गुरुवार, 3 नवंबर 2011

साहित्य में आरक्षण की बात या आरक्षण का विरोध

अजीब विडंबना है कि समाज के सृजनात्मक क्षेत्रों में घटकवाद, क्षेत्रवाद, संप्रदायवाद और जातिवाद ने न केवल गहरी पैठ बनाई है अपितु तथाकथित मार्क्सवादियों को भी इस कदर अपनी गिरफ्त में ले लिया है कि उन्होंने जीवन के उत्तरार्द्ध में आते-आते अपने छद्म और सृजनात्मकता को किनारे रख, सीधे-सीधे जातिवादी एजेंडे को उजागर करना शुरू कर दिया है, गोया अब चूके तो पीढि़यां शायद गद्दार कह दें । डा0 रामविलास शर्मा भी अंततः इसी एजेंडे को छुपा न पाये थे और आज नामवर जी सामाजिक आरक्षण के बहाने बोल कर भी अबोले रहना चाहते हैं या राजनैतिक लोगों की तरह कह कर कहना चाहते हैं कि- मेरे कहने का गलत अर्थ लगाया गया है । मेरा कहने का मतलब यह था कि मैं साहित्य में आरक्षण का विरोधी हूं, दलितों और पिछड़ी जातियों को मिलने वाले आरक्षण का नहीं । नामवर जी महान हैं और उन जैसे महान लोग जैसे चाहें वैसे बातों को धार देने की कला रखते हैं । आरक्षण विरोधी होने के बावजूद बात पलटने का अधिकार उनके पास आरक्षित है । तब मन में विचार उठता है कि यूं ही कोई नामवर नहीं होता ? अब यह बात हजम नहीं होती कि अगर नामवर जी के कहने का आशय साहित्य के आरक्षण से था तो फिर बाभन-ठाकुर के लड़कों की भीख मांगने तक की नौबत आ गई है, कहने की सार्थकता या तात्पर्य क्या था ?

समाज का आर्थिक ढांचा जिस ढ़ंग से गैरबराबरी का होता जा रहा है उसमें किसी भी जाति या वर्ग के कमजोर तबके के लिये जीना मुश्किल होता जा रहा है, इसमें बाभन-ठाकुर जाति के लोग भी होंगे और बहुतायत में पिछड़े और दलित भी । पर नामवर जी की बात का यह तात्पर्य तो कतई नहीं था । नामवर जी हमेशा सचेतन रूप से शगूफा छोड़ते हैं । उन्होंने सोच-समझ कर ही प्रगतिशील लेखक संघ के 75वें अधिवेशन को चुना था । अगर नामवर जी के कहने का आशय साहित्य में आरक्षण से था तो इसके कारक कौन है ? अगर नामवर जी की जातिगत भाषा में सवाल करूं तो क्या वे दलित हैं ? फिर कौन ऐसे आरक्षण का नेतृत्व कर रहा है ? साहित्य के सत्ता केन्द्रों पर कितने गैर नामवरी लोग बैठे हैं ? अब तक किन की कहानियों को उछाला गया है और किनको पुरस्कृत किया गया है ? विश्वविद्यालयों की नियुक्तियों में महान साहित्यकारों ने चयन समितियों में अपना स्थान बनाकर किन्हे चुना है ? किन्हे, किसके द्वारा पी0एच0डी0 की उपाधि दिलाई गई है ? शायद नामवर जी यहां उनकी जाति न देखना चाहेंगे । क्योंकि तब वे माक्र्सवादी बन जायेंगे । तब वह वर्ग आधारित समाज की बात पर आ जायेंगे और जाति आधारित समाज की वकालत करने से परहेज करने की बात करेंगे । अगर उनकी जाति देख ली जाये तो तमाम महान लोगों को नंगे होने में ज्यादा समय न लगेगा ।

नामवर जी की वाक् पटुता, स्मृति क्षमता और बौद्धिकता की हम सभी इज्जत करते हैं और उन्हें सुनने जाते भी हैं । पर बदले में नामवर जी से क्या मिलता है ? अपनी कुलीनता का लबादा ओढ़े वह हर सम्मेलन के केंद्र में बने रहते हैं या रहना चाहते हैं । वह अपनी बात कह उठ जाते हैं । दूसरों की सुनते नहीं और उद्घाटन, समापन तक सीमित रहते हैं । प्रलेस में भी उन्होंने यही किया । अपनी बात कह उठ गये, लौटे समापन करने । बाकी साहित्यकारों की बातें उनके काम की न थीं । कुलीनता की यही प्रवृत्ति होती है ।

प्रगतिशील लेखक संघ के 75वें अधिवेशन में जाने का और बोलने का मौका मुझे भी मिला था । नामवर जी ने वीरेन्द्र यादव के जिस आलेख को असत्य, तोड़-मोड़ कर पेश करने वाला बताया है वह गले नहीं उतरता । नामवर जी ने दलित विमर्श और स्त्री विमर्श पर भी अपनी बात रखी थी । उन्होंने कहा था कि गैर दलित, दलित संवेदना को क्यों नही उद्घाटित कर सकता ? जाहिर है उनकी इस बात का विरोध नहीं किया जा सकता । मैंने अपने वक्तव्य में यह सवाल उठाया था कि नब्बे के बाद गैर दलितों ने दलित विमर्श से इसलिये किनारा कर लिया क्योंकि दलितों का भोगा हुआ यथार्थ, दूसरों की तुलना में ज्यादा प्रभावी और उद्वेलित करने वाला था । इससे छद्म मार्क्सवादियों की कुलीनता को झटका लगा था और प्रतिक्रिया स्वरूप उन्होंने दलित संवेदना को विषय बनाना छोड़ दिया । मुझे ही नहीं, तमाम लोगों को नामवर जी की आरक्षण के संबंध में की गई टिप्पणी हैरान करने वाली लगी थी । यह और बात है कि कुलीन तबके ने हमेशा की तरह चुप्पी साधना बेहतर समझा । नामवर जी अपने आरक्षण विरोधी बात को अब वर्ग आधारित समाज की बात बता रहे हैं । जब मैं ‘जातिदंश की कहानियां’ संपादित कर रहा था तब एक प्रसंग में नामवर जी ने मुझसे कहा था कि उन्होंने जाति और वर्ग पर लिखना छोड़ दिया है । हो सकता है कि उनका आशय यह हो कि अब वह जाति और वर्ग पर लिखना छोड़, बोलना शुरू कर दिया है । संभव है नामवर जी को यह याद न हो । क्योंकि महान लोगों को इतनी छोटी बातें याद नहीं रहती ।

नामवर जी दलित विमर्श और स्त्री विमर्श का मजाक उड़ाने के बाद कह रहे हैं कि उन्होंने रचनाओं की गुणात्मकता की बात कही थी । बेशक गुणात्मकता की बात हो तो किसी को क्या आपत्ति ? पर गुणात्मकता का पैमाना ऐसे आलोचकों पर तो नहीं ही होना चाहिये जो साल में छपी सभी कहानियों को पढ़ने के बजाय कुछ चुनिंदा कहानियों पर अपने शिष्यों की राय को राय बना दें ? एक बार कथाक्रम सम्मेलन में नामवर जी के वक्तव्य को याद किया जाये जिसमें उन्होंने कहा था कि सारी कहानियों को पढ़ना संभव नहीं था और उनके एक शिष्य ने कुल बीस कहानियां छांटी थीं और उनमें से उन्होंने कुछ कहानियों को पढ़ा है । मैत्रेयी जी ने उनकी बात पर आपत्ति उठाई थी और कहा था कि उनमें से कोई कहानी किसी लेखिका की क्यों नहीं थी ? दलित लेखक की बात ही छोडि़ये । यही है साहित्य में आरक्षण ।

दरअसल कोई बात संदर्भों से कब कटी बताई जायेगी और कब तोड़-मोड़ कर प्रस्तुत की हुई, कुलीनता और वर्चस्ववादी मानसिकता के अधिकार क्षेत्र में आती है । प्रगतिशील लेखक संघ के 75वें अधिवेशन में नामवर जी ने जो कुछ कहा, उसे हम सभी ने सुना और पढ़ा था । विरोध के स्वर तो तभी उठे थे । नामवर जी ने वीरेन्द्र यादव की बात के खंडन-मंडन में इतना विलंब क्यों कर दिया ? हमें स्वीकार करना होगा कि साहित्य में जातिवादी मानसिकता का एक नया दौर उभार पर है । कमजोर और हासिये के लोगों की बात स्वीकार करने के बजाय समर्थ तबका सीधे-सीधे बेहयाई पर उतर आया है । तभी तो वाराणसी के एक लेखक की बात का उत्तर वाराणसी का ही दूसरा लेखक यह कह कर देता है कि जब ठाकुर की बीवी को ठकुराइन कह सकते हैं तो चमार की बीवी को चमाइन क्यों न कहा जाये ? ऐसी मानसिकता पर शर्म करने के अलावा बचता क्या है ? क्या समाज में ठकुराइन का बोध चमाइन के बोध जैसा निर्मित है ? जो दंभ या कुलीनता का बोध ठकुराइन को प्राप्त है वही चमाइन को दिया गया होता तो यह सवाल उठता ही कहां ?

रविवार, 28 अगस्त 2011

कहीं व्यवस्था के पक्ष में न चला जाये अन्ना आंदोलन


सोवियत संघ के पतन को, पूंजी के समान वितरण जैसे दर्शन का पतन मान कर, महाशक्तियों द्वारा दुनिया में आधिपत्य स्थापित करने के तौर-तरीकों में बदलाव लाया गया । देखते ही देखते पूंजी ने अपने आधिपत्य के लिये खुली अर्थव्यवस्था को धिनौना हथियार बनाया । उसने विकाशसील देशों को एक साथ आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक रूप से लकवा ग्रस्त बनाने की कुचक्र रचा तथा प्रतिकार के जनपक्षधर औजारों को अप्रांसंगिक तथा भोथरा बनाया । भारत में जिस तरह उदारीकरण के प्रति अंधभक्ति दिखाई गई, जिस तरह सत्ता के दम पर संविधान की सार्वभौमिकता को नष्ट करते हुये महाशक्तियों या बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हित में कानून बनाये गये, उससे न केवल भ्रष्टाचार स्वच्छन्द हुआ अपितु सार्वभौमिक भी हुआ । बाजारवाद ने भ्रष्ट्राचार को व्यापक, स्वीकार्य, बनाने में एन0जी0ओ0 का सहारा लिया । एन0जी0ओ0का आगमन, वैचारिक प्रतिबद्धता के घलमेल का कारण बना । वैचारिक प्रतिबद्धता की कमजोरी ने निराशा का वातावरण पैदा किया और संघर्षशील शक्तियों को उनके मूल रास्ते से भटकाया । कुछ ही वर्षों में एन0जी0ओ0 ने जनपक्षधरता का जामा पहन, संघर्ष की वास्तविक जमीन पर कब्जा जमा लिया । यह विडंबना ही है कि भ्रष्टाचार रूपी वायरस को जिन एन0जी0ओ0 ने देशी-विदेशी सत्ता से दलाली और साठ-गंाठ कर फैलाने में साथ दिया वे ही भ्रष्टाचार के विरूद्ध कारगर लड़ाई लड़ने का छद्म रच रहे हैं ।
दुनिया से वैचारिक जनान्दोलनों की हवा निकालने में जनपक्षधर मुखौटे के एन0जी0ओ0 ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है । मोटे तौर पर एन0जी0ओ0 का आगमन समाज को सुधारने-संवारने के लिये नहीं, अतिरेक पूंजी के बंटवारे, उसके हितपोषकों को जनपक्षधर दिखाने या लोकहितकारी बताने के उद्देश्य से हुआ । महाशक्तियों की उदंड पुंजी ने खुली अर्थव्यवस्था का ऐसा व्योमोह रचा कि बड़े-बड़े वामपंथी, चिंतक भुलावे में आये और कहीं-कहीं तो गुणगान करते नजर आये । कुछ जमीनी संघष्र से कट कर एन0जी0ओ0 की ओर सरक गये और कुछ ने वैचारिक संघर्ष के रास्ते को बंद कर यथास्थितिवाद को स्वीकार कर लिया । आज भ्रष्टाचार मुहिम को गैर वैचारिक लोगों द्वारा नेतृत्व देने के पीछे यही कारण है । वैचारिक स्पष्टता के बिना भी इस मुहिम को व्यापक समर्थन मिलने के पीछे खुली अर्थव्यवस्था की वह दरिंदगी है जो अपनों को निगलने से भी परहेज नहीं कर रही है । वैश्विक दबाव इतना है कि सरकारें निम्न और मध्यम वर्ग की भावनाओं से परे काम कर रही हैं । सत्ता सिंघासन पर बैठे लोग विदेशी भाषा, संस्कृति, अर्थनीति और राजनीति से चंद लोगों का हितपोषण कर रहे हैं । लेकिन जब माॅल कल्चर के लुभावने तुरूपों और के0एफ0सी0 के लजीज व्यंजनों के सहारे मध्यम वर्ग को फांसने के हथियार नकारे साबित हो रहे हैं तो वे सड़कों पर उतरने को बेचैन दिख रहे हैं और अन्ना उनके माध्यम बनते हैं ।
आज भारत का मध्यम वर्ग वैश्विक स्वप्नलोक में जीते हुये, उस देशीय लूट को जो उसके हिस्से में आने के बजाय विदेशों में चला जा रहा है देख आंदोलित है तो आश्चर्य की बात नहीं होनी चाहिये । उदारीकरण की लूट, झूठ और फूट तंत्र से दुनिया कराह रही है । ऊंच-नीच की खाइयां बढ़ रही हैं । यह बात मध्य-पूर्व के देशों से लेकर भारत में दिखाई देने लगी है । लंदन के दंगों, ट्यूनीशिया और मध्य-पूर्व के हिलते निजामों, मिस्त्र, अल्जीरिया, सीरिया, सूडान में धधकते जनांदोलनों की आग स्वतः स्फूर्त तो है पर इसका कारण उदारीकरण के गर्भ में छुपा है । नव उदारवादी, पूंजीवादी नीतियों और शासकों के जनतंत्र विरोधी नीतियों से त्रस्त जनता प्रतिरोध के रास्ते पर बढ़ती नजर आ रही है । ये वो लोग हैं जो समान्यतया अपनी दिनचर्या में मशगूल रहते आये हैं और कभी-कभी नवउदारवादी पूंजीवादी छलावे पर इतराते भी रहे हैं । आज वे उस छलावे की असलियत देख रहे हैं । वे इस उदारवादी लूट की अनैतिकता और अमानवीयता से विचलित हो गये हैं । अपने स्वार्थ के लिए हर कुकृत्य को जायज ठहराने वाले तंत्र की नंगई देख रहे हैं । तभी तो वे इस सड़ांध से उठने वाले धुएं को देख आग धधकाने की तमन्ना लिए बढ़े चले आ रहे हैं ।
आज विश्व के तमाम निजामों के लिये राहत भरी बात यह है कि स्वतः स्फूर्त आंदोलनों को वैचारिक दिशा नहीं मिल पा रही । वामपंथियों में बिखराव और भटकाव है और मैकडानल्ड का बर्गर खाये युवाओं में वामपंथ से दुराव भी । ऐसा नहीं होता तो आज भ्रष्टाचार मुक्ति के साथ पूरी दुनिया, आतताई खुली अर्थव्यवस्था से मुक्ति की लड़ाई लड़़ती ।

