाम जनआन्दोलनों की हवा निकाल दी है, उसके खिलाफ कब और कैसे कोई जनचेतना विकसित होती है ।

सुभाष चन्द्र कुशवाहा
बी 4/140 विशालखण्ड
गोमतीनगर,लखनऊ 226010

रविवार, 1 जुलाई 2007

बुधवार, 23 मई 2007

कथा में गांव


हिंदी साहित्य कि किताब जिसमें गांव के दुःख-दर्द,गांव कि समस्याओं को जाना,समझा जा सकता है
मुख्य साहित्यकार-संजीव, मैत्रयी, पुन्नी सिंह, सुभाष चंद्र कुशवाहा,जयनंदन,महेश कटारे,हरी भटनागर, जयनंदन, मिथिलेश्वर ओमप्रकाश वाल्मीकि और अन्य कहानीकार। पुस्तक खरीदने के लिए मेल करें sckushwaha@rediffmail.com

कहानी संग्रह- हाकिम सराय का आख़िरी आदमी


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