हमें इस तथ्य को स्वीकार करना चाहिये कि धरती पर सृष्टि के समय से ही अन्याय की सत्ता ज्यादा मजबूत रही है और न्याय की कम । न्याय एक सापेक्ष और परिकल्पित शब्द है । ऊंच-नीच और गैरबराबरी के समाज में न्याय, छलावे के सिवा कुछ नहीं होता और अन्याय की सत्तायें बिना भ्रष्टाचार की खड़ी नहीं होतीं । संभव है आज आर्थिक भ्रष्टाचार का कदाचार शहरी मध्यम वर्ग को इतना जकड़ा हुआ है कि वे उन तमाम भ्रष्टाचार को भ्रष्टाचार मानने को तैयार नहीं हैं जो परोक्ष रूप से व्यापक और कमजोर समाज को प्रभावित कर रहा है । मसलन कि दोहरी शिक्षा नीति की बुनियाद रखने का खेल किसी भ्रष्टाचार से कम है ? आज जिन निजी स्कूली बच्चों के हाथों में अन्ना आंदोलन की तख्तीयां हैं, सिर पर सफेद टोपी हैं और जो चमचमाते स्कूली पहनावे में सड़कों पर दिखाई दे रहे हैं उनके कारण देश के करोड़ों बच्चों के हिस्से में मात्र मिड-डे-मील का भुलावा है । गरीब बच्चे सर्व शिक्षा अभियान के नाम पर कुछ अनुदान, कुछ राहत और नाम लिखना सीख नरेगा मजदूर से आगे नहीं बन पा रहे हैं और संपन्न तबकों के हिस्से में चिकित्सा, इंजिनीयरिंग, प्रबंधन से लेकर तमाम क्षेत्रों की सीटें आरक्षित कर दी जाती हैं । उच्च शिक्षा क्षेत्रों को नकारा साबित करने और विदेशी विश्वविद्यालयों के आगमन के औचित्य को सही बताने के लिये माध्यमिक कालेजों से लेकर विश्वविद्यालयों में अध्यापकों का अकाल पैदा कर दिया जाता है । बाहर से भव्य दिख रहे उच्च शिक्षण संस्थान अंदर से खोखले कर दिये गये हैं और और दूसरे तरीकों मसलन सीट कटौती, फीस बढ़ोत्तरी और पुस्तकालयों की कमी से गरीबों की सरकारी शिक्षण संस्थानों से बेदखली की जा रही है । चिकित्सा क्षेत्र का आलम यह है कि सरकारी अस्पतालों के नाम पर सिर्फ भवन बचे हैं और चिकित्सा के नाम एकाध सर्दी,बुखार की गोलियां । जिनके जेब में पैसा है वे तो पंच सितारा अस्पतालों में काया कल्प करा रहे हैं और गरीबों के हिस्से में गांव के ओझा-सोखा, पीर, मजार हैं । तैंतीस वर्षों से पूर्वांचल का अभिशाप बन चुकी इंसेफेलाइटिस बीमारी से हजारों बच्चे मर चुके हैं । जुलाई से अक्टूबर तक अस्पतालों में बिस्तर नहीं मिलते । फिर भी न तो इसके लिये कोई बड़ा जनान्दोलन हुआ और न सरकारें चेतीं । दरअसल मरने वाले जब दबे-कुचले हों तब मीडिया और सरकारों के मायने बदल जाते हैं । भ्रष्टाचार की वास्तविक लड़ाई, बिना समान शिक्षा और सर्व सुलभ चिकित्सा की लड़ाई लड़े, पूरी हो सकती है ? देश के न्यायालयों में न्याय का गोरखधंधा घूस के अलावा अंग्रेजी भाषा के एकाधिकार के कारण मजबूत हुआ है । देश की अनपढ़ या अल्प शिक्षित जनता ऐसे अदालती कार्यवाहियों को समझने की कूबत नहीं रखती और न यह समझ पाती कि उसके वकील उसकी पैरवी कर रहे हैं या खिलाफत ।
दृश्य मीडिया जो आज भ्रष्टचार मुहिम में अपनी नैतिकता को सबसे ज्यादा प्रमाणित करने में जुटा है यही अंघ विशवासों को फैलाकर गरीबों को ठगने और मरने को मजबूर भी कर रहा है । दिन भर टी0वी0 चैनलों पर तमाम रक्षा कवचों, यथा रूद्राक्ष कवच, हनुमान कवच और शिव कवच, भभूत, अंगूठियों बेचने का काम तो होता है, असाध्य बीमारियों, सभी मुश्किलों, दुखों को दूर करने के पाखंड़ी उपाय बताते दिखते हैं । यानी कि पाखंडियों को महिमा मंडित करने वाला दृश्य मीडिया ही अन्ना हजारे को जबर्दस्त समर्थन देता दिख रहा है । सरकारी विज्ञापनों के लिये चाटुकारिता की हद तक गिरने वाला और माफियाओं के पैसे पर पलने वाला मीडिया स्वयं को जनपक्षधर दिखाने का स्वांग भी रचता है और मौके-बे मौके जनपक्षधरता का गला भी घोटता है । मामला सिर्फ टी0आर0पी0 का है । उसे किसी सरोकार से क्या लेना-देना ?
भ्रष्टाचार के विरूद्ध चलाई जा रही मुहिम और सशक्त लोकपाल की नियुक्ति का समर्थन करने के बावजूद हमें सतर्क दुष्टि अपनाने की जरूरत है । सिर्फ लोकपालों के सहारे भ्रष्टाचार समाप्त नहीं किया जा सकता । एकाध के विरूद्ध कार्यवाही कर कुछ सनसनी खेज समाचार बनाये जा सकते हैं । कोई भी लोकपाल वैश्विक दबाव में तैयार की जा रही सरकारी नीतियों को नहीं रोक सकता । वह दोहरी शिक्षा, चिकित्सा व्यवस्था की मार से गरीबों की हिफाजत भी नहीं कर सकता । ऐसे में इस अंादोलन के सकारात्कम पहलू को समर्थन देने के साथ-साथ उसके नेतृत्व को परम मानवीय बनाने की भूल नहीं करनी चाहिये । व्यक्ति विशेष को देवत्व प्रदान कर पूजने के अलावा और कुछ हाथ नहीं लगता । परम मानव, कुलीनतावाद को जन्म देता है जो अंततः जनविरोधी ही होता है।
अन्ना आंदोलन को मिल रही सफलता, संसदीय व्यवस्था की अनैतिकता में छिपी है । इसी अनैतिकता ने महाशक्तियों के आगे घुटने टेक कर लूट के दरवाजे खोले हैं । कुछ के लिये बहुतों को बर्बाद किया है । संसदीय प्रणाली ने जनपक्षधरता के बजाय, व्यक्तिपरकता को बढ़ावा दिया है। माफिया, गुंडे सत्ता के केन्द्र में ला दिये गये हैं । जनसामान्य के हिस्से में विकल्पहीन वोट के सिवा कुछ नहीं । संसदीय चुनाव मात्र धनबल और बाहुबल से जीते जा रहे हैं और चुन प्रतिनिधि जवाबदेही से मुक्त हो, रातोंरात करोड़़ पति हो रहे हैं । जाली डिग्रीयों, जाली नोट, जाली कंपनियों का बोलबाला है । पैसे के बल पर बाजारवाद में सब कुछ खरीदा जा सकता हैं यहां तक की इमान और न्याय भी । पैसा मनुष्य का नियंत्रक बन बैठा है और विचार निरर्थक । खुलीअर्थ व्यवस्था को स्थापित करने में ये ही कारक महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर रहे हैं । मूल्यपरक जीवन निर्माण के लिये संस्कृति, साहित्य, चैपाल, लोकसंस्कृतियों को तिलांजलि दे दी गई है और कूपमंडूपता के लिये अंधविश्वासों को मजबूत बनाया गया है ।
ऐसे में अन्ना आंदोलन को मिल रहा व्यापक जन समर्थन, वैश्विक अर्थ व्यवस्था के कारण नये मघ्यम वर्ग के अंदर पनपे हताशा, कुंठा और स्वपनलोक को हाशिल न कर पाने की बेचैनी का हिस्सा है । इस मध्यम वर्ग के एक तबके के हाथों में बेशक तिरंगा है पर पैसे और ऐसो आराम के लिये वाशिंगटन और लंदन है । इसका एक तबका देश के पैसे से आई0आई0टी0 कर विदेशों को सेवा देता है और भ्रष्टाचार के विरोध में बोलता भी है । अन्ना आंदोलन में अगर पूरा देश शामिल बताया जा रहा है तो फिर भ्रष्टाचार बैकुंठ में तो है नहीं ? एन0जी0ओ0 गामी आंदोलनों के सहारे भ्रष्टाचार की लड़ाई नहीं लड़ी जा सकती और न इमानदार अधिकारियों को संरक्षण प्रदान किया जा सकता । इसके लिये इस आंदोलन की दिशा और वैचारिकता का मूल्यांकन आवश्यक है । अन्यथा हम कभी मोदी की वकालत करते नजर आयेंगे तो कभी विदेशी पैसे से देशीय लड़ाइयों को व्यवस्था परिवर्तन का नाम देते । लोकपाल की मांग व्यवस्था परविर्तन की मांग नहीं है । यह वही गांधीवादी तरीका है जो अंग्रेजों से कुछ रिआयतें हाशिल कर चुप बैठ जाता या इसे आजादी का नाम दे देता है । बेशक इसे दूसरी आजादी कही जा रही है पर इस आंदोलन में भगत सिंह और गांधी के विचारों में घालमेल पैदा किया जा रहा है । एन0जी0ओ0 यही करते हैं । वे तंत्र के साथ नुक्कड़ नाटकों को स्थापित करते हैं । उनका मकसद तंत्र पर नियंत्रण बनाये रखना और बाजरीकरण को तेज करना ही है । संभव है इस आंदोलन के कुछ सकारात्मक परिणाम निकलें । पर व्यापक जनमुक्ति की लड़ाई, वैचारिक नूतृत्व के बिना और अराजक हो जायेगी । इससे व्यवस्था में कोई आमूल परिवतर्न नहीं होगा । अन्ना हमारे लिये भगवान बना दिये जायेंगे और हम उन्हें पूजते हुये लूटने को अभिशप्त होंगे । जनपक्षधर शक्तियों के लिये यह सीखने और मूल्यांकन कर आगे बढ़ने का समय है । जनता को उनके हाल पर छोड़ देने से ऐसी ही लड़ाइयां जन्म लेंगी जो अंततः व्यवस्था के पक्ष में जायेंगी ।

सुभाष चन्द्र कुशवाहा
बी 4/140 विशानखंड
गोमतीनगर,लखनऊ 226010

रविवार, 12 जून 2011

लोकरंग की आंच : सुभाष चन्द्र कुशवाहा: समय और साहित्य

लोकरंग की आंच : सुभाष चन्द्र कुशवाहा: समय और साहित्य

इस आग की तपिश महसूस कीजिए

उदारीकरण की लूट, झूठ और फूट तंत्र से दुनिया कराह रही है । ऊंच-नीच की खाइयां बढ़ रही हैं । यह बात मध्य-पूर्व के देशों से लेकर भारत में भी दिखार्इ देने लगी है । टयूनीशिया में एक शिक्षित बेरोजगार युवक के आत्महत्या की प्रतिक्रिया में वहां के तानाशाह को देश छोड़ भागना पड़ता है तो समूचा मध्य-पूर्व का निजाम हिलता दिख रहा है । मिस्त्र, अल्जीरिया, सीरिया, सूडान और न जाने कितने नाम धधकने लगे हैं । नव उदारवादी पूंजीवादी नीतियों और शासकों के जनतंत्र विरोधी नीतियों से त्रस्त जनता प्रतिरोध के रास्ते पर बढ़ती नजर आ रही है । अन्ना हजारे जब भ्रष्टाचार के विरोध में भूख हड़ताल पर बैठते हैं तो देखते-देखते हर शहर, कस्बे में लोग घरों से निकलने लगते हैं । ये वो लोग हैं जो सामान्यतया अपनी दिनचर्या में मशगूल रहते आये हैं और कभी-कभी नवउदारवादी पूंजीवादी छलावे पर इतराते भी रहे हैं । आज वे उस छलावे की असलियत देख रहे हैं । वे इस उदारवादी लूट की अनैतिकता और अमानवीयता से विचलित हो गये हैं । अपने स्वार्थ के लिए हर कुकृत्य को जायज ठहराने वाले तंत्र की नंगर्इ देख रहे हैं । तभी तो वे इस सड़ाध से उठने वाले धुएं को देख आग धधकाने की तमन्ना लिए बढ़े चले आ रहे हैं ।
सर्वोच्च न्यायालय कह रहा है कि अमीर और गरीब, दो भारत नहीं हो सकते । बात सुनने में अच्छी लग रही है । मगर हकीकत तो यही है । अब तो खार्इ और गहरी हुर्इ है । और गहरी की जा रही है । शापिंग माल, पब, चियर्स गर्ल संस्कृति के अंदर हजारों लोग भूखों मर रहे हैं । मनरेगा पर करोड़ों लुटा कर भी गांवों की तस्वीर नहीं बदल रही । कन्या धन, विधवा पेंशन, वृद्धा पेंशन, इंदिरा आवास योजनायें गांवों तक जा कर सामंतों या प्रधानों के जेब में जा रही हैं और गांवों में ऊंच-नीच की खाइयां बढा़ रही हैं । पानी संचयन के नाम पर खोदे जा रहे तालाबों में पानी नहीं है और मिड-डे-मील खाने वाले बच्चे पढ़ार्इ का ककहरा भी नहीं सीख रहे हैं । दूसरी ओर वातानुकूलित स्कूलों की भव्य इमारतों में पढ़ रहे बच्चे हैं जो घुड़सवारी, तैराकी ही नहीं सीख रहे, कम्प्यूटर, इंटरनेट से अपना कल संवार रहे हैं । कहने को तो साक्षरता का ग्राफ ऊंचा हुआ है पर ऐसी साक्षरता किस काम की ? ऐसे साक्षर इस देश की राजनीति, अर्थतंत्र और समाजशास्त्र को समझने का ज्ञान नहीं रखते, सिर्फ पाखंडियों के प्रवचन सुनते हैं । ज्ञान का ग्राफ शहर और गांवों के बीच और भी चौड़ी खार्इ खींच रहा है । यानी कि एक साक्षर मात्र नाम लिखने भर को है तो दूसरा के0जी0 वन में ही फर्राटे से अंग्रेजी बोल रहा है । फिर भला दो भारत कैसे नहीं होंगे ? सारी नीतिया ही दो भारत के निर्माण के लिए बनार्इ जा रही हैं ।
सत्ता केन्द्रों के इर्द-गिर्द जो राजनीति हो रही है वह समाज के नैतिक मूल्यों को कुतर रही है । आज की राजनीति के पास मानवीय मूल्यों या नैतिकता के लिए बहुत कम जगह बची है । वोट जब पैसे और गुंडर्इ से खरीदे जा रहे हों वैसे में भला समाजिक मूल्यों की हिफाजत की बात करना मूर्खतापूर्ण जान पड़ेगी । जहां सिफारिशों के लिए उचित-अनुचित का विचार मायने नहीं रखता । हत्यारों को बचाने में राजनीति के उच्च तंत्र काम करते हों, गुंडे कानून को ठेंगा दिखाते हों, न्यायालयों की कार्यप्रणालियां धनिकों के पक्ष में तैयार की गर्इ हों, ऐसे में न्यायप्रिय तंत्र की बात कैसे की जा सकती है ? सांसद और विधायकी पैसे के बल पर हासिल की जा रही है और दूसरी ओर समाज के मानसिक स्तर को इतना गिरा दिया गया है कि पाउच बांटने वाले माननीय बना दिये जाते हैं । जाति, धर्म, आतंकवाद और अंधराष्ट्रवाद के बीच नैतिकता की बात करने वाले हासिये पर डाल दिये जाते हैं, तब पूरे तंत्र में भ्रष्टाचार, अनैतिकता और लंपटर्इ को सफलता का मापदंड मान लिया जाना कोर्इ आश्चर्य की बात नहीं कही जा सकती । ऐसे में समाज घोर निराशा के दौर से गुजरता दिख रहा है । वह ऊपर से जितना शांत दिख रहा है उतना है नहीं । आज अन्ना हजारे की मुहिम को जो सफलता मिलती दिख रही है वह समाज के अंदर पैदा निराशा और सत्ता तंत्र से उठते विश्वास का ही नतीजा है । समाज के तमाम मानसिक विभिन्नताओं और तमाम ऊंच-नीच की खाइयों के बावजूद ऐसी चेतना उपजती दिख रही है जो चुने प्रतिनिधियों को तो इस मुहिम से बाहर कर रही है पर पारदर्शी व्यकितयों को हाथों-हाथ ले रही है । दरअसल यह लोकतंत्रात्मक व्यवस्था के खोखलेपन को स्पष्ट करती दिख रही है । वोट से बदलती सत्तायें जनता को संतुष्ट नहीं कर पा रहीं । सिर्फ मजबूरीवश जनता ऐसे तंत्र के साथ दिखती जान पड़ती है । जैसे ही कोर्इ बयार उसकी हताशा, कुंठा और निराशा की नब्ज पकड, बहना शुरू करती है, जनता सड़कों पर आने को बेचैन दिखती है । उदारीकरण ने जितनी तेजी से अपने पांव फैलाये हैं शायद उतनी ही तेजी से परिवर्तन की बयार तूफान बनने को उमड़-घुमड़ रही है । आप भुलावे में मत रहिये । धुएं को देखिये और जितनी जल्दी हो सके तंत्र के दोगलेपन को नेस्तनाबूद कीजिये । वरना जनता अपना फैसला सुनायेगी और मजबूत से मजबूत तंत्र को सुनामी की तरह उखड़ फेंकेगी । बेहतर होगा कि दो भारत की कल्पना करने वाले जल्द से जल्द इस आग की तपिश को महसूस करें ।
सुभाष चन्द्र कुशवाहा
सृजन
बी 4140 विशालखंड
गोमतीनगर,लखनऊ 226010

समय और साहित्य

अमानवीय समय का साहित्य, साहित्य का अमानवीयकरण करने लगे तो सर्जनात्मकता पर आसन्न खतरे के प्रति हमें सतर्क हो जाना चाहिए । पिछली शताब्दी का अंतिम दशक हिंसा, साम्प्रदायिकता, अमानवीयता को संस्थागत जामा पहनाने, अंधराष्ट्रवाद, लूट और अपराधीकरण को आदर्शवाद बनाने, विचारशीलता और विश्वसनीयता को अविश्वसनीयता की संस्कृति में बदलने का प्रस्थान बिन्दु है जो नर्इ सदी के प्रथम दशक तक आते-आते अपने प्रचंड आवेग में, अपने निर्लज्ज रूप-रंग पर इतराने लगा है । यह वह काल है जो जनपक्षधर लोगों को अपराधपरस्त और अपराधपरस्तों को जनपक्षधर दिखाने, बताने के कुचक्र को संवैधानिक जामा पहनाने लगा है । यह मुनष्यता का 'काल है । यह दौर मनुष्य को मनुष्य से इतर वह सब कुछ बनाने, दिखाने की प्रक्रिया की शुरूआत करता है जिसमें मानवीय संवेदनाओं के लिए जगह न बच पाये । तभी तो आज आंखों के आंसू मर गये लगते हैं । हम लातूर, गोधरा, गुजरात दंगों पर आह भरने के बजाय इस दौर की विश्व सुन्दरियों पर जान निछावर करते नजर आते हैं । यह दौर सात समंदर पार संपर्क कर सकता है पर पड़ोसी का आर्तनाद नहीं सुन सकता । यह दौर हमें अपनी जमीन, बोली-भाषा, संस्कृति या कुल मिलाकर कहें तो भारत से नफरत और इंडिया को मस्त रहने की संस्कृति को मजबूती प्रदान करता दिखार्इ देता है । यह आम और खास में फर्क करने का दौर है । संचारक्रांति का आक्रमण, आम और खास के बीच इतनी दूरी बढ़ाता जा रहा है कि अतीत की दास प्रथा शर्मिंदा नजर आ रही है । यह दौर इस मायने में वैशिवक है जिसमें पूंजी अपनी गुंडागर्दी और उदंडता से सब कुछ खरीद सकती है । उसकी नजर में सब कुछ बिकाऊ है जहां हम अपने परिवेश को बेचकर, 'स्व खरीदना चाहते हैं । अपने इतिहास और भविष्य की कीमत पर वर्तमान भोगना चाहते हैं । वैश्वीकरण में कोर्इ सगा नहीं है । यहां अपने हित के लिए दूसरे का अहित कोर्इ अपराध नहीं है । यहां मानवीय संवेदनायें जीवन-मरण से रिश्ते जोड़ने के बजाय चंद लम्हों के लिए इंटरनेट पर समय बिताने तक की प्रक्रिया में तब्दील होती दिखती हैं । यह र्इ-मेल, चैटिंग, एस0एम0एस0, डिजिटल और मोबाइल की चहकती दुनिया है जो गांवों को अपनी गिरफ्त में लेकर, उन्हें उपेक्षित करती है ।
यह दौर श्रम की कमार्इ को पीछे ढकेलता है और ठगी(जिसमें कर्ज, करार, कमीशन और कब्जा की नीति शामिल है), सटटेबाजी और खास तकनीकी कमार्इ को आगे लाता है । बिना हींग-फिटकरी के माल चोखा बनाने का यह दौर है जिसमें तकनीकी ज्ञान में पीछे कर दिये गये समाज के सामने आत्महत्या का विकल्प बचता है । तभी तो इन दशकों में बड़े पैमाने पर किसानों ने आत्महत्या की है । यह दौर बड़े-बड़े मुनाफाखोंरों के लिए प्राकृतिक संपदा के दोहन, पर्यावरणीय संतुलन को तहस-नहस कर कुछ के लिए सबके 'जीवन को कैद कर लेने वाला है । इस दौर में लोकतांत्रिक व्यवस्था में गरीबों के गुर्दे निकाले गये हैं और मजबूरों को अस्पतालों की कीमत अदा न करने पर मरते देखा गया है ।
यह दौर गलाकाट प्रतियोगिता का है । प्रतियोगिता ऐसी जहां असमानता की खार्इ इतनी बढ़ा दी गर्इ है कि एक शख्स पैदल या लंगड़ा कर दिया गया है, दूसरे को बी.एम.डब्लू गाडि़यां थमा दी गर्इ हैं और तब कहा जा रहा है दोनों के बीच लम्बी दौड़ की प्रतियोगिता होगी । जो जीतेगा वह जीवन जियेगा, जो हारेगा उसे शौक से आत्महत्या करने की छूट होगी । ऐसी नीति में वैश्वीकरण का तुर्रा यह कि प्रतिस्पर्धा से गुणवत्ता निखरती है ।
यह दौर संघर्षशील शकितयों को किनारे लगाने, संघर्ष की ऊर्जा को समाप्त करने के अप्रत्यक्ष तरीकों को अपनाने, परिवर्तनगामी नारों, स्वरों को एन0जी0ओ0गामी बनाने और कुछ हद तक इनमें घालमेल पैदा करने का भी है । यह दौर माक्र्सवादी वैज्ञानिक ऊर्जावान विचारशीलता का मजाक उड़ाने का और समाज में हताशा फैलाने का है । इस दौर में चिंतनशील लोगों के दिमाग में यह बात डाल दी गर्इ है कि यथासिथतिवाद समाज की नियति है । बदलाव की विचारधारा एक छलावा है । जबकि यथार्थ हमारे सामने है । भविष्य को अपने इशारे पर चलाने वालों के सामने संकट दिखार्इ देने लगा है । वैश्वीकरण के इन दो दशकों के जाते-जाते मिस्त्र, टयूनीशिया, लीबिया, सीरिया और न जाने कितने नाम उन सारे उदंड विचारधाराओं को ध्वस्त करते दिखार्इ देने लगे हैं जिनको आदर्श बनाकर यह दौर बिगड़ैल सांड़ की तरह कुलांचे भर रहा था । यथासिथतिवाद निरंकुशता की कोख से भले जनमता हो, बहुत दिनों तक वह निरंकुशता के बल पर जिंदा नहीं रह सकता । वह अपने खात्मे का हथियार स्वयं तैयार करता है, यह बात एक बार फिर सिद्ध होती दिख रही है ।
इस बात पर हमें गौर करना चाहिये कि पिछली सदी के अंतिम दशक के प्रारम्भ में भूमंडलीकरण से कहीं अधिक उन्मादी, राष्ट्रवादी साम्प्रदायिकता युवा पीढ़ी के सामने खतरा बन कर आर्इ थी क्योंकि पूर्व के साम्प्रदायिकता के रंग-रूप की तुलना में वह सांस्कृतिक राष्ट्रवाद जैसी विचारधारा से लैस थी । वह उदारता के मुखौटे के भीतर खूंखार थी । उसने संवैधानिकता का जामा भी पहन लिया था । ऐसे समय में भी बिना किसी बड़े जनान्दोलनों की पृष्ठभूमि से सीखे कथाकारों ने उस खतरे को भांपा । सांप्रदायिकता की अंतर्वस्तु- गंवर्इ जातिवाद और छुआछूत को केन्द्र में रखकर शिवमूर्ति(तर्पण), संजीव(योद्धा), ओमप्रकाश वाल्मीकि(छुआछूत) हस्तक्षेप करते हैं । वैचारिक प्रतिबद्धता के क्षरण के शुरूआती दौर में मदनमोहन अपने 'हारू कहानी के माध्यम से हमारे बीच आते हैं । टेक्नालाजी और कला के त्रासद संबंधों को व्यक्त करने वाली मनोज रूपड़ा की कहानी 'साज-नासाज देखने को मिलती है । गांव-गिरांव की कथा-व्यथा को महेश कटारे जैसे कहानीकार अपनी कहानी 'कुआं में और मिथिलेश्वर 'बाबूजी में जितनी संजीदगी से प्रस्तुत करते हैं उतनी ही संजीदगी से देवेन्द्र 'क्षमा करो हे वत्स के माध्यम से बेटे की निर्मम हत्या पर बाप द्वारा कुछ न कर पाने के आर्तनाद और संवेदनात्मक अनुभूतियों को चरम पर ले जाते हैं । इस दौर के दूसरे महत्वपूर्ण कथाकारों में योगेन्द्र आहूजा, कैलासचंद्र, सुभाष पंत और भालचंद जोशी को भी नहीं भूलना चाहिये जो वैशिवक दुनिया की मक्कारियों को अपनी कहानियों में उधेड़ कर सार्थक हस्तक्षेप करते नजर आते हैं । उसी दौर की एक अजीब विडम्बना है कि विचारधारा को 'साहित्य या कला के क्षेत्र में गुण्डागर्दी(वर्तमान साहित्य,जनवरी-फरवरी 2000) कहने वाले उदय प्रकाश जैसे महत्वपूर्ण और बहुचर्चित कहानीकार सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को सचेतन ढंग से अपनी कहानियों में पिरोते हैं जैसे कि 'वारेन हेसिटंग का सांड़ में ।
यह सही है कि सदी के पहले दशक के आस-पास के ज्यादातर युवा कहानीकारों की कहानियों में गांव-गिरांव, भूख और जातिवादी दंश देखने को नहीं मिलता जो समाज की ज्वलंत समस्या है । सुरेश कांटक, वासुदेव, गौरीनाथ और कैलाश बनवासी जरूर कुछ हस्तक्षेप करते हैं और श्रीधरम अपनी कहानी 'नवजात-क-कथा के माध्यम से अपनी बोली-बानी और कथा शिल्प के द्वारा गांव के वर्तमान सवर्णवादी मानसिकता की जड़ता, उसकी विसंगतियों को कथा साहित्य में स्थान देते हैं । सांप्रदाकिता के नये उभार पर युवा पीढ़ी की चिंता जरूर उभरती है परन्तु वैचारिक अस्पष्टता के चलते अपनी सघनता को बिखेर देती है ।
विगत सौ वर्षों की हिन्दी कहानी परंपरा में अधिकांशत: प्रेमचंद की कहानियों ने ही प्रभाव डाला है । 'पंच परमेश्वर का वर्ग चरित्र आज की पंचायती व्यवस्था में और भी मूल्यहीन हुआ है । तब एक होरी आत्महत्या करता है आज हजारों होरी आत्महत्या कर रहे हैं। जीवन संघर्ष और सघन हुआ है । अमरकांत की 'डिप्टी कलेक्टरी, 'जिंदगी और जोंक, शेखर जोशी की 'हलवाहा और 'नौरंगी बीमार है, मन-मसितष्क से उतरती ही नहीं ।
बहुचर्चित युवा कथाकारों की कहानियों से गुजरते हुए हमें यह आभास होता है कि उनके पास निजी भाषा, मुहावरा और कथन का खास लहजा तो है पर कथा में मानवीय संवेदनशीलता और दृषिट का अभाव है । आज युवा पीढ़ी की हिन्दी कहानी में दो धारायें समानांतर चल रही हैं । मैं इसे गैरजरूरी भी नहीं मानता । बात सिर्फ इतनी है कि कलावादी रूझानों को जिस तरह सचेतन ढ़ंग से कुछ मठाधीशों द्वारा आसमान पर बैठाने का कुचक्र रचा जा रहा है और जिस तरह जमीनी कहानियों को सामान्य भाषा और कमजोर शिल्प बताकर खारिज किया जा रहा है, जिस तरह कहानी की सकारात्मक परंपरा को हाशिये पर ढकेलने का काम किया जा रहा है, वह साहित्य के लिए खतरनाक तो है ही, पूरे रचनाक्रम को दक्षिणपंथी रुझानों में संतृप्त करने का प्रयास भी दिखता है । बस इसी हद तक कुछ बहु उछालू कथाकारों में नयापन दिखता है । साहित्य मात्र शब्दों की जुगाली नही है । अगर है तो प्रेमचंद अब तक भुला दिये गये होते । आज कहानी प्रेमचंद की शिल्प और भाषा से बेशक आगे निकल गर्इ हो, सामाजिकता और सरोकारों के क्षेत्र में प्रेमचंद से आगे निकलना अभी भी संभव नहीं हुआ है । कहानियां पढ़ने के बाद देर तक मसितष्क में जिंदा नहीं रह पातीं
कहानी की दूसरी धारा, यथार्थवादी जमीन पर खड़ी है और उपेक्षा के तमाम हथकंडों के बावजूद अपना स्थान हासिल कर रही है । यथार्थ का लेखकीय गल्प कहानी को एकरस, उबाऊ और नीरस बनाने के बजाय संवेदनशील और विश्वसनीय बनाता है । कलावादियों के इस आरोप को कि यथार्थ से मुकित रचनात्मकता के लिए जरूरी है तभी स्वीकार्य किया जा सकता है जब मनुष्यता की बात को हवा-हवार्इ मान लिया जाये और उसको बचाने की प्रासंगिकता को खारिज किया जाये । आज पूंजी की आवारगी ने जो व्यूह रचना की है, उससे मनुष्यता का संकट और गांव का अंधकार और सघन होता जा रहा है । ऐसे में रोम के जलने पर नीरो बंशी नहीं बजा सकता । साहित्य का सामाजिक सरोकारों के इतर कोर्इ स्थार्इ स्थान नहीं हो सकता । चाहें आप इसे कितना ही पीछे ढकेलने की राजनीति कर लें, कालजयीे रचनायें वहीं होंगी जो विचारधारा और सामाजिक सरोकारों की सघन बुनावट लिये होंगी । पंचतंत्र की मिथकीय कहानियां, विशुद्ध गल्प होते हुए भी सामाजिक सरोकारों के साथ गुथी होने के कारण अमर हैं ।
समय, समाज और जिंदगी के दुरूह पेचों को बिना विचारधारात्मक बोध के नहीं समझा जा सकता और केवल समझ ही पर्याप्त तो नहीं ? इन दुरूहता की काट और उससे निकलने की राह भी विचारधारात्मक बोध से ही संभव है । श्रंृखलाबद्ध नाभिकीय विखंड़न की असीमित ऊर्जा मानवता का संहार करती है लेकिन ग्रेफाइट की छड़ों से विखंड़न को नियंत्रित कर हम उपयोगी ऊर्जा पैदा कर लेते हैं । ठीक उसी तरह, वैचारिक दिशा, लेखकीय दायित्वबोध को नियंत्रित करती है और दायित्वबोध से उत्पन्न ऊर्जा, सामाजिक सरोकारों को स्थापित करने में मदद पहुंचाती है । जो लोग 'कला, कला के लिए का राग अलापते है वे प्रतिगामी विचारों के संरक्षण की दिशा में काम करते हैं । वैचारिक लेखन को खारिज करने वाले दरअसल खुद किसी न किसी वैचारिक तंत्र के पक्ष में खड़े होते हैं जहां उन्हें कुछ मान-सम्मान हासिल होता दिखता है और ऐसा कर के वे बहुत हद तक अराजकता के पक्ष में चले जाते हैं । गुजरात के दंगों के बारे में बहुत से साहित्यकारों के वक्तव्यों से यह बात सही भी साबित हुर्इ है । यहां मैं स्पष्ट करना चाहूंगा कि वैचारिक प्रतिबद्धता से मेरा मतलब मात्र 'कामरेड कहने वाली संस्कृति से नही है । देखने को तो प्रगतिशील लेखकों के दाहिने हाथ में भी रक्षासूत्र बंधा दिखता है । शुभ-अशुभ से पुस्तकों का लोकार्पण होता है । प्रात: सूर्य को अघ्र्य दिया जाता है । कर्मकांड़ों पर जान निछावर की जाती है और उस पर तुर्रा यह कि वे समाज को सही रास्ता बताने वाले जीव हैं । विचारधारा खेमेबंदी जैसी चीज भी नहीं है जहां पाँव छुआकर शिष्यत्व प्रदान किया जाये तथा खराब से खराब रचना को विभिन्न कोणों से जाँच-परख कर अदभुत चमत्कार पैदा कर दिया जाये । विचारधारात्मक बोध संवेदनात्मक बोध को सघन बनाने का हथियार है और जिंदगी की समझ को मजबूत बनाने का भी।
मनुष्य-मुनष्य के बीच बनने वाले सभी संबंध, आर्थिक और सामाजिक होते हैं । आर्थिक और सामाजिक संबंध, सामाजिक परिवेश का निर्माण करते हैं । मुनष्य के अंदर मनुष्यता और सामाजिक असिमता के बीज बोते हैं । फिर मनुष्य, मनुष्यता और सामाजिक असिमता की रक्षा के लिए अपने सभी औजारों का उपयोग करता है । उन्हीं में से साहित्य भी एक औजार है । ऐसी सिथति में साहित्य को सामाजिकता से अलग नहीं किया जा सकता । संभव है साहित्य कोर्इ क्रांति न कर पाए, पर जब भी कोर्इ क्रांति या बदलाव होगा, वहां साहित्य बेहतर दिशा या राह दिखाने को मौजूद रहेगा । समाज, संवेदना और साहित्य की अनिवार्यता बनी रहेगी ।

सुभाष चन्द्र कुशवाहा
सृजन
बी 4140 विशालखंड
गोमतीनगर, लखनऊ 226010

शुक्रवार, 25 फ़रवरी 2011

यूं चले गये भाई अनिल सिन्हा




यूं चले गये भाई अनिल सिन्हा? 23 जनवरी के ई-मेल में आप ने वादा किया था कि 25 फरवरी को लखनऊ आ जाऊंगा । आना तो दूर, सदा-सदा के लिए शरीरिक दूरी बना ली । आप थे तो पत्रकारपुरम की ओर अनायास मुड़ जाता था । जाता तो भाभी जी बहुत कुछ जबरदस्ती खिलाती और आप बहुत प्यार से घर-परिवार, देश-समाज, साहित्य-संस्कृति पर बोलते-बतियाते । क्या बताऊं, लखनऊ बसने के बाद, आप का होना, अभिभावक का होना था । इतनी जल्दी टुअर कर चल दिए । जाइए, मैं नहीं बोलता आप से ? यह भी कोई बात हुई । जब मैं बीमार था पिछले दिनों, कितनी बार देखने आये थे आप ? साथ में भाभी जी भी थीं । अब ? कौन देखेगा मुझे । अब तो मुझे पक्का विश्वास है कि आप लोकरंग में भी नहीं आयेंगे । अब तक तो आप आते ही रहे, बेहतर करने के बारे में सिखाते रहे । अब ? क्या करूं फोल्डर से नाम निकाल दूं ? लेकिन दिल में जो कसक है उसका क्या ? दिल के फोल्डर जो आप की स्मृति है उसका क्या ? पटना आपकी कर्मभूमि थी, वहां जाकर आपने चीरनिद्रा ग्रहण कर ली । अब आप के चाहने वाले, आपके संगी-साथियों पर जो बीत रही है उसके बारे कुछ तो विचार किये होते । विगत तीन दिनों से मन खटक रहा था पर एक विश्वास भी कि आप आयेंगे जरूर । कुछ दिन पूर्व ही आप ने 27 फरवरी के कार्यक्रम के लिए मुझसे मैंनेजर पाण्डेय का रेलवे आरक्षण कराने को कहा था जिसे मैंने तत्काल करा कर भेज दिया था । अब आप के कारण वह सब खत्म । संचालक तो आप ही थे ? ऐसा धोखा ? मुझे तो अब भी विश्वास नहीं होता कि आप ऐसा करेंगे ? जाइये मैं आप से नहीं बोलता ... । ----मेरे भा...ई ।

सुभाष चन्द्र कुशवाहा

रविवार, 23 जनवरी 2011

लोकरंग की आंच : सुभाष चन्द्र कुशवाहा: लोकरंग २०११ कार्यक्रम की पूरी जानकारी वेब साइट ww...

लोकरंग की आंच : सुभाष चन्द्र कुशवाहा: लोकरंग २०११ कार्यक्रम की पूरी जानकारी वेब साइट ww...: "पूर्वांचल का चर्चित कार्यक्रम- लोकरंग 2011, का विस्तृत कार्यक्रम उसके वेब साइट पर प्रकाशित कर दिया गया है ।"

लोकरंग २०११ कार्यक्रम की पूरी जानकारी वेब साइट www.lokrang.in

पूर्वांचल का चर्चित कार्यक्रम- लोकरंग 2011, का विस्तृत कार्यक्रम उसके वेब साइट पर प्रकाशित कर दिया गया है ।

शुक्रवार, 24 दिसंबर 2010

लोकरंग की आंच : सुभाष चन्द्र कुशवाहा: फरी,फरुवाही या अहीरऊ और पंवरिया नृत्य

लोकरंग की आंच : सुभाष चन्द्र कुशवाहा: फरी,फरुवाही या अहीरऊ और पंवरिया नृत्य

फरी,फरुवाही या अहीरऊ और पंवरिया नृत्य

अपने आरम्भिक काल से ही अहीर एक जुझारू और घुमन्तू जाति रही है । जिसका मूल पेशा पशुपालन और चरवाही रहा है । पहाड़ी क्षेत्रों के गूजरों की जीवन शैली की तरह अहीरों ने भी आरम्भिक काल में पशुओं को चराने तथा गांव-क्षेत्र की सीमाओं को लांघने का काम किया। पशुचारण के कारण भाग-दौड़, उछल-कूद, पहलवानी और लाठी चलाने जैसे श्रमशील कार्य इन्हें करने पड़े । श्रम की प्रकृति ने इनकी जीवन संरचना और मनोरंजन के तत्वों का निर्धारण किया । यद्यपि कि हर क्षेत्र के अहीरों (यादवों) का काम पशुचारण ही रहा फिर भी स्थान विशेष की प्रवृत्तियों की भिन्नता के कारण छत्तीसगढ़ी यादवों में जन्मा `राउत नाच´ की शैली, भोजपुरी क्षेत्र के यादवों में न आ सकी । यहां नृत्य की दो प्रकार की शैलियां जन्मीं : जांघिया नृत्य और फरी या फरुवाही नृत्य । इन दोनों ही शैलियों में गायकी के रूप में मूलत: बिरहा को ही अपनाया गया । इस प्रकार बिरहा विशुद्ध रूप से अहीरों का गीत है तथा जांघिया और फरी अहीरऊ नृत्य । जांघिया और फरी, दोनों नृत्यों में कलाकारों की कद-काठी की मजबूती, पांवों की चपलता देखते ही बनती है । जांघिया नृत्य में जांघ पर जांघिया पहना जाता है जिसमें टांके गए घुंघरू, कदमतालों, मृदंग/नक्कारा (नगड़िया और टिमुकी) की आवाज पर लयबद्ध हो कर मन और शरीर दोनों को झंकृत कर देते हैं । मुख्य गायक के साथ कोरस गायकों की टीम और नृत्यकारों की चपलता श्रोताओं को मुग्ध कर देती है ।
फरी भी मूलत: अहीर वर्ग का ही नृत्य है । इसमें नक्कारा (नगड़िया और टिमुकी) का प्रयोग तो होता ही है, लोहे के वजनी फालों (फार) का भी प्रयोग वाद्ययन्त्र के रूप में अद्भुत ढ़ंग से किया जाता है । दो फार एक-एक हथेली में होते हैं जो आपस में इस प्रकार टकरा कर बजाये जाते हैं कि श्रोता झंकृत हो जाए । इसलिए इसे फरी या फरुवाही नृत्य कहते हैं । यहां यह भी स्पष्ट कर देना होगा कि फरी नृत्य में घुंघरू, फार, नक्कारा के अलावा करताल का भी प्रयोग किया जाता है । नृत्यकार एक हाथ में करताल बजाते हैं । इस नृत्य में कलाकार उछलते-कूदते, नाचते दूर तक चले जाते हैं और नक्कारे की आवाज पर कदमों की चाल बदलते हुए लौट आते हैं । कभी-कभी जमीन पर तरह-तरह के करतब भी दिखाते हैं । दरअसल फरी नृत्य के भी दो भाग होते हैं । प्रथम भाग में टीम के सदस्य लोहे के फारों को बजाते हुए बिरहा गायकी करते हैं और नक्कारे की बदलती ध्वनियों पर कदम ताल धीमा और तेज कर नाचते-गाते रहते हैं । गायन की जिम्मेदारी फार बजाने वाले सदस्यों की होती है जबकि नृत्यकारों के उछलते, कूदते नृत्य करने के कारण ऐसी स्थिति नहीं होती कि वे गायकी में साथ दे सकें । उनका दम फूल चुका होता है । वे पसीने-पसीने हो जाते हैं । उनकी कमर की लचक, कदमताल और पांव में बंधे घुंघरुओं की खनक माहौल को उत्साहित कर देती है । नृत्यकार जो पुरुष परिधान में ही होते हैं, नक्कारे की ध्वनि का अनुसरण कर बराबर कदम-ताल बदलते, उछलते, नाचते रहते हैं ।
फरी नृत्य के दूसरे भाग में गायकी को रोक कर केवल नृत्य को स्थान दिया जाता है । इस अवस्था में फारों का बजाना बन्द कर दिया जाता है पर नक्कारा बजता रहता है । नक्कारे की आवाज के साथ ताल मिलाकर नृत्यकार सर्कस जैसे शारीरिक करतब भी दिखाते हैं । जैसे कि हवा में गोता लगाना, पलटी मारना, अपने शरीर पर सात से आठ लोगों को चढ़ाना या अपने ऊपर बैलगाड़ी चढ़ाना या छाती पर ईंटों को फोड़ना आदि । फरी नृत्य में इन दोनों प्रकारों का प्रयोग बारी-बारी से किया जाता है जिससे दर्शकों को विषय परिवर्तन का आनन्द मिलता रहे । दरअसल एक गीत समाप्त होने और दूसरे के प्रारंभ करने के अन्तराल में नृत्य वाले भाग को सम्मिलित कर लिया जाता है । खड़ी बिरहा (चारकड़िया बिरहा) खड़े होकर ही गाया जाता है इसलिए फरी नृत्य और गायकी के सभी सदस्य खड़े होकर ही इस विधा को प्रस्तुत करते हैं । आधुनिक बिरहा जिसे फरी नृत्य में गाया जा रहा है, चारकड़िया बिरहा (मुक्तक काव्य) और लोरकी गायकी (गाथा गायकी) का संयुक्त रूप है । बहुधा बिरहा गायकी में गाथात्मक गीत ही गाये जाते हैं । यद्यपि की फिल्मी गानों के प्रभाव के कारण बिरहा गायकी में कुछ परिवर्तन देखने को मिलता है तथा फरी गायक कई बार लोक प्रचलित भोजपुरी गानों को भी अपनी गायकी में प्रयोग करने लगे हैं तथापि बिरहा कथात्मक गीत ही होते हैं ये किसी न किसी कहानी पर आधारित होते हैं । इनमें पौराणिक, ऐतिहासिक और दूसरे चमत्कारिक कथाओं को भी स्थान दे दिया जाता है । अधिकांश बिरहा गायक धार्मिक प्रसंगों को प्रमुखता से गाते हैं । बिरहा गायकी के बारे में `लोकरंग-1´ पुस्तक में विस्तार से सामग्री दी गई है । लोकरंग सांस्कृतिक समिति, जोगिया जनूबी पट्टी, फाजिलनगर, कुशीनगर, बी 4/140 विशालखण्ड, गोमतीनगर, लखनऊ 226010 फरी नृत्य को संवर्द्धित करने में लगी हुई है ।


पंवरिया नृत्य
पूर्वांचल का गंवई समाज अपने रहन-सहन, खान-पान, वेश-भूषा और संस्कृति के माध्यम से सदियों से समाज के साम्प्रदायिक विभाजन को नकारता रहा है । आज के तथाकथित आधुनिक समाज को भले विश्वास न हो पर हकीकत यह है कि पूर्वांचल के तमाम त्यौहार हिन्दू और मुसलमान मिलजुल कर मनाते रहे हैं । मुहर्रम में हिन्दू झारी गाते हैं, गटका खेलते हैं, ताजिया बनाते और ढोते हैं । किसी मुसलमान भाई के यहां महलूद होने पर उसमें शरीक होते हैं और बताशा खाकर लौटते हैं । उसी प्रकार मुसलमान भाई होली-दीवाली साथ मनाते हैं । कीर्तनों में आते-जाते हैं । हिन्दुओं की शादी में मुसलमान नाऊ की भूमिका सदियों से हैं । वे निमन्त्रण बांटते हैं । शादी कराते हैं और पण्डित से नोकझोंक कर अपना नेग वसूलते हैं । उसी प्रकार लोक गायकी की पंवरिया परंपरा भी अदृभुत सांस्कृतिक एकता की मिशाल रही है । पंवरिया गायक गरीब मुसलमान होते हैं, जो सदियों से अपने पंवारे और सोहर गायकी से जनता के द्वार पर बधाई देने आते रहे हैं । रामजन्म और कृष्णजन्म की गाथा गायकी के अलावा तमाम पौराणिक गाथाओं को भी इनकी गायकी में स्थान मिला हुआ है । पुत्र प्राप्ति के अवसर पर हिजड़ों द्वारा बधाई देने की परंपरा से अलग पंवरिया गायकों द्वारा बधाई देने की परम्परा रही है जो तुतुही और ढोलक बजाकर अपने चुहलपन द्वारा समाज का मनोरंजन करती रही है ।
घंटों चलने वाले पंवारों में किसी न किसी नायक की गाथा को कई-कई घंटे तक गाते हुए ये गायक पूरा महाकाव्य सुना डालते हैं । शायद लोकगाथाओं के विस्तार के कारण ही यह मुहावरा चल पड़ा होगा कि - पंवारा मत सुनाइये। प्रारंभ में पंवरिया संपन्न लोगों के यहां अपनी गायकी प्रस्तुत कर सोना, चान्दी, सेरवानी या अन्य महंगे वस्त्रों को इनाम स्वरूप पाते थे । सेरवानी को ये अपना पोशाक बना लेते, कंधे पर कोई साड़ी, पैरों में घुंघरू और हाथ में तुतुही को रगड़ कर स्वर देते कलाकार आज उपेक्षित हैं और यह परंपरा समाप्त होने के कगार पर पंहुच चुकी है । तुतुही एकतारा और सारंगी का मिलाजुला सरलीकृत वाद्य यन्त्र है जिसे लोक कलाकार आसानी से तैयार कर लेते है । कोरस गायकों की टीम बैठी रहती है जबकि मुख्य गायक खड़ा होकर, नाचते हुए गाता है । कई बार इनकी गायकी में दुखान्त गीतों /पंवारों को स्थान मिलता है । बंध्या स्त्री की पीड़ा को व्यक्त करने वाला एक अत्यन्त कारुणिक गीत `लोकरंग-1´ पुस्तक में प्रकाशित किया गया है । जिस घर पंवरिया गायक पंहुचते हैं, उस घर की स्त्रियां उनके ढोलक को सिन्दूर से टीकती हैं । उसके बाद ही पंवरिया अपनी गायकी को अंजाम देते हैं । पंवरिया गायकी में तमाम ऐसे गीत मिलते हैं जिनमें हिन्दू और मुसलमान संस्कृतियां एकाकार हो गई हैं । यह खेद का विषय है कि ऐसी संस्कृति जो समाज को जोड़ने वाली है, को बचाने का कोई प्रयास नहीं किया जा रहा है जबकि तमाम लंपट अपसंस्कृतियां निर्भय हो, फल-फूल रही हैं ।
सुभाष चन्द्र कुशवाहा

रविवार, 5 दिसंबर 2010

लोकरंग की आंच : सुभाष चन्द्र कुशवाहा: जातिवाद, मनुष्यता से नफरत करने की मानसिकता है

लोकरंग की आंच : सुभाष चन्द्र कुशवाहा: जातिवाद, मनुष्यता से नफरत करने की मानसिकता है

जातिवाद, मनुष्यता से नफरत करने की मानसिकता है

समता, समानता और बन्धुत्व को बढ़ावा देने वाले भारतीय संविधान को आत्मसात किए साठ साल बीत चुके हैं । यद्यपि कि विगत साठ सालों में जाति आधारित जनगणना नही हुई फिर भी जातिवादी घृणा और अमानवियता में कोई बदलाव नही आया है । जाति जनगणना से जातिवाद बढ़ने का मर्सिया पढ़ने वाले, प्राथमिक पाठशालाओं में मिड-डे-मील बनाने वाली दलित महिलाओं द्वारा तैयार भोजन को खाने से इनकार करने वाले समाज के कुलीन तबकों के जेहादी आचरण पर मौन हैं । प्रधानाध्यापक से लेकर गांव के सवर्णों द्वारा मनुष्यता के खिलाफ जो आचरण अपनाया जा रहा है, उसके खिलाफ समाज की चुप्पी, जातिवादी मानसिकता के दोगले चरित्र को उजागर करती है । न केवल सवर्ण अपितु कुछ पिछड़े और दलित भी जातिवादी मानसिकता से ग्रस्त हैं । यही है जातिवादी हिन्दू समाज की बुनियादी जड़ । यह जड़ जनगणना से न तो और गहरी होने वाली है और न जनगणना न होने से उखड़ने वाली ।
ब्राह्मणवाद ने अपनी सर्वोच्चता बनाये रखने के लिए इसकी जड़ें, इतनी पुख्ता कर दी हैं कि तमाम दलित और पिछड़े भी भुलावे में इसे सींच रहे हैं । अभी रमाबाई नगर(कानपुर देहात) के एक पाठशाला में दलित महिला द्वारा तैयार खाना न तो प्रधानाध्यापक ने खाया और न किसी बच्चों को खाने दिया । उल्टे गांव वालों को बटोर कर स्कूल में पथरबाजी कराई गई । प्रधानाध्यापक कहता रहा कि वह नब्बे दिन का व्रत रख लेगा पर दलित महिला द्वारा बनाया खाना न चखेगा । बेसिक शिक्षा अधिकारी कहते दिखे कि दलित रसोइया स्वीकार्य नहीं तो वह उससे कोई दूसरा कार्य करा लेंगे । ऐसी निरीहता, ऐसी बेचारगी पर भला क्या कहना ? कहां गई संविधान प्रदत्त समानता का अधिकार ? ब्राह्मणवाद द्वारा रोपी गई जातिवादी मानसिकता से मुकाबला करने की ताकत न तो शासन में है, न समाज इस कुचक्र को ठीक से समझ पाया है । और तो और उन्नाव के गांव रानीपुर में पासी जाति के रसोइये के हाथ का बना खाना अन्य दलित संवर्ग के बच्चों ने नहीं खाया । ऐसा अपने आप नहीं हुआ । इसमें वहां के प्रधानाध्यापक की मुख्य भूमिका रही । उसी ने अस्पृष्यता की ऐसी आग दहकाई जो धीरे-धीरे तमाम विद्यालयों में फैलती गई । अभी तो जाति आधारित जनगणना हुई ही नहीं, फिर मिड-डे-मील बनाने वाली दलित रसोइये के विरूद्ध जहर किसने धोला ? क्या यह दलित और पिछड़ों की राजनीति का परिणाम है या ब्राह्मणवाद द्वारा रोपे गए जातिवादी नफरत का ?हिन्दूधर्म में अब भी मनुष्य को इतना घृणित मान लिया जाता है कि उसका छूआ स्वीकार्य नहीं और पशुओं को माता की तरह पूजा जाता है । फिर ऐसे धर्म में मनुष्यता के बीज ढ़ूंढना ढ़ोंग नहीं तो क्या है ?
स्कूलों में खाने की गुणवत्ता या साफ-सफाई की बात नहीं उठाई जा रही है । बात पढ़ाई की भी नहीं उठाई जा रही है । व्रत करने का ढ़ोंग करने वाले प्रधानाध्यापक द्वारा दी जा रही शिक्षा के स्तर पर भी सवाल नहीं उठाया जा रहा है । बात महज यह है कि एक मनुष्य को इतना घृणित मान लिया जाता है कि उसके द्वारा तैयार खान, खाने योग्य नहीं ? कहां हैं शबरी के मीठे फल या विदुर का साग खाने का दृष्टान्त देने वाले ? कहां हैं दलित वोटों के लिए दलित सम्मान की रक्षा की बात करने वाले ?
हिन्दू समाज की सम्पूर्ण सामाजिकता, आर्थिक और प्रबंधकीय व्यवस्था ऐसे ही जातिवाद मानसिकता पर आधारित रही है । यहां कभी भी योग्यता या कर्म के आधार पर समाज को सम्मान नहीं मिला है । इसलिए जातिवादी आधार पर राजनीति का गोलबन्द होना भारतीय समाज का बुनियादी चरित्र रहा है । यहां आर्थिक से ज्यादा कुलीनतावाद या वर्चस्ववाद का सिद्धान्त प्रभावी रहा है । यहां चुनाव और वर्चस्ववाद एक दूसरे के पर्याय रहे हैं । लिहाजा हिन्दी प्रदेशों में ज्यादातर पार्टियां चुनावों में जातितवादी समीकरणों के सहारे वर्चस्ववाद को स्थापित करती हैं ।
जिस समाज का सम्पूर्ण ढ़ांचा जातिवादी हो, वहां की राजनीति जातिवाद विहिन कैसे हो सकती है ? हिन्दी प्रदेशों में जातिवाद के विरूद्ध, 19वीं सदी में पश्चिम बंगाल के `ब्रह्म समाज´ की तरह कभी भी कोई जन आन्दोलन नहीं छेड़ा गया। जाति आधारित जनगणना पर हाय तौबा मचाने वाले, मनुष्यता विरोधी जातिवाद के विरूद्ध कोई आन्दोलन नहीं खड़ा करना चाहते । दरअसल उनका जातिवाद विरोध का नाटक आरक्षण विरोध की मानसिकता से जुड़ा हुआ है । उनका जातिवाद विरोध, दलितों और पिछड़ों को शासन, प्रशासन में मिले स्थान के प्रतिकार के रूप में है । जिस समाज में गिनीज बुक ऑफ रिकार्ड में एक से एक बेहूदे आंकड दर्ज होते हों, वहां जातियों के आंकड़े जानने से भूचाल आने का अन्देशा है । तमाम लेखक भी इस आशंका से गले जा रहे हैं । गोया जाति गणना हुई तो सब कुछ खत्म । पर नब्बे दिन तक व्रतधारण करने की धमकी देने वालों के खिलाफ कोई आन्दोलन नहीं खड़ा करते ।
भारतीय जातिव्यस्था के केन्द्र में सबसे ज्यादा उपेक्षित, प्रताड़ित और घृणित दलितवर्ग रहा है । पिछड़ी जातियों को हासिल कुछ रियायतों के बावजूद, वर्णवादियों द्वारा उन्हें भी उसी प्रकार उपेक्षित और प्रताड़ित किया जाता रहा है जिस प्रकार दलितों को । इस प्रताड़ना को झेलने के बावजूद, जातिवाद की पीड़ा भोगने वाली पिछड़ी जातियों की स्थिति बड़ी ढुलमुल रही है । एक ओर तो वे जातिवाद की प्रताड़ना से आहत दिखती हैं, तो दूसरी ओर दलितों को प्रताड़ित या अपमानित करने के अवसर से चूकती नहीं । जीवन-मरण, शादी-व्याह के अवसर पर दलितों को खिलाने में, या मृतक पशुओं को फेंकवाने में जो नज़रिया सवर्ण रखते हैं, वही नज़रिया पिछड़ी जातियां भी रखती हैं । शायद इसलिए जातिवाद के खिलाफ दलितों और पिछड़ों की व्यापक गोलबन्दी अभी तक नहीं बन पाई है और दलित रसोइये द्वारा पकाये मिड-डे-मील को खाने से नकारने में सवर्णों के साथ पिछड़े भी आ जाते हैं ।
ऊंची जातियों द्वारा आज भी दलितों की बस्तियों में आग लगाई जाती है, उनकी बहू-बेटियों की इज्जत लूटी जाती है । जाहिर है ऐसे अपमान झेलने वाले दलित, अपना भविष्य दृष्टिहीन दलितवादी पार्टियों में सुरक्षित समझने लगे हैं । दूसरी ओर ब्राह्मणवाद जातिवाद समाप्त करने की मानसिकता में नहीं है । वह जानता है, जातिवाद समाप्त होते ही उसका अस्तित्व समाप्त हो जायेगा । जातिवादी हथियार के बल पर ही उसने लम्बे समय तक राज किया है । आज वही जातिगणना से जातिवाद बढ़ने का मर्सिया पढ़ रहा है ।
वर्णवादियों द्वारा आरोप लगाया जाता है कि जातिवादी फैलाव 1990 के पहले नहीं था । सच्चाई यह है कि नब्बे के पूर्व का जातिवाद छद्म और एकतरफा था । तब प्रतिरोध के स्वर नहीं थे । सवर्ण जातियों के जुल्म, दलित चुपचाप सह लेते थे । उनके अन्दर संचित आक्रोश को भुनाने के लिए नब्बे के बाद कुछ पार्टियां सक्रिय हुईं । यद्यपि कि उनके दृष्टिकोंण बहुत हद तक साफ और वैज्ञानिक नहीं थे तथापि उन्होंने पूर्व के पिछलगूपन से मुक्ति की बात उठाकर नए समीकरणों को जन्म दिया । उन्हें सत्ता हासिल हुई । जिसके प्रतिक्रिया स्वरूप यह प्रचारित किया जाता है कि नब्बे के बाद जातिवाद का फैलाव अधिक हुआ ।
इक्वीसवीं सदी की दहलीज पर खड़े भारत का पढ़ा-लिखा तबका जातिवादी मानसिकता से उबरने के बजाय, इसमें धसता जा रहा है । पंजाब, हरियाण जैसे समृद्ध राज्यों में दलित महिलाओं के साथ सामूहिक बलात्कार हो रहे हैं और पानी मांगने पर पेशाब पिलाया जा रहा है । तब हैवानियत की हद तक पहुंच चुके इस इंटरनेटयुक्त समाज में जाति विहिन राजनीति की फिलहाल कल्पना नहीं की जा सकती । मनुष्यता धर्म से ऊपर है, यह स्वीकार किये बिना ऐसी मानसिकता से मुक्ति सम्भव नहीं है । राजनीति तो जातिवाद को संरक्षित और फलने-फूलने का अवसर देती ही रहेगी क्योंकि उसने भारतीय समाज को विखण्डित कर सत्ता हासिल करने की संस्कृति इतिहास से सीखी है ।

सुभाष चन्द्र कुशवाहा
बी-4/140 विशाल खंड़
गोमतीनगर, लखनऊ 226010

रविवार, 1 अगस्त 2010

ऊंच-नीच की पाठशाला

ऊंच-नीच की पाठशाला
प्रयोग-दर प्रयोग, नीति और अनीति, मिड-डे-मील और राजनीति के चलते उत्तर प्रदेश की प्राथमिक शिक्षा सड़ चुकी है और अब उसकी सड़ांध से होकर बह रही है जातिवाद, छुआछूत की बयार । समता, समानता और बंधुत्व को बढ़ावा देने वाले भारतीय संविधान को आत्मसात किए साठ साल बीत चुके हैं । यद्यपि कि विगत साठ सालों में जाति आधारित जनगणना नही हुई है फिर भी जातिवादी घृणा और अमानवीयता में कोई बदलाव नही आया है । जाति जनगणना से जातिवादी मानसिकता बढ़ने का मर्सिया पढ़ने वाले, उत्तर प्रदेश के प्राथमिक पाठशालाओं में मिड-डे-मील में दलित महिलाओं द्वारा तैयार भोजन को खाने से इनकार करने वाले समाज के कुलीन तबके के जेहादी आचरण पर मौन हैं । जहां बंधुत्व, राष्ट्रप्रेम और इंसानियत का पाठ पढ़ाया जाना चाहिए था वहां ऊंच-नीच का पाठ पढ़ाया जा रहा है । अध्यापकों का यह आचरण चिन्ता का विषय है । प्रधानाध्यापक से लेकर गांव के अन्य सवर्णों द्वारा दलितों के खिलाफ जो आचरण अपनाया जा रहा है, उसके खिलाफ समाज और प्रशासन की चुप्पी, जातिवादी मानसिकता के दोगले चरित्र को उजागर करती है । न केवल सवर्ण अपितु कुछ पिछड़े और दलित भी जातिवादी मानसिकता से बुरी तरह ग्रस्त हैं । यही है जातिवादी हिन्दू समाज की बुनियादी जड़ । यह जड़ जनगणना से न तो गहरी होने वाली है और न जनगणना न होने से उखड़ने वाली । ब्राह्मणवाद ने अपनी सर्वोच्चता बनाये रखने के लिए इसकी जड़े, इतनी पुख्ता कर दी हैं कि बिना उनकी मर्जी से इसे हिलाया नहीं जा सकता । तभी तो दलित चेतना के उभार के बावजूद तमाम दलित और पिछड़े उनके भुलावे में आकर जातिवाद को सींच रहे हैं ।
बाबा साहेब भीम राव अम्बेडकर की धर्मपत्नी रमाबाई के नाम पर कानपुर देहात जिले का नामकरण `रमाबाई नगर´ भले हो गया हो, दलितों की अस्मिता की रक्षा अभी दूर की कौड़ी बनी हुई है । यहां के प्राथमिक पाठशाला भवानीदीन पुरवा की दलित रसोइया रेखा बाल्मीकि द्वारा तैयार खाना न तो प्रधानाध्यापक सुन्दर लाल त्रिपाठी द्वारा खाया गया और न किसी बच्चों को खाने दिया गया । उल्टे गांव वालों को बटोर कर स्कूल में पत्थरबाजी कराई गई । प्रधानाध्यापक कहता रहा कि वह नब्बे दिन का व्रत रख लेगा पर दलित महिला द्वारा बनाया खाना न चखेगा । रेखा को चेतावनी मिली कि जुबान खोला तो गांव से निकाल दिया जायेगा । तनख्वाह लेना है, लो, पर खाना न बनाओ । बेसिक शिक्षा अधिकारी का कहना है कि शासन की नीति के अनुसार ही दलित महिला द्वारा खाना बनवाया गया पर लोगों को यह स्वीकार्य नहीं तो वह दलित रसोइये से कोई दूसरा कार्य करा लेंगे । ऐसी निरीहता, ऐसी बेचारगी पर भला क्या कहना ? कहां गई संविधान प्रदत्त समानता का अधिकार ? और यह चौधराहट तब है जब प्रदेश की सत्ता सवर्णों के हाथ में नही है ।
क्या यह सही नही है कि ब्राह्मणवाद द्वारा रोपी गई जातिवादी मानसिकता से मुकाबला करने की ताकत न तो शासन में है, न दलित समाज इस कुचक्र को ठीक से समझ पाया है । दलित समाज में भी ऊंच-नीच के तमाम स्तर ज़िन्दा हैं । अन्यथा उन्नाव जनपद के रानीपुर में पासी जाति के रसोइये के हाथ का बना खाना अन्य दलित संवर्ग के बच्चों ने खाने से इनकार न किया होता । एक दूसरा प्रकरण रमाबाई नगर के ब्लाक डेरापुर के गांव कपासी खुर्द का है । वहां गांव के अनुसूचित जाति के अध्यापक ने अपनी सास को रसोइया बनाना चाहा । प्रधान ने तुरुप का पत्ता चलते हुए वाल्मीकि महिला को रसोइया नियुक्त कर दिया । बस क्या था, बाल्मीकि महिला के हाथ का खाना कुंवरलाल संखवार के लड़के के अलावा अन्य दलित और सवर्ण बच्चों ने नहीं खाया । महोबा जनपद के लुहेड़ी गांव के पूर्व माध्यमिक विद्यालय के छात्रों ने भी दलित रसोइये के हाथ का बना खाना खाने से साफ इनकार कर दिया है । लखनऊ के करीब स्थित मोहनलालगंज में भी ऐसा ही मामला प्रकाश में आया है । कन्नौज, शाहजहांपुर, बरेली आदि जिलों से भी ऐसे ही समाचार मिल रहे हैं ।
छूआछूत की इन पाठशालाओं में ऊंच-नीच की ऐसी लकीरें अपने आप नहीं खिंची हैं । इन्हें ब्राह्मणवादी मानसिकता के अध्यापकों ने अबोध मस्तिष्क रुपी श्यामपट पर अपने हाथों से गहरी की हैं । अध्यापकों ने अभिभावकों में अस्पृष्यता की ऐसी आग दहकाई जो धीरे-धीरे तमाम विद्यालयों में फैलती जा रही है । हमारे बुद्धिजीवी कहते हैं कि जातिगणना से समाज बिखर जायेगा, जातिवाद बढ़ेगा । गोया समाज अब तक एक है ? अभी तो जाति आधारित जनगणना हुई ही नहीं, फिर मिड-डे-मील बनाने वाली दलित रसोइये के विरूद्ध जहर किसने घोला ? क्या यह दलित और पिछड़ों की राजनीति का परिणाम है या ब्राह्मणवाद द्वारा रोपे गए जातिवादी नफरत का ? यह ब्राह्मणवाद ही है जो मनुष्य को इतना घृणित मान लेता है कि उसका छुआ स्वीकार्य नहीं करता और पशुओं को माता/पिता की तरह पूजता है । फिर ऐसे धर्म में मनुष्यता के बीज ढ़ूंढना ढ़ोंग नहीं तो क्या है ? अजीब बिडंबना है कि लगभग बर्बाद हो चुके प्रदेश के प्राथमिक विद्यालयों में पढ़ाई, खाने की गुणवत्ता या साफ-सफाई की बात नहीं उठाई जा रही है । व्रत करने वाले ढ़ोंगी प्रधानाध्यापक द्वारा आए दिन गैरहाजिर रहने, अपने खेतों, दुकानों में काम करने पर भी सवाल नहीं उठाया जा रहा है । बात महज यह उठाई जा रही है कि इन शिक्षा केन्द्रों में तैनात एक कर्मचारी को इतना घृणित मान लिया जा रहा है कि उसके द्वारा तैयार खाना, खाने योग्य नहीं ? कहां हैं शबरी के मीठे फल या विदुर का साग खाने का दृष्टान्त देने वाले ? कहां हैं दलित वोटों के लिए दलित सम्मान की रक्षा की बात करने वाले ?
हिन्दू समाज की सम्पूर्ण सामाजिकता, आर्थिक और प्रबंधकीय व्यवस्था ऐसे ही जातिवादी मानसिकता पर आधारित रही है । यहां कभी भी योग्यता या कर्म के आधार पर समाज को सम्मान नहीं मिला है । यहां आर्थिक से ज्यादा कुलीनतावाद या वर्चस्ववाद का सिद्धान्त प्रभावी रहा है । यहां चुनाव और वर्चस्ववाद एक दूसरे के पर्याय रहे हैं । लिहाजा हिन्दी प्रदेशों में ज्यादातर पार्टियां चुनावों में जातिवादी समीकरणों के सहारे वर्चस्ववाद को स्थापित करती हैं । यह कोई आश्चर्य का विषय भी नहीं है । जिस समाज का सम्पूर्ण ढ़ांचा जातिवादी हो, वहां की राजनीति जातिवाद विहिन कैसे हो सकती है ? हिन्दी प्रदेशों में जातिवाद के विरूद्ध कभी भी कोई जन आन्दोलन नहीं छेड़ा गया जैसा कि 19वीं सदी में पश्चिम बंगाल में `ब्रह्म समाज´ के माध्यम से किया गया था । जाति आधारित जनगणना पर हाय-तौबा मचाने वाले, मनुष्यता विरोधी जातिवाद के विरूद्ध कोई आन्दोलन नहीं खड़ा करना चाहते । दरअसल उनका जातिवाद विरोध का नाटक, आरक्षण विरोध की मानसिकता से जुड़ा हुआ है । उनका जातिवाद विरोध, दलितों और पिछड़ों को शासन, प्रशासन में मिले स्थान के प्रतिकार के रूप में है । जिस समाज में गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकार्ड में एक से एक बेहूदे आंकड़े हों, वहां जातियों के आंकड़े से भूचाल आया हुआ है । तमाम लेखक भी इसकी निन्दा में जुटे हैं । गोया जाति गणना हुई तो सब कुछ खत्म । पर नब्बे दिन तक व्रतधारण करने की धमकी देने वालों के खिलाफ कोई आन्दोलन नहीं उठ खड़ा हो रहा ।
भारतीय जातिव्यस्था के केन्द्र में सबसे ज्यादा उपेक्षित, प्रताड़ित और घृणित दलितवर्ग रहा है । पिछड़ी जातियों को हासिल कुछ रियायतों के बावजूद, वर्णवादियों द्वारा उन्हें भी उसी प्रकार उपेक्षित और प्रताड़ित किया जाता रहा है जिस प्रकार दलितों को । इस प्रताड़ना को झेलने के बावजूद, जातिवाद की पीड़ा भोगने वाली पिछड़ी जातियों की स्थिति बड़ी ढुलमुल रही है । एक ओर तो वे जातिवाद की प्रताड़ना से आहत दिखती हैं, तो दूसरी ओर दलितों को प्रताड़ित या अपमानित करने के अवसर से चूकती नहीं । जीवन-मरण, शादी-व्याह के अवसर पर दलितों को खिलानें, या मृतक पशुओं को फेंकवाने में जो नज़रिया सवर्ण रखते हैं, वही नज़रिया पिछड़ी जातियां भी रखती हैं । शायद इसलिए जातिवाद के खिलाफ दलितों और पिछड़ों की व्यापक गोलबन्दी अभी तक नहीं बन पाई है और दलित रसोइये द्वारा पकाये मिड-डे-मील को खाने से नकारने में सवर्णों के साथ पिछड़े भी आ जाते हैं ।
जातिवादी मानसिकता ने समाज की समरसता तोड़ी है । ऊंची जातियों द्वारा आज भी दलितों की बस्तियों में आग लगाई जाती है तथा उनकी बहू-बेटियों की इज्जत लूटी जाती है । जाहिर है ऐसे अपमान झेलने वाले दलित, अपना भविष्य दलितवादी पार्टियों में सुरक्षित समझने लगते हैं भले ही दृष्टिहीन दलितवादी पार्टियों से उनका भला न होता हो और जातिवादी दंश पीढ़ी-दर-पीढ़ी उन्हें अभिशप्त किए रहता है । ब्राह्मणवाद ऐसी दलितवादी राजनीति को एक हद तक स्वीकार भी कर लेता है । कभी-कभी ऊंच-नीच की दीवार पर परदा भी लगाता दिखता है और बाद में दलितों के तेवर को तोड़ते हुए पुन: अपनी अधीनता में ले लेता है । ब्राह्मणवाद कभी भी जातिवाद को समाप्त नहीं करना चाहता । जातिवाद समाप्त होते ही ब्राह्मणवाद समाप्त हो जायेगा । जातिवादी हथियार के बल पर ही उसने हिन्दू समाज पर लम्बे समय तक राज किया है । लम्बे समय से शिक्षा, ज्ञान और समृद्धि पर एकाधिकार बनाए रखा है और सदियों से वंचित वर्ग को आरक्षण द्वारा कुछ लाभ मिला है तो वह खुली प्रतियोगिता में उतरने की चुनौती दे रहा है या जातिवाद का मर्सिया पढ़ रहा है ।
वर्णवादियों द्वारा आरोप लगाया जाता है कि देश में जातिवाद का फैलाव 1990 के पहले नहीं था । सच्चाई यह है कि नब्बे के पूर्व का जातिवाद छद्म और एकतरफा था । तब प्रतिरोध के स्वर नहीं थे । सवर्ण जातियों के जुल्म को दलित जातियां चुपचाप सह लेती थीं । उनके अन्दर संचित आक्रोश को भुनाने के लिए नब्बे के बाद दलितों और पिछड़ों के नाम पर कुछ पार्टियां सक्रिय हुईं । यद्यपि कि उनके दृष्टिकोण बहुत हद तक साफ और वैज्ञानिक नहीं थे तथापि उन्होंने पूर्व के पिछलग्गूपन से मुक्ति की बात उठाकर नए समीकरणों को जन्म दिया । उन्हें सत्ता हासिल हुई । जिसके प्रतिक्रिया स्वरूप यह प्रचारित किया जाता है कि नब्बे के बाद जातिवाद का फैलाव अधिक हुआ ।
दलित रसोइये द्वारा पकाये भोजन को लेकर बखेड़ा करने के पीछे एक दूसरा घृणित अर्थशास्त्र भी है । जिन पाठशालाओं में मिड-डे-मील खिलाया जाता है वहां मात्र गरीबों के बच्चे खाने और छात्रवृत्ति प्राप्त करने जाते हैं । इन पाठशालाओं में जितने बच्चों के नाम दर्ज हैं, उसके पांचवें भाग के बराबर ही बच्चे मिड-डे-मील खाने आते हैं । अधिक से अधिक बच्चों के नाम इसलिए दर्ज करा दिए जाते हैं जिससे ज्यादा राशन, ज्यादा सरकारी धन मिल सके और उसका सदुपयोग इस तन्त्र के तमाम पायदानों से लेकर प्रधान और प्रधानाध्यापक तक कर सकें । बच्चों की अधिक संख्या दिखाकर ही तो मिड-डे-मील योजना की सफलता के डंके पीटे जाते हैं । जबकि हकीकत यह है कि एक बच्चे का नाम दो-दो सरकारी पाठशालाओं में दर्ज हैं और वह पढ़ने जाता है गांव के निजी पाठशाला में । प्रधान और प्रधानाध्यापक को इन बच्चों के अभिभावक सहयोग इसलिए करते हैं जिससे उनके बच्चे को मुफ्त में प्रत्येक पाठशाला से तीन सौ रुपए वार्षिक छात्रवृत्ति मिलती रहे । यानी कि एक बच्चे का नाम दो प्राथमिक पाठशालाओं में दर्ज होगा तो दोनों जगहों से कुल छ: सौ रुपए वार्षिक छात्रवृत्ति मिल जायेगी । दलित रसोइये द्वारा पके खाने को अपवित्र बता कर बच्चों को न खाने की प्रेरणा देने वाले गुरूजी, मिड-डे-मील का राशन बचा कर बाजारों में बेच लेंगे । दलित के हाथ का बना मिड-डे-मील से परहेज के कारण न तो बच्चे पढ़ने आयेंगे न गुरुजी को पढ़ाने आना पड़ेगा । वेतन मुफ्त में मिलेगा ही । ऊपर से विद्यालय भवन निर्माण की ठेकेदारी से लाभ ही लाभ है । गुरुजी के घर पैसा बरसेगा तो ऊपर वालों को साधने में कठिनाई न होगी । कुल मिलाकर समाज में जातिवादी एड्स ऐसे ही वर्णवादी गुरूओं द्वारा बांटा और बढ़ाया गया है जो शुरू से ही बच्चों के मस्तिष्क में ऊंच-नीच की भावना भर देते हैं । जिन बच्चों को क, ख, ग... नहीं आता उन्हें जातिवादी घृणा का पाठ पढ़ा दिया जाता है । तभी तो औरैया के प्राथमिक पाठशाला भाऊपुर फंफूद की कक्षा तीन की छात्रा मनोरमा कहती है -` पापा ने कहा है कि नीची जाति के हाथ का बना खाना नहीं खाना ।´ ऐसा है सवर्णवाद का अमानवीय और क्रूर चेहरा । सवर्णवाद के आगे नतमस्तक दिखते प्रशासन ने आखिर कार दलित रसोइया तैनात करने की अनिवार्यता समाप्त कर दी है ।
आज दलित के हाथ का बना खाना न खाने के लिए एक सवर्ण प्रधानाध्यापक नब्बे दिन तक व्रत लेने की बात कहता है तो हमें जातिवादी मिजाज में रत्ती भर न हुए बदलाव को आसानी से समझा लेना चाहिए । मिड-डे-मील जैसी योजनाएं दरअसल दलितों का भला करने के बजाय शैक्षिक और सामाजिक रूप से बर्बाद कर रही हैं । उनके आगे बढ़ने के रास्तों पर अवरोध खड़ा कर, कुंठित और अपमानित कर रही हैं तथा गांव की चहारदीवारी से बाहर जाने से रोक रही हैं । इक्वीसवीं सदी की दहलीज पर खड़ा भारत का पढ़ा-लिखा तबका जातिवादी मानसिकता से उबरने के बजाय, इसमें धंसता जा रहा है । पंजाब, हरियाणा जैसे समृद्ध राज्यों में दलित महिलाओं के साथ सामूहिक बलात्कार हो रहे हैं और पानी मांगने पर पेशाब पिलाया जा रहा है । तब हैवानियत की हद तक पहुंच चुके इस इंटरनेटयुक्त समाज में जाति विहिन राजनीति की फिलहाल कल्पना नहीं की जा सकती । मनुष्यता धर्म से ऊपर है, यह स्वीकार किये बिना ऐसी मानसिकता से मुक्ति सम्भव नहीं है । राजनीति तो जातिवाद को संरक्षित और फलने-फूलने का अवसर देती ही रहेगी क्योंकि उसने भारतीय समाज को विखण्डित कर सत्ता हासिल करने की संस्कृति इतिहास से सीखी है ।

सुभाष चन्द्र कुशवाहा
`सृजन´
बी-4/140 विशाल खंड़
गोमतीनगर, लखनऊ -226010

शनिवार, 17 जुलाई 2010

बरसाती पानी के संरक्षण की जरूरत

आशंका बलवती होती जा रही है कि धरती से पानी खत्म हो रहा है । नदियां, नाले, झीलें सूख रही हैं । ग्लैशियर पिघल रहे हैं । जमीनी पानी दिनों-दिन नीचे खिसकता जा रहा है । पीने के पानी की विकराल होती समस्या के कारण मार-पीट, धरना-प्रदर्शन, तोड़-फोड़ की नौबत आने लगी है । पानी के कुप्रबंध के कारण प्रकृति की पूरी संरचना बिगड़ चुकी जान पड़ने लगी है । हमने आज के विकास की कीमत पर कल के विनाश की इबारत अपने हाथों लिख दी है । हम अपनी गलतियों को सुधारने के बजाए,गाल बजा रहे हैं । नतीजा यह है कि हमारी नादानियों की वजह से इक्वीसवीं सदी के अन्त तक गंगा को पानी देने वाला ग्लैशियर हमेशा के लिए पिघल जायेगा । हिमालय से निकलने वाली सभी नदियां सूख जायेंगी । केवल गंगा पर 50 करोड़ लोगों का जीवन निर्भर हैं । नदियों के सूखते ही धरती पर रक्तरंजित मार-काट मचेगी और फिर मानव सभ्यता का दुखद अन्त हो जायेगा । यह कोई भविष्यवाणी नहीं है । कल का यथार्थ है ।
संयुक्त राष्ट्र संघ की रिपोर्ट के अनुसार सन् 2050 तक चार अरब लोग पानी की कमी से प्रभावित होंगे । आज भी एक अरब लोगों को शुद्ध पानी नसीब नहीं है । मुम्बई महानगर को पानी देने वाली चार महत्वपूर्ण झीलें सूख रही हैं । दूसरी ओर बारिश में मुम्बई की सड़कों पर जलभराव का मंजर हर साल देखने को मिलता है । ऐसे में बरसाती पानी से झीलों को भरने की कार्ययोजना क्यों नहीं बनाई जाती ।
हमारे नीति नियन्ताओं की कार्ययोजना में गम्भीरता का मतलब महज यही है कि बारिश न होने पर वे जगह-जगह हवन, पूजा, यज्ञ कराकर, टी0वी0 पर दिखा देते हैं और समस्या को भगवान की ओर खिसका कर चैन से सांस लेते हैं । बरसात के लिए महिलाओं द्वारा नंगी होकर हल चलाने, बच्चों के कीचड़ में लोटने या मेढ़क-मेढ़की की शादी कराकर इन्द्र देवता को रिझाने जैसे टोटकों को प्रसारित कराते हैं और अपने द्वारा पैदा की गई समस्याओं को कभी ग्लोवल वार्मिंग का कारण बताकर तो कभी भगवान की मर्जी बताकर ढंक देते हैं ।
नदियों से नहरों का संजाल फैलाते समय जो गुलाबी तस्वीर पेश की गई थी वह महज दो-तीन दशकों में मटमैली हो गई है । अधिकांश नहरों के अन्तिम सिरे(टेल) तक पानी नहीं पहुंचता । नहरें गाद से भर गई हैं । नदियों का पानी खेतों तक पहुंचने के बजाय, वाष्प बनकर उड़ रहा है और नदियों को सुखता जा रहा है । आजादी के बाद देश में जलसंरक्षण के जितने भी साधन थे, धीरे-धीरे हमने सबको भूमाफियाओं के हवाले कर दिया, जहां उन्होंने अपने लाभ के लिए कंकरीट के जंगल उगाए । विकास के आधुनिक तौर-तरीकों के नाम पर हमने खेती, सिंचाई की पूरी संरचना बदल दी । जहां पहले जमीनी पानी का इस्तेमाल न कर, परंपरागत जलस्त्रोतों से सिंचाई होती थी वहीं परंपरागत जलस्त्रोतों यथा-तालाब, कुएं और झीलों की हमने उपेक्षा कर जगह-जगह ट्यूबवेल लगा कर जमीनी पानी का दोहन किया । ट्यूबवेलों के प्रचलन ने न केवल कुओं और तालाबों को पाटा अपितु जमीनी पानी को निचोड़ कर पूरे ऋतु चक्र को प्रभावित किया । कुओं और तालाबों के माध्यम से बरसाती पानी, जमीनी पानी के तल को बनाए रखता था। गांवों में जगह-जगह खुदे कुएं `रेन वाटर हार्वेस्टिंग का काम करते थे । आज गांवों में कुएं दिखाई नहीं देते । यही हाल तालाबों का है । जमीनों को पट्टों पर देने की राजनीति ने तमाम भूमाफियाओं को तालाबों की जमीन पर कब्जा दिला दिया । मिट्टी के बरतनों, घरों का निर्माण रूकने से बचे-खुचे तालाब भरते गए । उनके पाट सिमटते गए । आज इक्का-दुक्का ही ऐसे तालाब बचे हैं जो पूरे साल बरसाती पानी को बचाये रखने की क्षमता रखते हैं । सामन्त, राजे-महाराजे अपनी शौक के लिए ही सही, मगर तालाबों और झीलों के संरक्षण पर विशेष ध्यान देते थे । हमारी लोकतन्त्रात्मक दृष्टि उनसे भी गई गुजरी है । या यों कहें ,हमारे पास ऐसी कोई दृष्टि है ही नहीं ।
अब हमें बरसाती पानी को बचाने के बारे में गम्भीरता से सोचने की जरूरत है । बरसाती पानी बचा कर जमीनी पानी बढाने के लाभदायक परिणाम के सम्बंध में केरल का एक उदाहरण हमारे सामने है । सन् 2005 में केरल पब्लिक स्कूल ने अपने 250 वर्ग मीटर छत से 2,40,000 लीटर बरसाती पानी को संरक्षित कर अपने जमीनी पानी को इतना बढ़ा लिया कि अब गर्मियों में भी वहां कुएं और ट्यूबवेल नहीं सूखते ।
जमीनी पानी के स्तर को नीचे खिसकने से बचाने के लिए रेन वाटर हार्वेस्टिंग ही एक मात्र विकल्प है । विश्व बैंक की रिपोर्ट के अनुसार यदि हमने बरसाती पानी को संरक्षित कर जमीनी पानी के स्तर को बचाने की कोशिश नहीं की तो पानी की वर्तमान उपलब्धता 500 घन किलोमीटर से घट कर स्न 2050 तक मात्र 80 घन किलोमीटर रह जायेगी । विश्व बैंक की रिपोर्ट के अनुसार आज जहां भारत का 15 प्रतिशत भू-भाग पानी के गम्भीर संकट से घिरा हुआ है वहीं सन् 2030 तक 60 प्रतिशत भू-भाग इसकी चपेट में आ जायेगा । सबसे पहले वही क्षेत्र संकटग्रस्त होंगे जहां जमीनी पानी का ज्यादा दोहन हो रहा है जैसे राजस्थान, पंजाब, हरियाण, तमिलनाडु और कर्नाटक ।
रेन वाटर हार्वेस्टिंग के बारे में हकीकत में कुछ नहीं किया जा रहा । शहरों में सड़कों के किनारे, बरसाती पानी को जमीन में संरक्षित करने के लिए अभी तक कोई योजना अमल में नहीं लाई जा रही है । छतों के बरसाती पानी को जमीन में पहुंचाने की बाध्यकारी योजनाएं कार्यरूप में नहीं हैं । कागजी कार्यवाहियां, पानी के संकट से हमें उबार नहीं पायेंगी । दिनों-दिन पक्की होती जा रही जमीनों से पानी जमीन के अन्दर नहीं जा पाता और यूं ही वाष्प बनकर उड़ जाता है ।
हमें बरसाती पानी के हर बून्द के संरक्षण के बारे में गंमीरता से सोचना चाहिए । हालात चिन्ताजनक हैं और टोटकों से हल नहीं होने वाला है । वोट बैंक के लहलहाने के लिए आबादी नियन्त्रित करने की कोई योजना बनती दिखाई नहीं देती । ऐसे में ज्यादा आबादी के लिए पानी की जरूरतें बढ़ती जायेंगी । दिनोन्दिन कम होते पानी की पूर्ति के लिए जरूरत है तालाबों, झीलों को गहरा और विस्तार दिया जाए । शहरी बस्तियों में पार्कों और सार्वजनिक स्थलों पर गहरे तालाबों का निर्माण कर बरसाती पानी को जमा किया जाए । घरों के प्रयुक्त पानी को नालियों में बहाने के बजाए पुन: जमीन में डाल कर संरक्षित किया जाए । बरसाती पानी को संरक्षित कर हम कुओं, तालाबों, झीलों के माध्यम से जमीनी पानी के स्तर को बढ़ा सकते हैं ।

सुभाष चन्द्र कुशवाहा
बी 4/140 विशालखण्ड
गोमतीनगर, लखनऊ 226010

सोमवार, 21 जून 2010

हमारी जान की कीमत कितनी है ?

राष्ट्र प्रभुसत्ता, राष्ट्रभक्ति, जनपक्षधरता को गिरवी रख, महाशक्तियों के आगे दुम हिलाने की संस्कृति हमारे खून में घुली-मिली है । आजादी पर सत्ता के दलालों का कब्जा ब्रिटिश हुकूमत से विरासत में मिली है । ऐसे में पन्द्रह हजार जानों को निगलने वाले एण्डरसन को सरकारी विमान से भगा देने, हजारों लाशों और लाखों अपाहिजों की आवाज को अनसुना करने वाले एक बार फिर राहत, मुआवजा और पुनर्वास का खेल खेलने की तैयार में हैं । यह खेल जितनी जल्दी शुरू होगा, लोगों का ध्यान उतनी जल्दी एण्डरसन और परमाणु दायित्व विधेयक से हटेगा । वाशिंगटन और दिल्ली में बैठे नियन्ताओं की रणनीति इन्हीं बातों को ध्यान में रख कर बनाई जा रही है ।
देश में घटित इतनी बड़ी त्रासदी की लड़ाई भोपाल गैस पीड़ितों ने अपने दम पर लड़ी है । आज अपना दामन पाक-साफ दिखाने वाली किसी भी पार्टी ने इन वर्षों में भोपाल गैस पीड़ितों के आन्दोलन को अपना एजेण्डा नहीं बनाया । महज कुछ कोरे बयानों से काम चला लेने की प्रवृत्ति से वे आगे न बढ़ पाईं । यह है हमारी चुनावबाज पार्टियों का वर्ग चरित्र और जनपक्षधरता जो अपनों से गद्दारी करती है और अमेरिका से यारी । दरअसल हमारे कर्णधारों की नज़रों में गरीबों की जान की कीमत महज कुछ हजार की सहायता मात्र है । वे सदा पूंजीपतियों की हिफाजत में रहते हैं और अमेरिका जैसे हत्यारे देश के तलवे चाटते हैं । उसके राष्ट्रपति से हाथ मिलाने के लिए अपनों से धक्कामुक्की करते हैं । अब छब्बीस साल बाद जब गैस पीड़ितों की दूसरी पीढ़ी बर्बादी की ओर बढ़ चुकी है, मुआवजा और पुनर्वास के नए शगूफे के द्वारा एण्डरसन मामले में फंसे अपने दामन को ढंकने का प्रयास तेज किया जा रहा है । सम्भव है एक कदम आगे बढ़ाकर, एण्डरसन की वापसी की मांग कर जनता को यह दिखाने का प्रयास भी किया जाये कि हम आप के हितैषी हैं । जबकि हकीकत सभी जानते हैं कि हमने अब तक एण्डरसन के बचाव में अमेरिका को इतने लिखित दस्तावेज मुहैया करा दिये हैं, जिनके बल पर वह हमारे प्रत्यर्पण की मांग को आसानी से ठुकरा देगा । बेशक सब जानते हुए ही हमारे रहनुमा यह मांग करेंगे क्योंकि वे जानते हैं कि मांग करना कोई अपराध नहीं है । बदले में जनता से कहने-सुनाने के लिए बहाना मिल जायेगा कि हम प्रत्यर्पण के लिए प्रयत्नशील हैं । ले देकर कुछ और सालों में वृद्ध एण्डरसन चल बसेंगे और हम अपनी राष्ट्रभक्ति पर पड़े़ दाग को छिपा ले जायेंगे ।
इस देश के गरीबों की जान जितनी सस्ती है उतनी अमेरिका के मवेशियों की भी नहीं है । वे अपने कुत्ते, बिल्लियों पर खतरनाक रसायनों का परीक्षण करने के बजाय, भारत जैसे गरीब मुल्कों के आदमियों पर कर लेते हैं । उनके लिए हम गिनी पिग हैं । आज भोपाल गैस काण्ड और यूनियन कार्बाइड की चर्चा मात्र इसलिए हो रही है कि वहां गैस रिसाव से एक ही समय हजारों की मौत प्रत्यक्ष रूप में हुई । अपने देश में अमेरिका जैसों की हरकतों से अप्रत्यक्ष मौतों का आंकड़ा इससे कहीं ज्यादा है और वह दिखाई नहीं देता । अमेरिका की ऐसी तमाम कंपनियां अपने लाभ के लिए वर्षों से हमारे लोगों में जहर घोल कर कैंसर, दमा, तपेदिक जैसी बीमारियां बांट कर मार रही हैं । जिन रसायनों को अमेरिका अपने देश में प्रतिबंधित करता है उन्हीं रसायनों को उसकी कोई कंपनी भारत में बेचती है । डी0डी0टी0 1972 से और डेलड्रीन 1970 से अमेरिका में प्रतिबंधित हैं पर अपने देश में वह बेची जाती है । अमेरिकी बहुराष्ट्रीय कंपनियां बी0टी0 बैगन जैसे हानिकारक बीजों को लेकर हमारे यहां आती हैं जबकि उन्हीं का देश उनको उगाने की इजाजत नहीं देता। वे जानती हैं कि इस देश के गरीबों को अपने लाभ के लिए जब चाहो, जैसे चाहो मार दो, कुछ होता नहीं । भारतीय खाद्य पदार्थों को विषैला बता कर अपने यहां निर्यात रोकने वाला अमेरिका इस तथ्य को अनदेखा कर जाता है कि विषाक्त रसायनों को बनाने वाली ज्यादातर कंपनियां उसी के देश की हैं ।
एक अमेरिकी सैनिक की मौत पर अमेरिका दहल उठता है जबकि उसके दबाव में दुनिया के तमाम मुल्कों में तीसरी दुनिया की सेनायें मरने-खपने के लिए भेज दी जाती हैं । अमेरिका इराक से तेल निचोड़ने का काम खुद करता है पर अफगानिस्तान जैसे अशान्त मुल्क में जहां हर वक्त जीवन खतरे में है, सड़क निर्माण जैसे कामों में भारत को लगाता है । परमाणु सुरक्षा के जिन कड़े मापदंड़ों को उसने अपने देश में लागू कर रखा है, उनसे इतर दूसरे देश में लचर कानून बनवा कर वह अपना लाभ सुरक्षित रखना चाहता है । जैसे कि परमाणु ऊर्जा संयन्त्र के संचालकों के लिए दुर्घटना पर महज 500 करोड़ की सहायता राशि देने का प्राविधान किया गया है जबकि अमेरिका में यह राशि 500 अरब से भी ज्यादा हो सकती है । यानी कि एक अमेरिकी की कीमत के मायने और हैं और भारतीय के और । अपने लोगों की हिफाजत के लिए वह जब चाहे, जहां चाहे बमबारी कर सकता है। वह एक आतंकी को मारने के लिए मानव रहित विमानों से या कलस्टर बमों से सैकड़ों निर्दोषों को मार सकता है । पर उसकी ओर कोई सवाल उठाये तो वह गुर्राने लगता है । ऐसे मानव विरोधी महाशक्ति से दूरी बनाने के बजाय, हमारे कर्णधार परमाणु प्रसार से लेकर कृषि सब्सीडी घटाने, पेटेंटीकरण, डंकल बीजों और कारपोरेट खेती के माध्यम से भारतीय किसानों को तबाह करने पर उतारू है । आखिर इन्हीं अमेरिका परस्त नीतियों के कारण तो अपने देश में भोपाल गैस त्रासदी से कई गुना ज्यादा किसानों ने आत्महत्या की है । भारत में नाभिकीय दुर्घटनाओं से रिएक्टर आपूर्ति कर्ता अमेरिकी कंपनियों को बचाने के लिए अमेरिका भारतीय कर्णधारों पर दबाव बना कर ऐसा कानून बनवा देना चाहता है जिससे भोपाल गैस त्रासदी जैसे फैसलों की गुंजाइश भी न बचे । धारा 35 के अनुसार वह ऐसे हादसों की सुनवाई का अधिकार भी दीवानी अदालतों के बजाय `दावा आयुक्त´ को देना चाहता है । जबकि हमारी जनपक्षधर सरकार बेचैन है परमाणु दायित्व विधेयक को जल्द से जल्द पास कर देने के लिए । यह है हमारी सरकार के लिए इस देश की जनता की कीमत ? फिर आप एण्डरसन के पीछे क्यों पड़े हैं भाई ? हमारे देश में तो तमाम एण्डरसन भरे पड़े हैं । जिस एण्डरसन के खिलाफ एफ0आई0आर दर्ज था, उसे बिना कोर्ट की मर्जी के हमारे कर्णधार जमानत दिलाकर भगा देते हैं और तब भी वे सत्ता सुख भोगते रहते हैं । आज भी तमाम बहुराष्ट्रीय कंपनियां अपने आर्थिक हितों के लिए हमारे जंगल, पर्यावरण को निगल रही हैं, लोगों के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ कर रही हैं और उन्हें माओवादियों की ओर जाने के लिए बाध्य कर रही हैं परन्तु हमारे कर्णधारों को उनका अपराध दिखाई नहीं देता । वे अपनी जनता को पूजींपतियों और हत्यारों के हवाले कर राहत, पुनर्वास और मुआवजों का खेल खेल रहे हैं ।

सुभाष चन्द्र कुशवाहा
बी 4/140 विशालखण्ड, गोमतीनगर, लखनऊ ।

शुक्रवार, 21 मई 2010





लोकरंग 2010
लोकरंग- 2010 : पधारो म्हारो जोगिया रे
कुशीनगर जिले के जोगिया गांव में लोकरंग के तीसरे संस्करण में आठ और नौ मई को लोक कलाकारों, साहित्यकारों, रंगकर्मियों की एक बार फिर जुटान हुई। लोक कलाकारों और साहित्यकारों के लिए जोगिया एक बार फिर सजा धजा था। रंग-बिरंगे झण्डों, पतंगों, गुब्बारों और कविता-गीत के पोस्टरों के साथ। नाट्य मंचन में असुविधा को देखते हुए इस पर गांव के लोगों ने पक्का चबूतरा बना दिया था। इस चबूतरें पर 20 गुणे 12 फीट का भव्य बैकड्राप कार्यक्रम में चार चान्द लगा रहा था । कार्यक्रम में भाग लेने बुन्देलखण्ड से डॉ0 रामभजन सिंह, पटना से तनवीर अख्तर की इप्टा टीम और छत्तीसगढ, रायगढ़ से डॉ0 योगेन्द्र चौबे की गुड़ी टीम तो पहुंची ही थीं साथ ही देश के तमाम लेखक,कवि, कथाकार, रंगकर्मी भी पधारे थे । सभी का कथाकार सुभाष चन्द्र कुशवाहा की अगुवाई में गांव के युवाओं और ग्रामीणों ने टिका लगाकर तुरही की तुरर-तुरर के बीच स्वागत किया। रात्रि में कार्यक्रम स्थल पर पिछले दो कार्यक्रमों के मुकाबले ज्यादा भीड़ जुटी थी । लोग कार्यक्रम शुरू होने का बेसब्री से इन्तजार कर रहे थे।
महाश्वेता देवी जी के सन्देश से हुआ उद्घाटन
लोकरंग-2010 का उद्घाटन सुप्रसिद्ध लेखिका महाश्वेता देवी के सन्देश से हुआ । वह कार्यक्रम की मुख्य अतिथि थीं और उन्हें ही उद्घाटन करना था लेकिन स्वास्थ्य खराब होने के कारण नहीं आ पाई थीं । उन्होंने लोकरंग कार्यक्रम के लिए भेजे लिखित सन्देश में कहा है कि वह लोकरंग में न आ पाने के कारण हृदय से दुखी है । स्वास्थ्य ठीक नहीं हैं और पश्चिम बंगाल में जारी संकट के कारण उन्हें बहुत काम करना पड़ रहा है। इस स्थिति में क्या करूं ? मै लोकरंग कार्यक्रम से बहुत नजदीक से जुड़ाव महसूस करती हूं । उन्होंने पत्र में लोकरंग सांस्कृतिक समिति के अध्यक्ष सुभाष चन्द्र कुशवाहा को इस आयोजन के लिए बधाई देते हुए आयोजन की रिपोर्ट भेजने को कहा है । महाश्वेता देवी का सन्देश आलोचक एवं पत्रकार अनिल सिन्हा ने पढ़ा ।
लोकरंग स्मारिका का लोकार्पण
लोकरंग के उद्घाटन अवसर पर वरिष्ठ कथाकार शिवमूर्ति, आलोचक वीरेन्द्र यादव और नाटककार हृषिकेश सुलभ ने स्मारिका लोकरंग-2010 का लोकार्पण किया । स्मारिका में सोहनी-रोपनी के गीत, मोहर्रम गीत, झारी गीत, होरी गीत, जन्तसार गीत सहित कई गीत संकलित किए गए है । इसके अलावा कई महत्वपूर्ण लेख हैं।
अंजन जी और रामपति रसिया का सम्मान
स्मारिका के लोकार्पण के बाद भोजपुरी क्षेत्र के दो महत्वपूर्ण लोक गीतकारों, राधा मोहन चौबे उर्फ अंजन जी और नथुनी प्रसाद कुशवाहा उर्फ रामपति रसिया को सम्मानित किया गया। अंजन जी बिहार के गोपालगंज जिले के शाहपुर डिघवा गांव के रहने वाले हैं और उन्होंने सैकड़ों लोकगीत लिखे हैं जो उनकी कजरौटा, फुहार, संझवत, पनका, सनेश आदि किताबों में संकलित हैं। रामपति रसिया कुशीनगर जिले के मोरवन गांव के रहने वाले हैं। उन्हें 50 से अधिक निर्गुण लिखे हैं जो उनकी पुस्तक अंजोरिया में बदरी में संकलित हैं।
और बजा नक्कारा
उद्घाटन सत्र के बाद सांस्कृतिक कार्यक्रम शुरू हुए। कार्यक्रम की शुरूआत जोगिया गांव की किशोरियों द्वारा छठ गीत व रोपनी गीत से हुआ। इसके बाद दिल्ली से आए कवि रमाशंकर विद्रोही ने काव्य पाठ किया। खास तेवर की कविताओं और उनके पाठ करने के अन्दाज पर साहित्यकारों के साथ-साथ ग्रामीणों ने भी ताली बजाई। गोपालगंज बिहार से आए मोहन गौड़ और उनके साथियों ने फरी नृत्य प्रस्तुत किया। इसमें पहले कलाकारों ने नक्कारे की आवाज पर नृत्य प्रस्तुत किया। इसके बाद उन्होंने बिरहा पर नृत्य किया। अन्तिम भाग में नक्कारे की आवाज के साथ ताल मिलाकर पलटी मारने, गोता लगाने जैसे करतब प्रस्तुत किए गए। बुन्देलखण्ड से आए लोक कलाकारों ने अचरी, बृजवासी और ईसुरी फाग गायन प्रस्तुत किया। अचरी नवरात्रि में रात्रि जागरण में गाया जाने वाला गीत है तो बृजवासी खेतों की कटाई के समय स्त्री और पुरूष मजदूरों द्वारा मिल कर गाने वाला गायन है। फाल्गुनी बयार के शुरू होते ही बुन्देलखण्ड में होली गीत शुरू होते हैं और फाग गायन के पितामह ईशुरी के फाग गाए जाने लगते हैं। बुन्देलखण्डी लोक कलाकारों ने अपनी प्रस्तुतियों से बुन्देलखण्डी लोक संस्कृति की झलक दिखाई। छत्तीसगढ़ से आए गुडी संस्था के कलाकारों ने छत्तीसगढ़ी लोक गीत गाए।
नौ मई के रात के कार्यक्रम की शुरूआत उपेन्द्र चतुर्वेदी और उनकी टीम के भोजपुरी गीतों की प्रस्तुति से हुई। इसके बाद जितई प्रसाद और उनकी टीम ने हुड़का नृत्य प्रस्तुत किया। हुड़का नृत्य प्रस्तुत करने वाली यह टीम महराजगंज जिले के परसौनी बुजुर्ग गांव से आई थी। हुड़का नृत्य के बाद पूर्वी उत्तर प्रदेश के एक और मशहूर लोकनृत्य पखावज को चिखुरी, सुखराज, शोभी प्रसाद और उनके साथियों ने प्रस्तुत किया। दोनों ही नृत्य अब बहुत कम देखने को मिलते हैं। कार्यक्रम में फाजिलनगर के संगीत अध्यापक मंगल मास्टर ने दो भोजपुरी गीतों को प्रस्तुत किया। जब उन्होंने अंजन जी का गीत चिन्ता की अगनी तोहके लेस लेस खा जइहें ए मैना तू असरा छोड़ तोता अब ना अइहें और ऐतना से काम न चली न कटी विपतिया, रोई-रोई पतिया लिखवाए रजमतिया सुनाई। कुशीनगर जिले के कप्तानंगज से आए कौव्वाल असगर अली और उनके साथियों ने अमीर खुसरो की रचना छाप तिलक सब छीनी रे मोसे नैना मिलाय के, अनवर फर्रूखाबादी की रचना बस तुम्हारे करीब आने से, दुश्मनी हो गई जमाने से और दानिश जौनपुरी की रचना पत्थर की इबादत से तुझे कुछ नहीं मिलेगा, दिल में मेरी तस्वीर सजा क्यूं नहीं लेते सुनाकर लोगों की वाहवाही पाई।
बाबा पाखण्डी और गबरघिचोरन के माई
लोकरंग में दो नाटकों का मंचन हुआ। आठ मई की रात छत्तीसगढ़ की गुडी संस्था के कलाकारों ने बाबा पाखण्डी नाटक का मंचन किया। छत्तीसगढ़ी लोक कथा पर आधारित यह नाटक एक ऐसे चरित्र के ईद-गिर्द घूमता है जो भविष्यवाणियां करता है और खुद को बाबा के रूप में प्रस्तुत कर लोगों को मूर्ख बनाता है। नाटक में वैश्वीकरण के बाजार में पाखण्ड और अन्धविश्वासों के सहारे पाखण्डियों की पनप रही जमात पर करारा प्रहार किया गया है। नाटक का निर्देशन डॉ0 योगेन्द्र ने किया।
पटना से आई इप्टा की टीम ने भिखारी ठाकुर के दो नाटकों को मिलाकर बनाए गए नाटक गबरघिचोरन के माई की जानदार प्रस्तुति से लोगों का दिल जीत लिया। इस नाटक में स्त्री पीड़ा की मार्मिक अभिव्यक्ति हुई है। वरिष्ठ रंगकर्मी तनवीर अख्तर के निर्देशन में मंचित इस नाटक में युवक गलीच अपनी ब्याहता को छोड़ कलकत्ता चला जाता है और 15 वर्ष तक कोई खोज-खबर नहीं लेता है। इस बीच उसकी पत्नी बच्चे को जन्म देती है। जब गलीज लौटकर आता है तो किशोर हो चुके अपने बेटे को कलकत्ता ले जाने की कोशिश करता है लेकिन उसकी पत्नी उसका विरोध करती है। गबरघिचोर भी मां को छोड़कर परदेश जाने से मना करता है। तभी गांव का एक दूसरा व्यक्ति गड़बड़ी गबरघिचोर को अपना बेटा बताता है। इसको लेकर पंचायत होती है और पंच बने भिखारी ठाकुर गबरघिचोर पर मां का हक बताते हुए उसके पक्ष में फैसला देते हैं।
लोकगीतों को नई धार, विचार से लैस करने की जरूरत
लोकरंग के दूसरे दिन लोकगीतों की प्रासंगिकता पर संगोष्ठी आयोजित की गई । संगोष्ठी में साहित्यकारों ने लोकगीतों और लोकसंस्कृति पर बाजार, अपसंस्कृति और सत्ता के हमले पर चिन्ता जाहिर करते हुए इसको बचाने और नई धार, विचार से लैस करने के लिए आन्दोलन की जरूरत पर बल दिया।
गोष्ठी में शिरकत करते हुए वरिष्ठ आलोचक वीरेन्द्र यादव ने कहा कि लोक का तन्त्र में अधिग्रहण हो गया है। लोकगीत जिन परिस्थितियों में रचे जाते हैं उन स्थितियों का अभी लोप नहीं हुआ है। स्त्रियों, दलितों की पीड़ा अभी भी है। लोकसंस्कृति जिस जमीन पर पनपते थे वह अभी कायम हैं लेकिन उसके कार्य में परिवर्तन जरूर हुआ है। आज गांव बदले हैं, जीवन शैली बदली है लेकिन मूल संवेदना बरकरार है। इस मूल संवेदना को आन्दोलनात्मक तेवर देने की जरूरत है। कवि दिनेश कुशवाह ने कहा कि शुद्र और स्त्रियों ने 75 प्रतिशत लोकगीतों की रचना की है। उन्होंने कई लोकगीतों को लय में गाते हुए लोकमानस से निकले स्रोत को भदेस कह कर खारिज करने वाले अभिजात्य वर्ग की कड़ी आलोचना की। उन्होंने कहा कि भाषाएं और बोली क्षतिग्रस्त हो रही हैं जिसे बचाने की लिए काम करने की जरूरत है। साहित्यकार अरूणेश नीरन ने कहा कि लोकगीत अध्ययन करने की चीज नहीं बल्कि इसे जिया जाता है। उन्होंने लोक को पाश्चात्य फोक से अलग कर विवेचन करने की जरूरत पर बल दिया। कथाकार शिवमूर्ति ने कहा कि लोकगीतों की प्रासंगिकता पर प्रश्न नहीं हैं बल्कि उस पर आ रहे खतरों को पहचानने और उसका मुकाबला करने की जरूरत है। रंगकर्मी राजेश कुमार ने लोकगीतों और लोकनाट्य रूपों की घार के कुन्द होते जाने पर चिन्ता व्यक्त करते हुए इसे सत्ता तन्त्र की गहरी साजिश बताया। पटना से आए लेखक तैयब हुसैन ने कहा कि वैश्वीकरण भाषाई नस्लवाद ला रहा है जो लोकगीतों की उपेक्षा का कारण है। नाटककार हृषिकेश सुलभ ने कहा कि जीवन का यथार्थ बदल रहा है जो लोक संवेदना को भी प्रभावित कर रहा है। उन्होंने कहा कि हमें गांव में रहने वाले लोगों की सांस्कृतिक भूख की चिन्ता करनी होगी। कथाकार देवेन्द्र ने बहस में हस्तक्षेप करते हुए कहा कि जिस तरह आर्थिक संरचना बदल रही है, उसमें सामुदायिक जीवन का ह्रास हो रहा है उसमें सामुदायिकता से उपजे गीत शायद ही बचें।
गोष्ठी की अध्यक्षता कर रहे आलोचक एवं पत्रकार अनिल सिन्हा ने कहा कि लोक गीत हमारे जीवन का मूल रहा है। लोकगीत यथार्थ से उपजी अभिव्यक्ति हैं इसलिए वे नष्ट नहीं होंगे लेकिन उनके उपर बाजारवाद, फूहड़ता, सांस्कृतिक दरिद्रता का खतरा है। गोष्ठी में डॉ0 योगेन्द्र चौबे, रामभजन सिंह, सत्यदेव त्रिपाठी ने भी हिस्सा लिया। संचालन सुधीर सुमन व धन्यवाद ज्ञापन `लोकरंग सांस्कृतिक समिति´ के अध्यक्ष सुभाष चन्द्र कुशवाहा ने किया।

लोकरंग में भाग लेने वाले कलाकारों और आयोजन को सफल बनाने वाले श्री मंजूर अली, विष्णुदेव राय, भुवनेश्वर राय, संजय कुशवाहा, इसरायल अंसारी, मुंशरीम, हदीश अंसारी, सुरेन्द्र शर्मा को लोकरंग सांस्कृतिक समिति की ओर से स्मृति चिन्ह प्रदान करने के साथ ही कार्यक्रम का समापन हुआ। लोकरंग के पहले और दूसरे सत्र का संचालन सुधीर सुमन ने और तीसरे सत्र का संचालन दिनेश कुशवाह ने किया।

मनोज कुमार सिंह
एम0आइ0जी0-71,राप्तीनगर,फेज-1,गोरखपुर 273003

गुरुवार, 15 अप्रैल 2010

श्रमशील समाज में ही लोकगीत जनमते हैं

लोकगीतों का सृजन, सदियों पूर्व बालकंठों और स्त्रियों के अन्तस्थल से हुआ होगा । पुरूषों ने इस क्षेत्र में बाद में प्रवेश किया होगा । ऐसा अनुमान करने के पीछे तमाम कारण हैं । पहला तो यही कि जंगली जानवरों से भय-व्याप्ति के कारण बच्चों ने स्वर दिया होगा:-उटवा-घुटवा, मनारी बाबा पूइ, आज खाबे खिचड़ी, बिहान खाबे घीउ ।´ भूख से बिलबिलाते बच्चों ने आकाश में बगुलों को देख गाया होगा-बगुला, बगुला कहां जात बाड़, हेने आव चाउर द, खुदी द, तहरा बियाह में पानी भरेब । बाद में बच्चों के माध्यम से महिलाओं ने स्वर दिया होगा:-
काच-कुच कौआ खाला ।
दूध-भात बाबू खाला ।
पत्ता उधिआइल जाला ।
कौआ लजाइल जाला ।
बाबू के मुंहवा बिटोरले जाला ।1
लोकगीतों की प्रारंभिक अवस्था में लयप्रधान निरर्थक गीतों की ही रचना हुई होगी। जैसे कि -ओक्का, बोक्का तीन तलोक्का । बाद की अवस्था में अन्त्यानुप्रास रहित लयप्रधान गीतों का सृजन हुआ होगा ।2 इस स्थिति में स्त्रियों ने लोकगीतों को अभिव्यक्ति के मुख्य माध्यम के रूप में सोहर, जन्तसर, निरवाही गीतों को गाया होगा ।
समूह की अवधारणा पर आधारित लोकगीत, स्त्रियों की रुचि, कल्पना और संघर्ष की अभिव्यक्ति के सबसे पुराने माध्यम रहे हैं । या यों कहें कि लोकगीत श्रम करने वाली महिलाओं के ज्यादा करीब रहे हैं । कहरवा, बनज़रवा, पंवारा, बिरहा गीतों के माध्यम से बाद में पुरूषों ने अपने मन विनोद के लिए प्रवेश किया होगा । तब तक स्त्रियां, लोकगीतों में मंज चुकी होंगी और उन्होंने कजरी, लाचारी आदि तुकान्त गीतों का सृजन किया होगा । यहां यह स्पष्ट कर देना उचित होगा कि अधिकांश लोकगीतों के सर्जक और संरक्षक स्त्रियां ही हैं । समाज द्वारा उपेक्षित स्त्री समाज ने लोकगीतों में अपना नाम देने का साहस न किया होगा, जिससे लोकगीतों के रचइता अनाम रह गए ।

गंवई समाज में केवल जन ही नहीं होते, अपितु जीव-जन्तु, पशु-पक्षी, वनस्पतियां, मौसम, पेड़-पौधे सब कुछ शामिल होते हैं । तभी तो बेटी अपने बाबा से कहती है:-
बाबा निमिया के डाल जनि काट, निमिया चिरईया बसेर ।
लोकगीतों में गंवई समाज है । श्रम और संस्कार है । श्रम से जुड़े होने के कारण लोकगीतों का दायरा बरसात की फुहार से लेकर बंसत की मधुरता और चैत की निश्चिन्तता से जुड़ती है । ये सुबह और शाम से भी जुड़ते हैं और भोर के उल्लास और रात की आराम तलबी से भी । लोक की संवेदना हर्ष, वियोग और श्रृंगार से अभिव्यक्ति पाती रही है । कुछ हद तक मांसलता को भी स्थान मिला है पर कुछ वर्जनाओं के साथ । चंचलता, चुहलता, और थिरकन का सम्बंध श्रम, दुख, भूख को भुलाने और जिजीविषा की ऊर्जा बटोरने के लिए हुआ है ।
पुत्रविहिन स्त्री को तिरस्कार के जो दंश झेलने पड़ते हैं, स्त्रियां गीतों में उसे व्यक्त करती हैं:- सासु कहेली बांझिन, ननद बिनदाबासी हे, आरे बिधि जेकर बारी बिआही, से ही घर से निकालेेले हे ।3 बेमेल विवाह का दर्द लोकगीतों में इस प्रकार व्यक्त करती हैं:- सबके तू देहल भोला, अन धन सोनवा, बनवारी हो हमरा के लरिका भतार । या हाय, हाय प्यारी गोरी, अबहीं सइयां तोरे लरिका ।4 लोक की जिजीविषा को बनाए रखने में लोकगीतों का बड़ा हाथ रहा है । तभी तो हरिनी कहती है: -मचिया बइठल कोसिला रानी, हरिनी अरज करे हो । रानी मास रउरा सीझेला रसोइया, खलड़ी बकसि देहु हो ।5 यहां स्व के बजाए आम का ख्याल रखने की परम्परा है:- बहिनी जवनि जिनिसिया दिहे रहलिउ हो ना । बहिनी तवनि जिनिसिया लेइ लेतू हो ना ।6 लोकगीतों ने कई बार संघर्ष की बुनियाद तैयार की है:- काले कांकर क बिसेनवा चान्दे गाड़े बा निसनवा ।´7 कई बार इन्होंने अन्याय के विरूद्ध आम जनता को जगाया है, उन्हें गोलबन्द किया है । जाहिर है लोकगीतों का यह चरित्र, शोषकों के विरूद्ध रहा है इसलिए उन्होंने लोकगीतों की धार कुन्द करने के लिए इसे फूहड़पन की चासनी में डुबो कर, इनके मूल चरित्र को बदलने की कोशिश की है । आज भोजपुरी फिल्मी गानों में यही सब देखने-सुनने को मिल रहा है ।
लोकगीत, श्रम के आधार पर, मौसमों के आधार पर, जाति-वर्ग के आधार पर या जीवन-मरण के अवसर, कुअवसर पर गाए जाते रहे । गाते-गाते ये गीत लोकगाथा बने । पूर्वांचल के पंवरियों द्वारा गाए जाने वाले पंवारे लोकगाथा ही हैं । अनावश्यक विस्तार के कारण ही लोकोक्तियों में कहा गया है कि- `पंवारा मत सुनाइए ।´ लोक गीतों में छोटे-छोटे पदों से लेकर लोकगाथा में पुस्तकाकार रचना देखने-सुनने को मिलती है । कजरी, लचारी जैसे टेकयुक्त गीत, दस से बारह पंक्तियों तक होते हैं जबकि बिरहा, छिटका कहरवा जैसे टेक रहित मुक्तक गीत, चार और ढाई चरण के तथा सोहर सामान्यतया पन्द्रह-बीस पंक्तियों का होता है । जन्तसर गीत (जान्त पर आटा पीसते समय गाया जाने वाला गीत) और निरवाही गीत(सोहनी के समय गाया जाने वाला गीत ) के आख्यानक प्राय: पचास पंक्तियों तक होते हैं । लोकगाथाएं बहुत लम्बी होती हैं और सप्ताह भर से कम में समाप्त नहीं होतीं । विषय की दृष्टि से लोकगाथा का क्षेत्र महाकाव्य के समान विस्तृत होता है ।
लोक गाथाएं वैसे तो एकल गायक द्वारा ही गाई जाती हैं लेकिन डेवढ़ भरने के लिए एक-दो सहगायक भी होते हैं । इन सहगायकों के लिए लोकगाथा का याद होना अनिवार्य है तभी मुख्य गायक लोकगाथा को निभा सकता है । आल्हा का सहगायक उतराई का चरण लोक लेता है और मुख्य गायक उसके गा चुकने तक दमभर कर आगे की तैयार करता है । लोकगाथा में गद्य के अंश भी होते हैं । बनज़रवा अथवा पंवारा का गायक जब दम खींचकर-`रे ना ´ कहे तो समझना चाहिए कि यहां विराम है । अलग-अलग लोकगाथाओं में अलग-अलग वाद्य यन्त्र प्रयुक्त होते हैं । जोगियों द्वारा गाये जाने वाले `राजा भरथरी´ और `गोपीचन्द´ जैसी लोकगाथाएं सारंगी पर गायी जाती हैं । `लोरकी´ और `चनैनी´ का साज करताल है । `पंवारा´ सूप बजाकर गाया जाता है । लोकगाथा के गायन में नृत्य प्राय: नहीं होते । सिर्फ पूर्वांचल के लुप्तप्राय हो चले पंवरिये, कदमताल बदल कर कुछ नाच लेते हैं ।
लोकगीत, नृत्य और सहगान की अवधारणा पर आधारित हैं । समूह में बीस से पच्चीस स्त्रियां तक गाती हैं । झूमर गीत का नाम झूम-झूम कर गाने के कारण ही पड़ा है । लोकगीतों में छन्द से अधिक भाव का महत्व होता है । लोगों की चेतना को झकझोरने में भाव ही ज्यादा उपयोगिता होता है । यहां शास्त्रीय संगीत जैसा आलाप-तान, आरोह-अवरोह, ताल-लय प्राय: नहीं होते । लोकगीतों के अपने आरोह-अवरोह हैं । उनकी अपनी लय-गति है । लोकगीतों में संगीत की सात ध्वनियों के बजाय आरम्भिक पांच ध्वनियों- सा, रे, ग, म, प का प्रयोग होता है । लोकगीतों में ध्वनि और अर्थ दोनों महत्वपूर्ण हैं । जबकि ध्रुपद, धमार, और खयाल जैसे शास्त्रीय संगीत में घ्वनि का महत्व अधिक है । लोकसंगीत से प्रभावित ठुमरी, दादरा और टप्पा में अर्थ का अपना विशिष्ट महत्व है । शायद यही कारण है कि लोकगीत आम जनता में प्रिय हैं जबकि शास्त्रीय संगीत सामन्ती घरानों में । लोकगीतों में राजा दशरथ, नन्द भी औसत किसान हैं । यहां कैकेयी और धगरिन दोनों एक जैसे हैं । नि:सन्तान राजा का मुंह डोमिन भी देखना पसन्द नहीं करती:-सूतल डोमिन उठि बइठेली, डोम के जगावेली हो । ए डोम, देखली निरबंसिया केरा मुंह, कूसल नाहि परेला हो । राजा डोमिन की बात सुन घर जाता है और भोजन नहीं करता है । रानी के पूछने पर कारण बताता है:-ए रानी, जुठवा के पतरी डोमिनिया, निरबंसिया नउआ धरेले हो ।8
लोकगीतों में प्राय:त्रिताल(16 मात्रा) और चौताल(12 मात्रा) चलता है । पुत्र प्राप्ति की कामना, प्रेम, नफरत आदि का चित्रण सोहर के माध्यम से होता रहा है । जन्तसर और निरवाही गीत, सोहर के बाद लिखे गए जान पड़ते हैं क्योंकि निरवाही और जन्तसर का रूप-विधान सोहर जैसा अनियन्त्रित और लचीला नहीं है । सम्भवत: तब तक लयों की जानकारी हो चुकी थी । कहांरों का कहरवा भी सोहर की तरह लय पर आधारित है । लेकिन इसकी बन्दिश अत्यन्त ठस और नियन्त्रित होती है ।
पहली सदी के लोकगीतों की एक झलक हमें `गाहा´ छन्द में दिख जाती है । अहीरों का जातीय गीत बिरहा, इसी युग की उपज जान पड़ता है ।9 कहा जाता है अहीर कितना भी चतुर क्यों न हो, बिरहा छोड़कर और कुछ नहीं गायेगा: -कतनो अहिरा होवे सयान, बिरहा छोड़ि ना गावे आन । बिरहा, विरह का गीत है:-पिया पिया कहत पियरी भइली देहिया, लोगवा कहेला पिण्ड रोग । गंऊवां के लोगवा मरमियो ना जानेला, भइलबा गवनवा ना मोर । छोटा बिरहा चारकड़िया कहा जाता है । इसमें चार चरण होते हैं । बड़ा बिरहा लोकगाथा जैसा होता है । वैसे वास्तविक बिरहा चारकड़िया ही होता है । बिरहा में केवल डेवढ़ भरी जाती है । इसका प्रादुर्भाव अपभ्रंश के गाहा छन्द से हुआ है ।
बारहमासे और ऋतु सम्बंधी गीत-कजली, फगुआ, चैता भी बिरहा युग की देन जान पड़ते हैं । कजरी, स्त्रियों द्वारा वर्ष ऋतु में गाया जाने वाला गीत है । तुकान्त गीतों में कजरी सबसे लचीला छन्द है । इस गीत की उत्पत्ति का श्रेय मिर्जापुर(उ0प्र0) को जाता है । भाद्रपद मास के शुक्लपक्ष की तृतीया, कजली तीज के नाम से प्रसिद्ध है । इस अवसर पर कजली के दंगल हुआ करते हैं । गवैये दो पार्टियों में विभक्त होकर रात-रात भर कजली गाते हैं । सम्भवत: काले बादलों के बीच गाये जाने के कारण इसका नाम कजली पड़ा होगा:- कइसे खेले जाइबि सावन में कजरिया, बदरिया घेरि आइल ननदी ।
भविष्य पुराण, जयद्रथतन्त्र, मार्कण्डेय पुराण और आल्ह खण्ड में कजरी का उल्लेख मिलता है । भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने कजरी गीत का सम्बंध कन्तित (मिर्जापुर) के परोपकारी राजा दादूराय की मृत्यु से जोड़ा है । जॉर्ज िग्रयर्सन ने भी इस मत का समर्थन किया है । भारतेन्दु के मतानुसार वहां की स्त्रियों ने दादूराय की मृत्यु से उत्पन्न दुख को प्रकट करने के लिए कजरी नामक नए तर्ज का अविष्कार किया । कजरी के एक विशिष्ट धुन का लिखित प्रमाण अकबर के शासन काल में मिलता है । कजरी का एक ही गीत प्राय: तीन विभिन्न धुनों में गाया जाता है । 1-कजरी:-समूह में बैठ कर अथवा चलते हुए ग्रामीण स्त्रियां चलती लय में गाती हैं । 2-ढुनमुनियां:- कमर तक झुक कर चुटकी बजाते हुए मण्डलाकार घूम कर गायी जाती है । 3- उजली:- गौनिहारिनों अथवा नागर स्त्रियों का ढोल-मंजीरे के साज पर गाया जाने वाला गीत है ।10
होरी, बसन्त ऋतु में गाया जाने वाला सहगान है जिसके प्रत्येक चरण का पूर्वार्द्ध विलंबित और उत्तरार्द्ध द्रुत होता है । होरी की टेक और अन्तरा दोनों का तुक प्राय: एक ही होता है: -धनि-धनि हो सिया तोर भाग राम बर पायो । लिखि-लिखि चिठिया बिस्वामित्र भेजे, मुनियन हाथ पठाये । होरी की एक आवृत्ति युक्त लय भी है जो चौताल की अपेक्षा द्रुत किन्तु बेलवरिया से विलंबित होती है । बेलवरिया में जहां अन्तरा के अन्तिम शब्द की तीन बार आवृत्ति होती है वहीं इस वर्ग की होरी में `हाय´ अथवा `सखी री´ शब्द स्तोभ के साथ अन्तरा का चरणांश ही दुहराया जाता है । प्रश्नोत्तर शैली की लचारी की धुन से मिलती-जुलती होरी की एक द्रुत विलंबित धुन भी है :-मोरा नीको ना लागे राम नइहरवा । कवना ही मासे बनकोइलि बोले, कवना मासे बोले मोरवा । सावन मासे बनकोइली बोलै, भादो मासे बोलै मोरवा ।
फाग, फागुन मास में गाया जाने वाला गीत है । यह एक श्रृंगारिक गीत है । कबीर और जोगिड़ा के अलावा होली के सभी गीत सहगान हैं । फाग के गवैयों का दूसरा दल प्राय: आगे का चरण अथवा पहले दल के गाये हुए चरण से मिलता-जुलता कोई दूसरा टुकड़ा गाता है । चौताल बसन्त ऋतु में गाया जाने वाला विलंबित लय का एक सहगान है । चार आघात और दो खाली होने के कारण इस ताल को चौताल कहा जाता है: -
देखन में छैला बाड़ा बांका, बेटा बिगड़ा है नन्द बाबा का,
मोहन मारे डाका ।
घर से निकलल दुर्लभ हो गई दईया, नई-नई नारि देखि रोके कन्हईया,
रोके गलिन के नाका ।
चोरवन में बढ़ल इनके साखा, कुछ दिन में उजरिहें इलाका,
मोहन मारे डाका ।11
चौताल और होरी के छन्द विधान में विशेष अन्तर नही है । होरी के बोल टेक से ही द्रुत होते हैं, किन्तु चौताल से विलंबित । चौताल की विलंबित लय पुनरावृत्ति में क्रमश: द्रुत होती जाती है । अन्तरा की परिसमाप्ति पर चौताल की लय फाग गीतों में सर्वाधिक द्रुत हो जाती है किन्तु दूसरी अन्तरा आरंम्भ करते ही गायक पुन: विलंबित लय पकड़ लेते हैं और क्रमश: द्रुत होते-होते सम पर चरमबिन्दु पर पहुंच जाते हैं । यही क्रम चलता रहता है ।12 यहां यह भी स्पष्ट कर देना उचित होगा कि, फागुन माह में होरी, फगुआ, चौताल, बेलवरिया, कबीर सब साथ-साथ गाए जाते हैं ।
बेलवरिया बसन्त ऋतु में गाया जाने वाला सर्वाधिक द्रुत लय का गीत है । बेलवरिया जैसे टेकयुक्त द्रुत गीतों में अन्य गायक केवल टेक दुहराते हैं किन्तु विलंबित लय के टेकयुक्त अथवा टेकरहित गीतों के प्रत्येक चरण की आवृत्ति होती है । जहां चौताल की लय क्रमश: द्रुत होती है वहीं बेलवरिया की लय आरम्भ से ही द्रुत होती है । गीत को रस और गति देने के कारण ही इसे `राग लहरी´ भी कहा जाता है :-
सेजिया सईंया मोर, सेजिया सईंया मोर,
आवत में डर लागे ।
घनन-घनन करे घुघुर,
पायल करे शोर, पायल करे शोर,
एक त रात अजोरिया, चितवे चहुं ओर, चितवे चहुं ओर,
आवत के डर लागे ।
सासू हमारे दारुन, ननदी बिरही बोल, ननदी बिरही बोल,
गोतिन और पड़ोसिन, रोज-रोज करे खोज, रोज-रोज करे खोज,
आवत के डर लागे ।
सासू जे सुते ओसरवा, ननदो दहलीज, ननदो दहलीज,
सैंया सुते सेज ऊपर, जहां कानों ना कीच, जहां कानों ना कीच,
सासू के आवे अतरिया, ननदो के बुखार, ननदो के बुखार,
सईंया के होला रतौंनी, दिन सूझे ना रात, दिन सूझे ना रात,
आवत के डर लागे ।13 ( मेरे गांव वाले इस गीत को `चहका´ कहते हैं ।)

बेलवरिया पूर्णत: लय आधारित अतुकान्त गीत है किन्त कुछ मामलों में चरणान्त में तुकों का प्रयोग मिलता है ।
कबीर, फागुन में गाया जाने वाला अश्लील एकल लघु मुक्तक गीत है । इसी प्रकार जोगिड़ा होली के अवसर पर गाया जाने वाला एकल गीत है जिसमें `जोगीजी´ संबोधन कर शास्त्रार्थ शैली में गाया जाता है ।
चइता चैत के महीने में गाया जाने वाला श्रृंगार-प्रधान विलंबित लय का लघु एकल गीत है । चइता की लय इतनी विलंबित होती है कि आकार-प्रकार में छोटा होते हुए भी चरणांत तक जाते-जाते सांस टूटकर करुण रस में बदल जाती है:- धावत राम बकईंयां हो रामा, धूरी भरे तन ।
चइता मूलत: मुक्तक लोकगीत है किन्तु कुछ चइते ऐसे भी मिलते हैं जिनकी अन्तराओं में स्थायी भावों का विस्तार कर बड़ा बना लिया गया है:-
एही ठैंयां मोतिया हेरानी हो रामा । ये ही ठैंयां ....
कोठवा में ढूंढूं, अटरिया में ढूंढूं
देवरा से पूछत लजानी हो रामा । ये ही ठैयां ....
सेजा में ढूंढूं, सुपेतिया में ढूंढूं
सईयां से पूछत लजानी हो रामा । ये ही ठैंयां ....
बारहमासा विरहणी के अन्तर्मन की अभिव्यक्ति का माध्यम रहा है । साल के बारह महीनों में विरह का अलग-अलग वर्णन यहां मिल जाता है । प्रारम्भ जून या आषाढ़ की पहली वर्षा से होता है और अन्त जेठ या वैशाख की तपती गर्मी से । बारहमासे का लघु रूप चौमासा भी उपलब्ध है । चौमासा में आषाढ़ से कुवार अथवा सावन से कार्तिक तक, प्रकृति का विरहणी के मन पर पड़ने वाले प्रभाव का चित्रण किया जाता है:-
क्या है तकदीर हमारी तजौ बनवारी । जेठ मास तन तपौ, अंग भावे नहीं सारी । बाढ़ै विरह असाढ, बून्द अदरा झकझारी । सावन सेज भयावन लागत , प्रियतम बिनु बून्द कटारी ।
तजौ बनवारी - - भादो गगन गम्भीर पीर अति हृदय मझारी कियो करार कुआर, सवति संग बसै मुरारी । कातिक रास रचै मनमोहन, कुबजा संग आप सिधारी । तजौ बनवारी - - अगहन अमित अनेक बिकल वृषभान दुलारी । पूष लगै तन आड़ देत कुबजा को गारी । माघ बसन्त हमें नहिं भावत, झूमर, चौताल, धमारी । तजौ बनवारी - -
फागुन उड़त अबीर, अरगजा, कूक मझारी
चैत फूलै बन टेस होत मुद मंगलकारी । द्विज छोटकुन वैशाख मनावत अरे पूजि गइले बारहमास
तजौ बनवारी - - 14
श्रम परिहार के गीतों में जन्तसर, धनकुट्टी, बिनावन, निरवाही, रोपनी, सोहनी, घाट, चरवाही के गीत, श्रम की प्रकृति में होने वाले बदलाव के कारण समाप्त होते जा रहे हैं ।
आटा पीसने का काम जब तक घर के जान्त पर होता था तब तक जन्तसर, भोर में घर-घर से सुनाई पड़ता था। जन्तसर दरअसल समाज और घर से उपेक्षित, प्रताड़ित नारी की पीड़ा व्यक्त करने के माध्यम थे । `रे ना, हे ना, हे राम, हुरे जी,´ ये आदि स्तोभ जन्तसर के अंग थे । चरणान्त के इन स्तोभों पर आकर दम फूल जाता था । इन्हीं स्तोभों पर स्त्रियां सांस भरती और जान्त में झींक डालतीं । जन्तसर लय प्रधान गीत है । यह छोटे आख्यानों के लंबे विवरणों का लोकगीत है:-15
सेर भर गेंहुआ रे बांसे के चंगेरिया
अरे पीसई चलेलीं जन्तसरिया हो राम ।
जान्त ना चलै रामा किलवा ना डोले
अरे जुअवा पकड़ि सखि रोवेली हो राम ।

धनकुट्टी और बिनावन के गीत प्राय: अनियन्त्रित लचारी शैली के होते हैं । बिनावन गीतों की लय, धनकुट्टी गीतों से कुछ विलंबित होती है । जन्तसर, निरवाही और किसी-किसी सोहर में यत्र-तत्र तुकों का प्रयोग हुआ है किन्तु कहरवा विशुद्ध अतुकान्त है । यद्यपि अन्त में पहले चरण के उत्तरार्ध की पुनरावृत्ति इस बात का भान नहीं होने देती ।
कहरवा की विषय वस्तु मुक्तप्रेम पर आधारित है । अपवाद स्वरूप कुछ नीतिपरक कहरवे भी देखने को मिलते हैं । कहरवा की लय द्रुत होती है । सम्भव है यह सोहर से भी पुराना हो परन्तु इसके कालखंड के बारे में ठीक-ठीक कुछ नहीं कहा जा सकता । यह भी सम्भव है कि बिरहों के उद्भव के बाद किन्ही दो शब्दों के मेल से यह ढाई चरण का स्वतन्त्र मुक्तक अंकुरित हुआ हो । बड़ा कहरवा निश्चित रूप से छिटका कहरवा के बाद जन्मा है ।16
मात्र लय पर आधारित लचीले विधान वाला अतुकान्त भावप्रधान गीत-सोहर सम्भवत: सबसे पुराना लोकगीत है । सोहर की सरलतम गायन-पद्धति, गायन में मात्र ताल-वाद्यों का प्रयोग, स्वल्प आरोह-अवरोह युक्त विलंबित लय इसकी पुरातनता के प्रमाण हैं । अनुमानत: जंगम जातियों के अर्ध निरर्थक गीतों के बाद ही सोहर का प्रादुर्भाव हुआ होगा। गीत में प्रयुक्त शब्दावली संस्कृत, प्राकृत, पाली और अपभ्रंश का ही विकसित रूप है । सोहर अपनी पहली अवस्था में मात्र लय आधारित अतुकान्त गीत था । दूसरी अवस्था में पद-स्तोभों का प्रयोग हुआ । तीसरी अवस्था में अनियन्त्रित तुकों का प्रयोग हुआ । तुलसी युग में इसी अवस्था का प्रभाव है ।17 पुत्र प्राप्ति पर खुशी, बंध्या स्त्री की पीड़ा, समाज के ताने, सभी कुछ सोहर में मिलते हैं । सोहर में देशकाल का अतिक्रमण करते हुए तमाम विषय वस्तुओं को समेटा गया है । जीरे के व्यापार और पुराने नगरों का भी सोहर में उल्लेख मिलता है । वैसे तो कहा जाता है कि लोकगीत कालसापेक्ष, जिजीविषा के तमाम संघषों, समाज की आन्तरिक और बाह्य, दैहिक और पारलौकिक संस्कृतियों को समेटते चलते हैं और ज्यादातर समाज के उपेक्षित तबकों यथा श्रमिक महिलाओं की अभिव्यक्ति के माध्यम होते हैं तथापि इन्हीं संघषों, अभिव्यक्तियों के साथ समयसापेक्ष या देशकाल के अतिक्रमण की पृष्ठभूमि भी तैयार होती है । जैसे तमाम अभावों, विपन्नताओं और रूग्णताओं से गुजरता श्रमशील मनुष्य यदि अपने जीवन में सुख नहीं प्राप्त करता तो भी उसके सामने स्वर्ग की परिकल्पना तो होती ही है । इसी स्वर्ग की परिकल्पना के कारण वह कभी काशी तो कभी मथुरा का चक्कर लगाता रहता है । स्वर्ग को हमने नहीं देखा है फिर भी तमाम काल्पनिक गल्पों में बता दिया जाता है कि वहां क्या-क्या है या नरक में किस तरह किसको सजा दी जाती है । एक सुख या भय का वातावरण, कल्पना में ही सही, तैयार कर दिया गया है । ठीक इसी प्रकार भोजपुरी सोहर लोकगीतों में ऐसे तमाम प्रसंग आए हैं जिनसे समयसापेक्ष से बाहर जाकर परिकल्पना की गई है । मसलन की लौंग के पेड़ की बात करें । हम जानते हैं कि पूरे भोजपुरी क्षेत्र में नारियल, लौंग, केसर, गुअवा(कसैली), मंजिष्ठा(एक प्रकार की पहाड़ी लता जिससे रंग तैयार होता है) या पलास के पेड़ नहीं उगते । तथापि तमाम भोजपुरी गीतों में इन पेड़-पौधों का जिक्र हुआ है, इनके होने की परिकल्पना की गई है । ये पौधों या वनस्पतियां धार्मिक महत्व के हैं या रूप, सौन्दर्य, पवित्रता, मोहकता के पर्याय हैं, इसलिए इनसे स्वयं को जोड़कर सुख, सौन्दर्य और मोहकता की परिकल्पना की गई है :-
1- कवना बने चुए नरियलवा, कवना बनवा केवल हो । ललना, कवना बनवा चुएला गुलाब, त चुनरी रंगाइबि हो । (भोजपुरी संस्कार गीत, सोहर सं0 3)
2-कवना बने फूले गुअवा नरियर, कवना बने फूल फुले हो, ए ललना कवना बने फूलेला मजीठिया, त चुनरी रंगाइबि हो । (भोजपुरी संस्कार गीत, सोहर सं0 4)
3-मोर पिछुअरिया लवंगिया, त हहर झहर करे ए, जड़ से कटाइब लवंगिया पलंगा बिनाइब ए । (भोजपुरी संस्कार गीत, सोहर सं0 10)
4-मोर पिछवरवा लवंगिया क बगिया लवंग फुले आधी राति रे, बहि लवंग कै सीतल बयरिया महंकै बड़े भिनुसार । ( कविता-कौमुदी- ग्रामगीत रामनरेश त्रिपाठी, विवाह गीत सं0 33)
5-मोर पिछवारे लौंग का बिरवा लौंग चुए आधी रात, लौंग बिनि-बिनि ढेर लगावों, लादत है बनिजार । ( कविता-कौमुदी- ग्रामगीत रामनरेश त्रिपाठी, विवाह गीत सं0 39)
6-कवना बने फूलेला सुपरिया, त कवना बने नरियर हो, आरे कवना बने फूलेला पलसवा, लोढ़न हम जाइबि हो । (भोजपुरी संस्कार गीत,सोहर सं0 14)
7- माई हे, हमराहिं बाबा के इलायची बारी, डाढ़े पाते सोहरि गइले हे । (भोजपुरी संस्कार गीत, विवाह गीत सं0 284)
लगता है ऐसी दुर्लभ, बहुमूल्य वस्तुएं जो जनसुलभ नहीं थीं, उनका लोकगीतों में सुनी-सुनाई बातों के रूप में वर्णन हुआ है । इसलिए कहीं-कहीं मिथ्या बातों का भी उल्लेख है:-ओहि रे अजोधिया एक पीपर, मोतियन फरल हो । या बलुवर खेत जोतइतुं, धन मोतिया बोअइतुं हो ।
संस्कार गीतों में सोहर के अलावा अन्नप्राशन, मुण्डन, जनेऊ के गीत भी गाये जाते रहे हैं । विवाह के गीत तो आज भी प्रचलित हैं ही । भोजपुरी समाज में हिन्दू और मुस्लिम समाज में लगभग समान शैली में विवाह/संस्कार गीतों का प्रचलन है:-
सुन्नत गीत
चांद हो तू त पश्चिमें उगिह
ओखली पर उगिह, छूरा पर उगिह उगिह दुलहवा के ऊपर, चांद हो तू त पश्चिमें उगिह
लोकगीतों में जातिगत विभाजन के बावजूद सांप्रदायिक विभाजन ढ़ूंढ़ना मुश्किल है । पंवरिया गायक मुस्लिम होते हुए भी सोहर और पंवारे गाते हैं जिनमें हिन्दू देवी-देवताओं की स्तुतियां होती हैं । `लोकरंग-1´ पुस्तक में ऐसे कुछ गीतों को प्रकाशित किया गया है । लोकरंग संस्कृतिक समिति मुस्लिम लोकगीतों पर काम कर रही है और हम शीघ्र ऐसी स्थिति में होंगे कि उन गीतों को प्रकाशन कर सकें ।
लचारी मूलत: अभिजात वर्ग की स्त्रियों का गीत है जो वेश्याओं के कोठे और उस्तादों के सरगम की पतली गली पार कर अभिजात वर्ग की स्त्रियों तक पहुंचा है । लचारी गीतों में विवशता के भाव मिलते हैं । यह गीत दो सदी से ज्यादा पुराना नहीं है । नवाब वाजिद अली शाह के दरबार में लचारी से ही ठुमरी और दादरा का जन्म हुआ है ।18 जातियों पर आधारित भेदभाव वाले भारतीय समाज में कुछ निम्नजातियों के अपने गीत थे । जैसे धोबी, तेली, दलित, नाई, गड़ेरिया कुम्हार, मल्लाह आदि के गीत । जोगी, कोल, सियरमरवा, वेश्या, हिजड़ों अदि के भी अपने गीत थे ।
समाज के विकास के साथ इन तमाम गंवई काम-धंधों में बदलाव आया । जीवनयापन की शैली बदली । लिहाजा इन गीतों को बदलना या लुप्त होना ही था । इन के बावजूद आज भी गांव , श्रम पर आधारित समाज है । वहां सिर्फ सामाजिकता और संवेदना का क्षरण हुआ है । गंवई जीवन में जो झूठ, लूट और फूट प्रवेश कर गई है उसे नियन्त्रित करने के लिए समरसता के विकास की जरूरत है । लोक जीवन में, लोकगीतों के बिना समरसता बनाए रखना सम्भव नही है । गंवई जीवन की समरसता बनाए रखने के लिए ही लोकगीतों का जन्म हुआ था। संवेदना को बचाए रखने में भी लोकगीतों का बहुत बड़ा योगदान था । अन्याय पर आधारित व्यवस्था को लोक की समरसता स्वीकार्य नहीं होती । व्यवस्था और सामन्ती संस्कृति सदा से लोेक संस्कृति के विरूद्ध रही है । लोक संस्कृति आम जनता को जोड़ती है जबकि गैर बराबरी की व्यवस्था समाज को तोड़ती है । लोकगीतों के काट के लिए अभिजात्य वर्ग ने शास्त्रीय संगीत को आगे बढ़ाया । उसकी सामूहिकता तोड़ी, उसकी सहजता तोड़ी । उसकी बन्दिश पर तमाम तरह के प्रतिबंध लगाए ।
आज लोकगीतों के महत्व को हल्का करने के लिए फूहड़पन का पर्याय बनाया जा रहा है । सुविधाभोगी समाज के पास लोकगीतों जैसी संपदा नही होती । श्रमशील समाज में ही लोकगीत जनमते हैं । आज लोकगीतों की प्रगतिशील चेतना को पीछे ढकेलते हुए, उन पर गंवारूपन का मुलम्मा चढ़ाकर, स्त्रीविरोधी और अश्लीलता का पर्याय बना रहा है । अश्लीलता लोकगीतों का मूल चरित्र नहीं है । यह लोकगीतों का बाजारीकरण है । इन्हें बिकाऊ बनाने के लिए अश्लील बनाया जा रहा है । इनकी जनपक्षधरता तोड़ी जा रही है । मीडिया के दूसरे माध्यमों से हमले तेज करा कर लोकगीतों को मात्र संग्रहालयों में रखने योग्य बना दिया गया है । इन सब के बावजूद लोकगीतों का आकर्षण कम नहीं हुआ है । हां उनकी धार कुन्द जरूर हुई है और ग्रामीण संस्कृति विकृत हुई है । लेकिन यह भी सच है कि जनता सदा अपनी संस्कृति की हिफाजत के लिए संघर्ष करती है । वह थोपी संस्कृति को सहजता से स्वीकार नहीं करती । यही कारण है कि आज भी शास्त्रीय संगीत जनमानस तक पहुंच नहीं पाया है जबकि तमाम कोशिशों के बावजूद लोकगीत अभी जिन्दा हैं ।

सुभाष चन्द्र कुशवाहा

सन्दर्भ
1-लोकरंग सांस्कृतिक समिति द्वारा ढ़ूंढ़े गए गीत ।
2-गंगा घाटी के गीत- डॉ0 हीरालाल तिवारी ।
3- भोजपुरी संस्कारगीत (12) ।
4- लोकरंग सांस्कृतिक समिति द्वारा ढ़ूंढ़े गए गीत ।
5-भोजपुरी संस्कारगीत (15) ।
6-गंगा घाटी के गीत- पृष्ठ 337 ।
7 -धीरे बहो गंगा-देवेन्द्र सत्यार्थी ।
8- भोजपुरी संस्कारगीत (29) ।
9,10 - गंगा घाटी के गीत- डॉ0 हीरालाल तिवारी ।
11 - लोकरंग सांस्कृतिक समिति द्वारा ढूंढे गए गीत ।
12- गंगा घाटी के गीत- डॉ0 हीरालाल तिवारी ।
13, 14- लोकरंग सांस्कृतिक समिति द्वारा ढ़ूंढ़े गए गीत ।
15, 16, 17, 18- गंगा घाटी के गीत- डॉ0 हीरालाल तिवारी ।